
The Greatness of Dhātrī (Āmalakī) and Tulasī
इस अध्याय में कार्तिक मास में धात्री (आँवला/आमलकी) और तुलसी की परम महिमा को उत्पत्ति-कथा और विधि-निर्देश के साथ बताया गया है। बिखरे हुए बीजों से धात्री, मालती और तुलसी का प्रादुर्भाव होता है और उन्हें त्रिगुणों से जोड़ा गया है। आगे वृक्ष-रूप में स्त्री-सदृश रूप देखकर भगवान विष्णु के विस्मय और आकांक्षा का प्रसंग आता है; विशेष अनुग्रह से धात्री और तुलसी को अद्वितीय कृपा-दायिनी कहा गया है तथा “बरबरी” नाम की निन्दा की गई है। फिर माहात्म्य-विधान में कहा है कि कार्तिक में तुलसी-मूल के निकट पूजन करना चाहिए, घर में तुलसी-वन रखना स्वयं तीर्थ है और वहाँ यमदूतों का प्रवेश नहीं होता। तुलसी-धात्री से जुड़े दान, नैवेद्य और श्राद्धादि से महान पुण्य तथा मोक्ष-फल की प्रतिज्ञा की गई है, और उनके पुण्य की तुलना प्रसिद्ध नदियों/तीर्थों के समान बताई गई है। अंत में कुछ समयों में पत्ते तोड़ने का कठोर निषेध है तथा इस उत्पत्ति-कथा का श्रवण पाप-नाशक और पितरों के लिए कल्याणकारी कहा गया है।
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