Adhyaya 106
Uttara KhandaAdhyaya 1060

Adhyaya 106

Episode of Kalahā (The Allegory of Quarrel and Karmic Consequence)

उत्तरा-खण्ड के कार्तिक-माहात्म्य में श्रोता ऊर्जाव्रत की पवित्र महिमा और पूर्व उदाहरण पूछता है। तब नारद एक उपाख्यान सुनाते हैं—धर्मदत्त नामक विष्णुभक्त, द्वादशाक्षरी मंत्र में निष्ठावान और अतिथि-सत्कार में तत्पर, कार्तिक की रात्रि के अंत में हरि-जागरण हेतु निकलता है। मार्ग में उसे राक्षसी-सी भयानक स्त्री दिखाई देती है; हरिनाम-स्मरण और तुलसी-संयुक्त जल के स्पर्श से उसका पाप नष्ट हो जाता है। वह दण्डवत् प्रणाम कर अपना पूर्वकर्म बताती है—वह ‘कलहा’ नाम की कलहप्रिय पत्नी थी, जिसने पति-धर्म की उपेक्षा की और विषपान से मर गई। यमसभा में चित्रगुप्त ने उसके पुण्य का अभाव देखकर कठोर फल लिखे—नीच योनियों में जन्म और प्रेतत्व आदि। दीर्घ दुःख भोगकर वह धर्मदत्त से करुणा की याचना करती है, बार-बार जन्म और प्रेत-भाव के भय को प्रकट करती है; और यह दिखाया जाता है कि कार्तिक-भक्ति तथा तुलसी-स्पर्श शुद्धि और मुक्ति-आकांक्षा के हेतु बनते हैं।

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