
Praise of the Aśvattha and Vaṭa (Sacred Fig and Banyan)
इस अध्याय में कार्त्तिक-माहात्म्य के व्रत का उपसंहार बताया गया है। हरिजागर (रात्रि-जागरण), प्रातः-स्नान, तुलसी-सेवा, उद्यापन और दीपदान—इन पाँच मुख्य आचरणों को व्रत-सम्पूर्ण करने वाला कहा गया है, जो भोग और मोक्ष दोनों फल देते हैं। संकट-धर्म भी समझाया गया है—रोग, जलाभाव या मार्ग-विघ्न होने पर भी व्रत कैसे निभे: नाम-स्मरण से, किसी भी मंदिर में, अश्वत्थ के मूल में या तुलसी-वाटिका में भी अनुष्ठान किया जा सकता है। गीत-नृत्य, दान-सहायता, पुण्य-वितरण तथा केवल दर्शन या स्तुति से भी इस व्रत का पुण्य बढ़ता है। अश्वत्थ और वट की सेवा को व्रत-पूर्ति के समान मानकर उनकी विशेष महिमा कही गई है—अश्वत्थ को विष्णु-स्वरूप, वट को रुद्र-स्वरूप और पलाश को ब्रह्मा-स्वरूप बताकर उनकी पूजा का आधार दिया गया है। अंत में पार्वती के शाप की कथा आती है—अग्नि के माध्यम से देवताओं के हस्तक्षेप से क्रुद्ध होकर पार्वती ने देवों को वृक्ष-रूप होने का शाप दिया; इसी से वृक्ष-पूजा की पुराणोक्त धर्म-व्यवस्था स्थापित होती है।
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