Adhyaya 118
Uttara KhandaAdhyaya 1180

Adhyaya 118

Questions and Answers on Kārtika Observance, Gifts, and Purifying Disciplines

इस अध्याय में सूत कार्तिक-माहात्म्य के भीतर शिव–स्कन्द संवाद का वर्णन करते हैं। महादेव कहते हैं कि कलियुग में कार्तिक (ऊर्जा) वैष्णवों का सर्वोत्तम महीना है; इस समय देव-सन्निधि विशेष रूप से प्रबल होती है और पुण्य शीघ्र फल देता है। फिर दानों का विधान और दान-क्रम बताया गया है—अन्नदान, गोदान, भूमिदान, विद्यादान, सुवर्ण आदि का दान, इनकी महिमा और परस्पर श्रेष्ठता का विवेचन होता है। साथ ही कन्यादान और विवाह के विषय में समय, पात्रता और सावधानी के नियम भी बताए जाते हैं। इसके बाद कार्तिक-व्रत की शुद्धि-नियमावली आती है—दूसरों का पका अन्न न खाना (चान्द्रायण/कृच्छ्र के तुल्य फल), तेल, मधु, कांस्य-पात्र तथा सामूहिक भोजन का त्याग, शाकाहार, नदी-स्नान, दीप-दान, वैष्णव-सेवा, दामोदर के सामने प्रातः जागरण, कमल और तुलसी से पूजन। अंत में निर्माल्य, शंख-संस्कारित जल और पादोदक को पाप-नाशक, परम पवित्र करने वाले साधन कहा गया है।

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