
The Episode of Alakṣmī (Why Alakṣmī Dwells at the Aśvattha)
ऋषियों ने बोधि/अश्वत्थ वृक्ष के स्पर्श-अस्पर्श के नियम, विशेषकर शनिवार को, पूछे। तब सूत ने समुद्र-मंथन से जुड़ी उत्पत्ति-कथा सुनाई। लक्ष्मी के विष्णु द्वारा स्वीकार किए जाने पर लक्ष्मी ने कहा कि उनकी ज्येष्ठ बहन ज्येष्ठा/अलक्ष्मी का पहले सम्मान हो। विष्णु ने अलक्ष्मी को तपस्वी उद्दालक के पास भेजा, पर वह वेदध्वनि और यज्ञ-शुद्धि से भरे आश्रम में रहने से इंकार कर द्यूत, चोरी, परस्त्रीगमन, हिंसा, मद्यपान और वृद्ध-ब्राह्मणों की अवज्ञा जैसे अधर्म-स्थानों को अपना निवास बताती है। उद्दालक उसे अश्वत्थ की जड़ में छोड़ देता है; त्यागी गई अलक्ष्मी विलाप करती है। लक्ष्मी के आग्रह पर विष्णु उसे सांत्वना देते हैं और आदेश करते हैं कि अलक्ष्मी का स्थायी वास अश्वत्थ में हो; वह वृक्ष उनके अंश से उत्पन्न कहा गया है। गृहस्थों द्वारा अश्वत्थ-पूजन तथा इस कथा का श्रवण-कीर्तन श्री की स्थिरता देता है, और ऊर्जाव्रत व कार्तिक-माह का पुण्य मोक्षदायक बताया गया है।
No shlokas available for this adhyaya yet.