Adhyaya 103
Uttara KhandaAdhyaya 1030

Adhyaya 103

Vṛndā’s Entry into the Funeral Fire (Self-Immolation) and the Breaking of Fidelity by Māyā

कार्तिक-माहात्म्य के प्रसंग में श्रीकृष्ण सत्यभामा को बताते हैं कि जालंधर की शक्ति तोड़ने हेतु विष्णु ने वृंदा की अटल पतिव्रता-निष्ठा को माया से विचलित करने की योजना की। वृंदा को अशुभ स्वप्न और अपशकुन दिखते हैं; वह भयाकुल होकर भागती है और राक्षसों से घिर जाती है। तभी एक मौन तपस्वी उसकी रक्षा करता है और दो शीघ्र दूतों (दो “वानरों”) को भेजकर जालंधर के मरण का समाचार मंगवाता है। शोक से व्याकुल वृंदा पति को जीवित करने की विनती करती है; मुनि एक उपाय बताता है। तब “जालंधर” लौटकर उसे आलिंगन करता है, पर वृंदा पहचान लेती है कि यह विष्णु का छद्म रूप है। क्रोध में वह हरि के आचरण की निंदा करती है और शाप देती है कि आगे रामावतार में वनवास होगा, सीता का हरण होगा और वानर-सहायता से कार्य सिद्ध होगा। अंत में वह यज्ञाग्नि में प्रवेश कर सती हो जाती है; विष्णु भस्म से ढके, शोकाकुल और असांत रह जाते हैं—यह कथा माया, लोक-हित की आवश्यकता और व्रत-धर्म की पवित्रता के बीच का तनाव दिखाती है।

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