
Account of Dhaneśvara: The Tour of Hells and the Liberating Power of Kārttika
कार्त्तिक-माहात्म्य के प्रसंग में पुलस्त्य ऋषि भीष्म से कहते हैं कि एक अंतर्कथा में यम के सेवक प्रेतप धनेश्वर/कुबेर को नरकों का भ्रमण कराते हैं, ताकि कर्मों का फल प्रत्यक्ष दिखे। तप्तवालुका, क्रकच, असिपत्रवन-समूह, अर्गला, कूटशाल्मली, रक्तपूय, कुम्भीपाक आदि नरकों का वर्णन करते हुए बताया जाता है कि अतिथि-सत्कार का त्याग, गुरु-अग्नि-ब्राह्मण-देवों का अपमान या हिंसा, सज्जनों के कार्य में बाधा, स्त्री/धन में विश्वासघात, निषिद्ध भोजन व परनिंदा, तथा संबंध-विच्छेद जैसे पाप वहाँ ले जाते हैं। फिर कथा दंड-वर्णन से मोक्ष-मार्ग की ओर मुड़ती है—कार्त्तिक-व्रत का पालन करने वालों का संग और दर्शन अत्यन्त पुण्यदायक है, जो नरक में पड़े जीवों को भी छुड़ा सकता है। अंत में कुबेर के सेवक धनयक्ष का उल्लेख आता है, जिसने अयोध्या में एक तीर्थ की स्थापना की; और यह दृढ़ वचन दिया जाता है कि स्थिर कार्त्तिक-व्रती के केवल दर्शन से भी घोर पापी मुक्त हो सकते हैं।
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