
Mahādeva Enters the Battle (Śiva’s Arrival for War)
जालंधर-प्रसंग में रणभूमि और भी फैल जाती है। शुम्भ, निशुम्भ तथा उनके सहायक दैत्य शिवगणों पर टूट पड़ते हैं। अनेक द्वंद्व-युद्ध होते हैं—शुम्भ का नन्दी से, निशुम्भ का महाकाल से; अन्य दैत्य पुष्पदन्त, माल्यवान, विनायक और स्कन्द आदि से भिड़ते हैं। इसी बीच ‘ज्वर’ नामक व्यक्त रूप प्रकट होते हैं और एक दैत्य फटे हुए उदर से बहु-शीर्षक भयंकर रूप में निकलकर अद्भुत भय उत्पन्न करता है। विनायक घायल होकर करुण विलाप करता है। यह सुनकर पार्वती पर्वत पर स्थित शम्भु को युद्ध हेतु जगाती हैं। महादेव वृषभ को तैयार करने की आज्ञा देते हैं, स्वयं विधिपूर्वक शस्त्र-आभूषण धारण कर रण के लिए प्रस्थान करते हैं। वीरभद्र, मणिभद्र आदि सेनानायकों और विशाल गण-सेना के साथ वे युद्ध में पहुँचते हैं और फिर घोर संग्राम छिड़ जाता है। अंत में उपमा दी जाती है—जैसे इन्द्रियाँ आत्मा पर प्रहार करती हैं, वैसे ही शम्भु के तीक्ष्ण बाण दैत्यों को काट गिराते हैं।
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