
The Account of Dhaneśvara (Salvation through Kārttika Association)
श्रीकृष्ण सत्यभामा से धनेश्वर की कथा कहते हैं। धनेश्वर एक पतित ब्राह्मण था, जो पापपूर्ण व्यापारों और व्यसनों में लगा रहता था। कार्तिक मास में वह माहिष्मती पहुँचा और नर्मदा-तट पर व्रतधारियों को देखा—स्नान, जप, पुराण-पाठ, कीर्तन, तथा तुलसी और मालाओं से विष्णु-पूजन। उसके भीतर विशेष भक्ति-भाव न होते हुए भी, वैष्णवों के दर्शन, स्पर्श, संवाद और विष्णु-नाम के श्रवण से उसे अनजाने में रक्षक पुण्य प्राप्त हुआ। उत्सव के बीच सर्पदंश से उसकी अचानक मृत्यु हो गई और वह यमलोक ले जाया गया। चित्रगुप्त को उसके अपने पुण्य का लेखा नहीं मिला, इसलिए यम ने कठोर नरक-दंड (कुम्भीपाक) का आदेश दिया; परंतु नरक में प्रवेश करते ही वह शीतल हो गया। कारण पूछने पर नारद ने बताया कि कार्तिक में व्रतियों की संगति और सेवा से जो पुण्यांश मिलता है, वह महान उद्धारक है। इस प्रकार धनेश्वर तत्काल यातना से बच गया, यद्यपि शेष कर्मफल उसे बाद में हल्के रूप में भोगने पड़े—यह कथा बताती है कि भक्त-संग से कर्म की तीव्रता भी शमन हो जाती है।
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