
The Episode of Quarrel: Liberation from Preta-hood through Kārtika-vrata Merit
इस अध्याय में प्रेत-योनि की पीड़ा और उससे मुक्ति का उपाय बताया गया है। धर्मदत्त देखता है कि प्रेत के लिए तीर्थ, दान और व्रत जैसे सामान्य प्रायश्चित्त सीधे संभव नहीं होते। करुणा से प्रेरित होकर वह अपने जीवनभर किए हुए कार्तिक-व्रत के पुण्य का आधा भाग कलह नामक प्रेत-स्त्री को अर्पित करता है और कहता है कि कार्तिक-व्रत का प्रभाव यज्ञों और तीर्थयात्राओं से भी श्रेष्ठ है। फिर वह शुद्धि-क्रिया करता है—तुलसी-मिश्रित जल से स्नान/प्रोक्षण कराता है और उसे द्वादशाक्षर मंत्र का श्रवण कराता है। उसी क्षण प्रेत-भाव नष्ट हो जाता है; कलह दिव्य तेजस्वी रूप धारण कर कृतज्ञता प्रकट करती है। तभी विष्णु-स्वरूप गणों सहित दिव्य विमान आता है और वह उसमें आरूढ़ होकर चली जाती है; धर्मदत्त की विष्णुभक्त के रूप में प्रशंसा होती है। अंत में विष्णु-पूजा और नाम-स्मरण की महिमा (ध्रुव, गजेन्द्र आदि प्रसंगों के संकेत सहित) बताकर कहा जाता है कि कार्तिक-भक्ति और पुण्य-विभाजन के कारण धर्मदत्त को वैकुण्ठ-सामीप्य तथा आगे चलकर सूर्यवंश में राजजन्म (दशरथ-परंपरा) प्राप्त होगा।
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