
The Glory of Śālagrāma (Śālagrāma-śilā Worship and Its Fruits)
इस अध्याय में शालग्राम-शिला की महिमा का विस्तार से वर्णन है। उसे स्वयं प्रकट विष्णु का साक्षात् अधिष्ठान कहा गया है, जिसमें तीनों लोक निवास करते हैं। शिला के दर्शन, नमस्कार, स्नान, पूजन और उसके तीर्थ-जल के पान से पापों का नाश होता है और केवल प्रणाम मात्र से भी मुक्ति का फल प्राप्त होने की प्रशंसा की गई है। पूजा के लिए सरल उपचरों—जल, गंध, दीप, धूप, नैवेद्य, गीत और स्तुति—का विधान बताया गया है। विशेषतः कार्त्तिक मास में केशव के सामने स्वस्तिक/मंडल बनाकर आराधना करने को महान पुण्यदायक कहा गया है। लिंग-पूजा के पुण्य को मानते हुए भी शालग्राम-पूजा को श्रेष्ठ, शुद्धि तथा अर्पण-स्वीकार की निर्णायक साधना बताया गया है। आगे शालग्राम के रूपों की पहचान—चक्र-रेखाएँ, छिद्र, रंग और आकार—के आधार पर की गई है और वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, वराह, मत्स्य आदि देव-स्वरूपों के नाम बताए गए हैं, साथ ही पूज्य-अपूज्य का नियम भी स्पष्ट किया गया है। अंत में कहा गया है कि शालग्राम-पूजन का फल देवता भी गिन नहीं सकते—इतना उसका अपरिमेय माहात्म्य है।
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