Adhyaya 10
Srishti KhandaAdhyaya 10127 Verses

Adhyaya 10

The Greatness of the Ancestors: Ekoddiṣṭa Śrāddha, Āśauca Rules, and Sapiṇḍīkaraṇa

पुलस्त्य भीष्म से एकोद्दिष्ट श्राद्ध की विधि और उससे जुड़े आशौच-नियम बताते हैं। वर्ण और संबंध-परिधि के अनुसार मृत्यु-आशौच की अवधि निर्धारित की गई है, और जन्म-आशौच को भी उसी के समान माना गया है। प्रेत-शांति के लिए बारह दिनों तक पिण्डदान, जल-स्थापन तथा ब्राह्मण-भोजन का विधान है; ग्यारहवें दिन विशेष भोजन का निर्देश भी दिया गया है। फिर एक वर्ष पूर्ण होने पर सपिण्डीकरण संस्कार का वर्णन है, जिससे प्रेत पितृगण में सम्मिलित होता है। मंत्र, गोत्र और संकल्प के द्वारा हव्य-कव्य अर्पण पितरों तक कैसे पहुँचता है, यह समझाया गया है। अनुचित दानों—विशेषतः शय्या-दान—के दोष और उनके प्रायश्चित्त का उपदेश है। अंत में कौशिक के पुत्रों से आरम्भ होकर अनेक जन्मों के बाद ब्रह्मदत्त की कथा आती है, जो श्राद्ध की परिवर्तनकारी शक्ति को दिखाते हुए योग-सिद्धि और मोक्ष तक ले जाती है।

Shlokas

Verse 1

पुलस्त्य उवाच । एकोद्दिष्टं ततो वक्ष्ये यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा । मृते पुत्रैर्यथाकार्यमाशौचं च पितुर्यदि

पुलस्त्य बोले—अब मैं ‘एकोद्दिष्ट’ नामक विधि कहूँगा, जो पूर्वकाल में ब्रह्मा ने कही थी—पिता के मरने पर पुत्रों को क्या करना चाहिए, और पिता के संबंध में आशौच की अवधि क्या होती है।

Verse 2

दशाहं शावमाशौचं ब्राह्मणस्य विधीयते । क्षत्रियेषु दश द्वे च पक्षं वैश्येषु चैव हि

मृत्यु से उत्पन्न शाव-आशौच ब्राह्मण के लिए दस दिन का विधान है; क्षत्रियों के लिए बारह दिन; और वैश्य के लिए निश्चय ही पंद्रह दिन (पक्ष) है।

Verse 3

शूद्रेषु मासमाशौचं सपिंडेषु विधीयते । नैशमाचूडमाशौचं त्रिरात्रं परतः स्मृतम्

शूद्रों में सपिंड संबंधियों की मृत्यु होने पर एक मास का आशौच विधान है। सपिंड से परे होने पर तीन रात्रियों का आशौच माना गया है; और रात्रि में मृत्यु हो तो चूड़ा (शिखा-गाँठ) खुलने तक।

Verse 4

जननेप्येवमेव स्यात्सर्ववर्णेषु सर्वदा । अस्थिसंचयनादूर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते

जनन (प्रसव) के विषय में भी सदा, सभी वर्णों में, यही नियम हो। अस्थि-संचयन के बाद फिर से देह-स्पर्श (सामान्य संसर्ग) का विधान है।

Verse 5

प्रेताय पिंडदानं तु द्वादशाहं समाचरेत् । पाथेयं तस्य तत्प्रोक्तं यतः प्रीतिकरं महत्

प्रेत के लिए पिंडदान बारह दिनों तक करना चाहिए। वही उसका पाथेय (यात्रा-भोजन) कहा गया है, क्योंकि वह महान् तृप्ति देने वाला है।

Verse 6

यस्मात्प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहेन नीयते । गृहे पुत्रकलत्रं च द्वादशाहं प्रपश्यति

क्योंकि प्रेत को बारह दिनों में प्रेतपुर ले जाया जाता है; और उन बारह दिनों तक वह अपने घर में पुत्र और पत्नी को देखता रहता है।

Verse 7

तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा । सर्वदाहोपशांत्यर्थमध्वश्रमविनाशनम्

अतः दस रात्रियों तक खुले आकाश में जल रखना चाहिए; वह समस्त दाह (जलन-ताप) को शांत करने और मार्ग-श्रम को दूर करने वाला है।

Verse 8

ततस्त्वेकादशाहेपि द्विजानेकादशैव तु । गोत्रादिसूतकांते च भोजयेन्मनुजो द्विजान्

तब ग्यारहवें दिन भी मनुष्य को ठीक ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। और गोत्र आदि से सम्बन्धित सूतक की समाप्ति होने पर फिर से ब्राह्मणों को भोजन कराए।

Verse 9

द्वितीयेह्नि पुनस्तद्वदेकोद्दिष्टं समाचरेत् । नावाहनाग्नौकरणं दैवहीनं विधानतः

दूसरे दिन भी उसी प्रकार एकोद्दिष्ट कर्म करे। विधि के अनुसार इसमें न देवता का आवाहन होता है, न अग्नि-कार्य; यह ‘दैव’ अंश से रहित होता है।

Verse 10

एकं पवित्रमेकोर्घ एकः पिंडो विधीयते । उपतिष्ठतामिति वदेद्देयं पश्चात्तिलोदकं

एक कुश का पवित्रक, एक अर्घ्य और एक पिण्ड तैयार करे। ‘उपतिष्ठताम्’ कहकर उसके बाद तिल-मिश्रित जल अर्पित करे।

Verse 11

स्वास्ति ब्रूयाद्विप्रकरे विसर्गे चाभिरम्यताम् । शेषं पूर्ववदत्रापि कार्यं वेदविदो विदुः

समापन पर ब्राह्मण-समूह में ‘स्वस्ति’ कहे और ‘अभिरम्यताम्’ कहकर प्रसन्नतापूर्वक विदा करे। शेष कर्म यहाँ भी पूर्ववत् ही करना चाहिए—ऐसा वेदवेत्ता कहते हैं।

Verse 12

अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत् । सूतकांते द्वितीयेह्नि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम्

इसी विधि के अनुसार पूरे महीने तक इसका आचरण करे। फिर सूतक की समाप्ति पर, दूसरे दिन, विशेष प्रकार की शय्या दान में दे।

Verse 13

कांचनं पुरुषं तद्वत्फलवस्त्रसमन्वितम् । प्रपूज्य द्विजदांपत्यं नानाभरणभूषितम्

उसी प्रकार फल और वस्त्रों से युक्त स्वर्ण-पुरुष-प्रतिमा की विधिपूर्वक पूजा करके, नाना आभूषणों से विभूषित ब्राह्मण दम्पति का यथोचित सत्कार करना चाहिए।

Verse 14

उपवेश्य तु शय्यायां मधुपर्कं ततो ददेत् । रजतस्य तु पात्रेण दधिदुग्धसमन्वितम्

अतिथि को शय्या पर बैठाकर फिर मधुपर्क अर्पित करे; दही और दूध सहित उसे रजत-पात्र में परोसे।

Verse 15

अस्थिलालाटिकं गृह्य सूक्ष्मं कृत्वा विमिश्रयेत् । पाययेदिद्वजदांपत्यं पितृभक्त्या समन्वितः

ललाट-प्रदेश की अस्थि का छोटा अंश लेकर उसे सूक्ष्म पीसकर मिश्रित करे; पितृभक्ति से युक्त होकर उस द्विज-दम्पति को वह पिलाए।

Verse 16

एष एव विधिर्दृष्टः पार्वतीयैर्द्विजोतमैः । तेन दुष्टा तु सा शय्या न ग्राह्या द्विजसत्तमैः

यही विधि पार्वतीय प्रदेश के श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा देखी गई है; इसलिए वह शय्या दूषित मानी गई है और उत्तम द्विजों को उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए।

Verse 17

गृहीतायां तु तस्यां हि पुनः संस्कारमर्हति । वेदे चैव पुराणे च शय्या सर्वत्र गर्हिता

यदि वह (स्त्री) ग्रहण कर ली गई हो, तो वह पुनः संस्कार की अधिकारी है; क्योंकि वेद और पुराण—दोनों में (विधि के बिना) शय्या सर्वत्र निंदित कही गई है।

Verse 18

ग्रहीतारस्तु जायन्ते सर्वे नरकगामिनः । ग्रथितां वसुजालेन शय्यां दांपत्यसेविताम्

जो लोग अन्याय से (ऐसी वस्तु) ग्रहण करते हैं, वे सब नरकगामी होकर जन्म लेते हैं। यह धन-जाल से बुनी, दाम्पत्य-भोग में प्रयुक्त शय्या के विषय में कहा गया है।

Verse 19

ये स्पृशंति न जानंतः सर्वे नरकगामिनः । नवश्राद्धेन भोक्तव्यं भुक्त्वा चांद्रायणं चरेत्

जो लोग नियम न जानते हुए उसे स्पर्श करते हैं, वे सब नरकगामी होते हैं। नव-श्राद्ध करके ही भोजन करना चाहिए, और भोजन के बाद चान्द्रायण प्रायश्चित्त करना चाहिए।

Verse 20

पितृभक्त्या तु पुत्राणां कार्यमेव सदा भवेत् । वृषोत्सर्गं च कुर्वीत देया च कपिला शुभा

पितरों के प्रति भक्ति से पुत्रों को सदा विधिपूर्वक कर्तव्य-कर्म करना चाहिए। वे वृषोत्सर्ग भी करें और शुभ कपिला (भूरी) गौ का दान दें।

Verse 21

उदकुंभश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यफलान्वितः । यावदब्दं नरश्रेष्ठ सतिलोदकपूर्वकम्

भक्ष्य, भोज्य और फलों से युक्त जल-कलश का दान करना चाहिए। हे नरश्रेष्ठ, तिल-मिश्रित जल के अर्घ्य से पूर्वक यह दान पूरे एक वर्ष तक (निरंतर) किया जाए।

Verse 22

ततः संवत्सरे पूर्णे सपिंडीकरणं भवेत् । सपिंडीकरणादूर्द्ध्वं प्रेतः पार्वणभुग्यतः

फिर जब एक वर्ष पूर्ण हो जाए, तब सपिंडीकरण संस्कार करना चाहिए। सपिंडीकरण के बाद प्रेत पार्वण-श्राद्ध के पिण्ड-भाग का अधिकारी हो जाता है।

Verse 23

वृद्धिपूर्वेषु कार्येषु गृहस्थस्य भवेत्ततः । सपिंडीकरणं श्राद्धं देवपूर्वं नियोजयेत्

अतः गृहस्थ जब वृद्धि और समृद्धि हेतु कर्म करे, तब देव-पूजन के पूर्व सपिण्डीकरण नामक श्राद्ध पहले कराए।

Verse 24

पितॄनावाहयेत्तत्र पृथक्प्रेतं विनिर्दिशेत् । गंधोदकतिलैर्युक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम्

वहाँ पितरों का आवाहन करे और प्रेत के लिए अलग से अर्पण निश्चित करे। सुगन्धित जल और तिल सहित चार पात्र तैयार करे।

Verse 25

अर्घ्यार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत् । तद्वत्संकल्प्य चतुरः पिंडान्पितृपरस्तदा

अर्घ्य हेतु प्रेत-पात्र का जल पितृ-पात्रों में डाले। फिर उसी संकल्प से पितृ-भक्त कर्ता उस समय चार पिण्ड बनाए।

Verse 26

ये समाना इति द्वाभ्यामन्नं तु विभजेत्त्रिधा । अनेन विधिना चार्घ्यं पूर्वमेव प्रदापयेत्

‘ये समाना…’ से आरम्भ होने वाले दो मन्त्रों का पाठ करके अन्न को तीन भागों में बाँटे। इसी विधि से पहले अर्घ्य अर्पित करे।

Verse 27

ततः पितृत्वमापन्नस्स चतुर्थस्तदा त्वनु । अग्निष्वात्तादि मध्ये तु प्राप्नोत्यमृतमुत्तमम्

तदनन्तर वह पितृभाव को प्राप्त हुआ; चौथे रूप में होकर क्रमशः अग्निष्वात्त आदि पितृ-गणों के मध्य परम अमृत को पाता है।

Verse 28

सपिण्डीकरणादूर्ध्वं पृथक्तस्मै न दीयते । पितृष्वेव च दातव्यं तत्पिंडं येषु संस्थितम्

सपिण्डीकरण संस्कार के बाद उस मृतक को अलग से पिण्ड नहीं देना चाहिए; वह पिण्ड केवल पितरों को ही अर्पित किया जाए, जिनमें वह पिण्ड स्थापित माना जाता है।

Verse 29

ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादि पर्वसु । त्रिपिंडमाचरेच्छ्राद्धमेकोद्दिष्टं मृतेहनि

उसके बाद से संक्रान्ति, ग्रहण आदि पर्वों में तीन पिण्डों वाला श्राद्ध करना चाहिए; और मृत्यु के उसी दिन एकोद्दिष्ट श्राद्ध (एक ही प्रेत के लिए) करना चाहिए।

Verse 30

एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत् । स दैवं पितृहा स स्यात्तथा भ्रातृविनाशकः

जो व्यक्ति मृत्यु-सम्बन्धी दिन में एकोद्दिष्ट को छोड़कर अन्य कर्म करने लगे, वह पितृघाती और देवकर्म में विघ्नकारी माना जाता है तथा भाई के विनाश का कारण भी होता है।

Verse 31

मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधो याति स मानवः । संपृक्ते स्वर्गती भावे प्रेतमोक्षो यतो भवेत्

मृत्यु के अशुभ दिन में पार्वण श्राद्ध करने वाला मनुष्य अधोगति को प्राप्त होता है; परन्तु जब वह स्वर्गगति के अनुकूल भाव से युक्त होकर किया जाए, तब प्रेत की मुक्ति होती है।

Verse 32

आमश्राद्धं तदा कुर्याद्विधिज्ञः श्राद्धदस्ततः । तेनाग्नौकरणं कुर्यात्पिंडांस्तेनैव निर्वपेत्

तब विधि जानने वाला श्राद्ध के लिए तैयार द्रव्यों से ही आमश्राद्ध करे; उन्हीं से अग्नौकरण संस्कार करे और उन्हीं से पिण्डों का निर्वपन/अर्पण भी करे।

Verse 33

त्रिभिः सपिंडीकरणं मासैक्ये त्रितये तथा । यदा प्राप्स्यति कालेन तदा मुच्येत बंधनात्

जब नियत तीन अवसरों पर—एक मास की पूर्णता पर तथा तीसरे मास में भी—विधिपूर्वक सपिंडीकरण किया जाता है, तब कालक्रम से वह बंधन से मुक्त हो जाता है।

Verse 34

मुक्तोपि लेपभागित्वं प्राप्नोति कुशमार्जनात् । लेपभाजश्चतुर्थाद्यास्त्रयः स्युः पिंडभागिनः

जो (अशौच से) मुक्त भी हो, वह कुश से मार्जन करने पर लेप (दोष) का भागी हो जाता है; और उस लेप के भागी लोगों में चौथे से आरम्भ तीन जन पिंड के भागी कहे जाते हैं।

Verse 35

पिण्डदः सप्तमस्तेषां सपिंडाः सप्तपूरुषाः । भीष्म उवाच । कथं हव्यानि देयानि कव्यानि च जनैरिह

उनमें सातवाँ पिंड देने वाला है; और सपिंड संबंध सात पुरुषों तक माना गया है। भीष्म बोले—इस लोक में लोग देवों के लिए हव्य और पितरों के लिए कव्य आहुति कैसे दें?

Verse 36

गृह्णंति पितृलोके वा प्रायः के कैर्निगद्यते । यदि मर्त्ये द्विजो भुंक्ते हूयते यदि वानले

पितृलोक में उन्हें प्रायः कौन ग्रहण करता है—और किसके द्वारा ऐसा कहा जाता है? यदि यहाँ मर्त्यलोक में कोई द्विज उसे खा ले, या अग्नि में होम कर दिया जाए, तो वास्तव में पितरों तक क्या पहुँचता है?

Verse 37

शुभाशुभात्मकाः प्रेतास्तदन्नं भुंजते कथम् । पुलस्त्य उवाच । वसुस्वरूपाः पितरो रुद्राश्चैव पितामहाः

शुभ-अशुभ स्वभाव वाले प्रेत उस अन्न को कैसे भोगते हैं? पुलस्त्य बोले—पितर वसुओं के स्वरूप हैं और पितामह (पूर्वज) रुद्रों के ही स्वरूप हैं।

Verse 38

प्रपितामहास्तथादित्या इत्येषा वैदिकी श्रुतिः । नामगोत्रं पितॄणां तु प्रापकं हव्यकव्ययोः

“प्रपितामह और आदित्य”—यह वैदिक श्रुति है। पितरों का नाम और गोत्र ही हवि और कव्य-आहुति को उन तक पहुँचाने वाला होता है।

Verse 39

श्राद्धस्य मन्त्रतस्तत्वमुपलभ्येत भक्तितः । अग्निष्वात्तादयस्तेषामाधिपत्ये व्यवस्थिताः

श्राद्ध के मंत्रों से उसका तत्त्व भक्ति सहित जाना जाता है; और अग्निष्वात्त आदि पितर उन कर्मों के अधिपति रूप में प्रतिष्ठित हैं।

Verse 40

नामगोत्रास्तदा देशा भवंत्युद्भवतामपि । प्राणिनः प्रीणयत्येतदर्हणं समुपागतं

तब नवजातों को भी नाम, गोत्र और देश (उत्पत्ति-स्थान) प्राप्त होते हैं। यह यथाविधि किया गया सम्मान-दान प्राणियों को तृप्त करता है।

Verse 41

दिव्यो यदि पिता माता गुरुः कर्मानुयोगतः । तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्त्वेप्यनुगच्छति

यदि पिता, माता या गुरु अपने नियत कर्म के कारण दिव्य हों, तो उन्हें अर्पित अन्न अमृत-तुल्य हो जाता है; और दाता भी उस दिव्यता को प्राप्त करता है।

Verse 42

दैत्यत्वे भोगरूपेण पशुत्वेपि तृणं भवेत् । श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वेप्युपतिष्ठति

दैत्य-योनि में वह भोगरूप हो जाता है, पशु-योनि में तृण बन जाता है; और श्राद्ध का अन्न वायु-रूप से—नाग-योनि में भी—प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है।

Verse 43

पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिषं । दानवत्वे तथा पानं प्रेतत्वे रुधिरोदकम्

यक्ष-भाव में पीना होता है; राक्षस-भाव में वैसे ही मांस-भक्षण होता है। दानव-भाव में भी मद्यपान होता है; और प्रेत-भाव में रक्त-मिश्रित जल पीना पड़ता है।

Verse 44

मनुष्यत्वेन्नपानादि नानाभोगवतां भवेत् । रतिशक्तिस्त्रियः कान्तेऽन्येषां भोजनशक्तिता

मनुष्य-जीवन में अन्न-पान आदि तथा अनेक प्रकार के भोगों की शक्ति उत्पन्न होती है। उनमें स्त्रियों के लिए प्रियतम के प्रति रति-शक्ति, और अन्य के लिए भोजन-शक्ति कही गई है।

Verse 45

दानशक्तिः स विभवा रूपमारोग्यमेव च । श्राद्धपुष्पमिदं प्रोक्तं फलं ब्रह्मसमागमः

दान की शक्ति, वैभव, रूप और आरोग्य—इसे श्राद्ध का ‘पुष्प’ कहा गया है; और उसका फल ब्रह्म-समागम, अर्थात् परम तत्त्व की प्राप्ति है।

Verse 46

आयुः पुत्रान्धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीताः पितृगणा नृप

हे नृप! प्रसन्न होने पर पितृगण आयु, पुत्र, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष और सुख—तथा राज्य-सम्पदा भी प्रदान करते हैं।

Verse 47

श्रूयते च पुरा मोक्षं प्राप्ताः कौशिकसूनवः । पंचभिर्जन्मसंबंधैः प्राप्ता ब्रह्मपरं पदम्

सुना जाता है कि प्राचीन काल में कौशिक के पुत्रों ने मोक्ष प्राप्त किया। पाँच जन्मों के संबंधों के द्वारा वे ब्रह्म के परम पद को प्राप्त हुए।

Verse 48

भीष्म उवाच । कथं कौशिकदायादाः प्राप्ता योगमनुत्तमम् । पंचभिर्जन्मसंबन्धैः कथं कर्मक्षयो भवेत्

भीष्म बोले—कौशिक के वंशजों ने अनुत्तम योग कैसे प्राप्त किया? और पाँच जन्मों के संबंधों से कर्मों का क्षय कैसे होता है?

Verse 49

पुलस्त्य उवाच । कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः । नामतः कर्मतस्तस्य पुत्राणां तन्निबोध मे

पुलस्त्य बोले—कुरुक्षेत्र में कौशिक नाम के धर्मात्मा महर्षि हैं। अब उनके पुत्रों के नाम और कर्म—दोनों—मुझसे सुनो।

Verse 50

स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च । वाग्दुष्टः पितृवर्ती च गर्गशिष्यास्तदाभवन्

स्वसृप, क्रोधनो, हिंस्र, पिशुन और कवि—तथा वाग्दुष्ट और पितृवर्ती—उस समय गर्ग के शिष्य थे।

Verse 51

पितर्युपरते तेषामभूद्दुर्भिक्षमुल्बणं । अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयंकरी

उनके पिता के देहांत के बाद उनके यहाँ भयंकर दुर्भिक्ष हुआ, और महान अनावृष्टि भी—जो समस्त लोकों को भय देने वाली थी।

Verse 52

गर्गादेशाद्वने दोग्ध्रीं रक्षंति च तपोधनाः । खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशं

गर्ग के आदेश से तपोधन मुनि वन में इस दुधारू गाय की रक्षा कर रहे हैं; पर हम भूख से अत्यंत पीड़ित हैं, इसलिए इस कपिला गाय को खा लेंगे।

Verse 53

इति चिंतयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः । यद्यवश्यमियं वध्या श्राद्धरूपेण योज्यतां

जब वे पाप के विषय में ऐसा विचार कर रहे थे, तब छोटे भाई लघु ने कहा— “यदि इसका वध अनिवार्य ही है, तो इसे श्राद्ध-रूप में ही नियोजित किया जाए।”

Verse 54

श्राद्धे नियोज्यमानायां पापं नश्यति नो ध्रुवं । एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदानुजैः

श्राद्ध में विधिपूर्वक नियोजन होने पर पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है। ऐसा करने की आज्ञा पाकर, वह छोटे भाइयों सहित पितृ-आज्ञा के अनुसार आचरण करने लगा।

Verse 55

चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्याथ तां पुनः । द्वौ दैवे भ्रातरो कृत्वा पित्र्ये त्रींश्चापरान्क्रमात्

उसने एकाग्रचित्त होकर श्राद्ध किया और फिर उसी को पुनः प्रयोजित किया। देव-श्राद्ध के लिए उसने दो भाइयों को नियुक्त किया और पितृ-श्राद्ध के लिए क्रमशः तैंतीस अन्य को नियुक्त किया।

Verse 56

तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु । चकार मंत्रवच्छ्राद्धं स्मरन्पितृपरायणः

इस प्रकार एक ही उपयुक्त तिथि निश्चित करके, श्राद्ध-दान में तत्पर वह स्वयं ही मंत्रोच्चार सहित श्राद्ध करने लगा— पितरों का स्मरण करता हुआ, पितृ-परायण होकर।

Verse 57

तदा गत्वा विशंकास्ते गुरवे च न्यवेदयन् । व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोयं प्रतिगृह्यतां

तब वे संदेह से भरे हुए गुरु के पास गए और निवेदन किया— “गाय व्याघ्र द्वारा मारी गई है; यह बछड़ा स्वीकार कीजिए।”

Verse 58

एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः । वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः

इस प्रकार वह गौ उन सात तपोधन ऋषियों द्वारा भक्षित हुई; वे वेद-बल का आश्रय लेकर निडर होकर उस क्रूर कर्म में प्रवृत्त हुए।

Verse 59

ततः काले प्रणष्टास्ते व्याधा दश पुरेभवन् । जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः

फिर कालान्तर में वे नष्ट हुए दस व्याध नगर में पुनः उत्पन्न हुए; उन्हें पूर्वजन्म-स्मृति प्राप्त थी और उनका चित्त पितृभाव से भावित था।

Verse 60

तत्र विज्ञाय वैराग्यं प्राणानुत्सृज्य धर्मतः । लोकैरवीक्ष्यमाणास्ते तीर्थांतेनशनेन तु

वहाँ वैराग्य को जानकर उन्होंने धर्मपूर्वक प्राण त्याग दिए; लोगों से अदृश्य रहकर उन्होंने तीर्थ के अन्त में उपवास द्वारा देह छोड़ी।

Verse 61

संजाता मृगरूपास्ते सप्त कालंजरे गिरौ । प्राप्तविज्ञानयोगास्ते तत्यजुस्तां निजां तनुम्

कालेञ्जर पर्वत पर वे सात मृगरूप में उत्पन्न हुए; ज्ञान-योग की साधना प्राप्त कर उन्होंने फिर अपनी उसी देह का त्याग कर दिया।

Verse 62

मम्रुः प्रपतनेनाथ जातवैराग्यमानसाः । मानसे चक्रव्राकास्ते संजाताः सप्तयोगिनः

हे प्रभो, गिरकर वे मर गए, उनके मन में सहसा वैराग्य जाग उठा; मानसर सरोवर में वे चक्रवाक पक्षी होकर फिर सात योगी बनकर उत्पन्न हुए।

Verse 63

नामतः कर्मतः सर्वे सुमनाः कुसुमोवसुः । चित्तदर्शी सुदर्शी च ज्ञाता ज्ञानस्य पारगः

नाम और कर्म से वे सब सुमनस्क, पुष्प-सम निधि के समान थे। वे पर-चित्त को जानने वाले, उत्तम दृष्टि वाले, ज्ञानी और ज्ञान के पारगामी थे।

Verse 64

ज्येष्ठानुरक्ताः श्रेष्ठास्ते सप्तैते योगपावनाः । योगभ्रष्टास्त्रयस्तेषां बभूवुश्चलचेतसः

ज्येष्ठ के प्रति अनुरक्त वे सातों श्रेष्ठ थे—योग से पावन करने वाले। परन्तु उनमें से तीन योग से भ्रष्ट हो गए और चंचलचित्त बन गए।

Verse 65

दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमणुहं स्त्रीभिरन्वितम् । क्रीडंतं विविधैर्भोगैर्महाबलपराक्रमम्

उस अणुह को, जो दीप्तिमान था, स्त्रियों से घिरा हुआ, नाना भोगों में क्रीड़ा करता, और महाबल-पराक्रम से युक्त था—देखकर।

Verse 66

पञ्चालान्वयसंभूतं प्रभूतबलवाहनम् । राज्यकामोभवत्त्वेकस्तेषां मध्ये जलौकसाम्

‘जलचर उन लोगों के बीच पञ्चाल-वंश में उत्पन्न, प्रचुर बल और वाहनों से युक्त, राज्य की कामना करने वाला एक हो।’

Verse 67

पितृवर्ती च यो विप्रः श्राद्धकृत्पितृवत्सलः । अपरौ मंत्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतबलवाहनौ

जो विप्र पितरों के प्रति निष्ठावान, श्राद्ध करने वाला और पितृवत्सल था—उसने प्रचुर बल-वाहन से युक्त अन्य दो मंत्रियों को देखकर (उन्हें पहचाना)।

Verse 68

मंत्रित्वे चक्रतुश्चेच्छामस्मिन्मर्त्यौ द्विजोत्तमौ । विभ्राजपुत्रस्त्वेकोभूद्ब्रह्मदत्त इति स्मृतः

इस लोक में उन दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने मंत्रित्व का अपना अभिलाषित कार्य पूर्ण किया। उनमें से एक, विभ्राज का पुत्र, ‘ब्रह्मदत्त’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

Verse 69

मंत्रिपुत्रौ तथा चैव पुंडरीकसुबालकौ । ब्रह्मदत्तोभिषिक्तस्तु कांपिल्ये नगरोत्तमे

वहाँ मंत्री के दो पुत्र—पुंडरीक और सुबालक—भी थे। और नगरों में श्रेष्ठ कांपिल्य में ब्रह्मदत्त का अभिषेक (राज्याभिषेक) हुआ।

Verse 70

पंचालराजो विक्रांतः श्राद्धकृत्पितृवत्सलः । योगवित्सर्वजंतूनां चित्तवेत्ताभवत्तदा

तब पंचाल का राजा पराक्रमी, श्राद्धकर्म करने में तत्पर और पितरों के प्रति स्नेहशील था; वह योग का ज्ञाता तथा समस्त प्राणियों के चित्त का वेत्ता बन गया।

Verse 71

तस्य राज्ञोभवद्भार्या सुदेवस्यात्मजा तदा । सन्नतिर्नाम विख्याता कपिलायाभवत्पुरा

उस राजा की पत्नी तब सुदेव की पुत्री हुई, जो ‘सन्नति’ नाम से विख्यात थी और पूर्वकाल में ‘कपिला’ कही जाती थी।

Verse 72

पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद्ब्रह्मवादिनी । तया चकार सहितः स राज्यं राजनंदनः

पितृकार्य में नियुक्त होने के कारण वह ब्रह्म की वादिनी (ब्रह्मज्ञान की प्रवक्ता) बन गई। उसके साथ वह राजनंदन राज्य का संचालन करने लगा।

Verse 73

कदाचिद्गतौद्यानं तया सह स पार्थिवः । ददर्श कीटमिथुनमनंगकलहान्वितम्

एक बार वह राजा उसके साथ उपवन में गया। वहाँ उसने कामजनित कलह में उलझा हुआ कीटों का एक युगल देखा।

Verse 74

पिपीलिकामधोवक्त्रां पुरतः कीटकामुकः । पंचबाणाभितप्तांगः सगद्गदमुवाच ह

तब उस चींटी के सामने, जिसका मुख नीचे की ओर था, वह कीट-प्रेमी खड़ा हुआ। कामदेव के पाँच बाणों से दग्ध अंगों वाला वह गद्गद स्वर में बोला।

Verse 75

न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित् । मध्ये क्षीणातिजघना बृहद्वक्त्रातिगामिनी

इस लोक में तुम्हारे समान कोई कामिनी कहीं नहीं है—मध्य में क्षीण, नितंबों में भरपूर, और मुख-शोभा व मनोहर चाल में सबको पीछे छोड़ने वाली।

Verse 76

सुवर्णवर्णसदृशी सद्वक्त्रा चारुहासिनी । आलक्ष्यते च वदनं गुडशर्करवत्सलं

वह सुवर्ण-सी वर्णवती, श्रेष्ठ मुख वाली और मनोहर हँसी वाली प्रतीत हुई। उसका मुख गुड़ और शर्करा के समान मधुर व प्रिय जान पड़ा।

Verse 77

भोक्ष्यसे मयि भुक्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि । प्रोषिते मयि दीना त्वं क्रुद्धे च भयचंचला

मैं भोजन करूँ तो तुम भी भोजन करती हो; मैं स्नान करूँ तो तुम भी स्नान करती हो। मैं दूर रहूँ तो तुम दीन हो जाती हो, और मैं क्रुद्ध होऊँ तो भय से काँप उठती हो।

Verse 78

किमर्थं वद कल्याणि सदाधोवदनास्थिता । सा तमाह ज्वलत्कोपा किमालपसि रे शठ

हे कल्याणी, तुम सदा मुख नीचे किए क्यों बैठी रहती हो? वह क्रोध से दहक उठी और बोली—अरे कपटी, यह क्या बक रहे हो?

Verse 79

त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहायापि भक्षितम् । प्रादास्त्वं तदतिक्रम्य मामन्यस्यै समन्मथः

तुमने मुझे छोड़कर मोदक का चूर्ण खा लिया; और फिर उस पर भी बढ़कर, हे कामोत्तेजक, मुझे किसी और को दे दिया।

Verse 80

पिपीलक उवाच । त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि । तदेकमपराधं मे क्षंतुमर्हसि भामिनि

पिपीलक बोला—हे सुन्दर वर्णवाली, तुम्हारे समान रूप देखकर मैंने उसे दूसरी को दे दिया; उस एक अपराध को, हे मानिनी, तुम क्षमा करो।

Verse 81

नैवं पुनः करिष्यामि त्यज कोपं च सुस्तनि । स्पृशामि पादौ सत्येन प्रणतस्य प्रसीद मे

मैं फिर ऐसा नहीं करूँगा; हे सुस्तनी, क्रोध त्यागो। सत्यपूर्वक तुम्हारे चरण स्पर्श करता हूँ—झुके हुए मुझ पर प्रसन्न हो।

Verse 82

रुष्टायां त्वयि सुश्रोणि मृत्युर्मे पुरतो भवेत् । तुष्टायां त्वयि वामोरु पूर्णाः सर्वमनोरथाः

हे सुश्रोणि, तुम रुष्ट हो तो मेरे आगे मृत्यु खड़ी हो जाए; और हे वामोरु, तुम तुष्ट हो तो मेरी सब मनोकामनाएँ पूर्ण हों।

Verse 83

पूर्णचंद्रोपमं वक्त्रं स्वादेमृतरसोपमम् । निर्भरं पिब सुश्रोणि कामासक्तस्य मे सदा

तुम्हारा मुख पूर्णचन्द्र के समान है और तुम्हारी मधुरता अमृत-रस जैसी है। हे सुश्रोणि! सदा कामासक्त मुझको भरपूर पान करो।

Verse 84

एतन्मत्वा शुभे कार्या सर्वदा तु कृपा मयि । इति सा वचनं श्रुत्वा प्रसन्ना चाभवत्ततः

यह जानकर, हे शुभे! तुम सदा मुझ पर कृपा करना। यह वचन सुनकर वह तत्क्षण प्रसन्न हो गई।

Verse 85

आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका । ब्रह्मदत्तोपि तत्सर्वं ज्ञात्वा सस्मयमाहसत्

चींटी ने मोहन को अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। यह सब जानकर ब्रह्मदत्त भी विस्मय सहित हँसते हुए बोला।

Verse 86

सर्वसत्वरुतज्ञानी प्रभावात्पूर्वकर्मणः । भीष्म उवाच । कथं सर्वरुतज्ञोभूद्ब्रह्मदत्तो नराधिपः

पूर्वकर्म के प्रभाव से वह समस्त प्राणियों की बोलियाँ जानने वाला हो गया। भीष्म बोले—मनुष्यों के स्वामी ब्रह्मदत्त को सब जीवों के स्वर कैसे ज्ञात हुए?

Verse 87

तच्चापि चाभवत्कुत्र चक्रवाकचतुष्टयं । तन्मे कथय सर्वज्ञ कुले कस्य च सुव्रतम्

और वह चार चक्रवाकों का समूह कहाँ हुआ? हे सर्वज्ञ! मुझे बताइए—वह सुव्रता किस कुल की थी?

Verse 88

पुलस्त्य उवाच । तस्मिन्नेव पुरे जाताश्चक्रवाका अथो नृप

पुलस्त्य बोले—हे नृप! उसी नगर में चक्रवाक पक्षी उत्पन्न हुए।

Verse 89

वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मरा बुधाः । धृतिमांस्तत्त्वदर्शी च विद्यावर्णस्तपोधिकः

उस वृद्ध ब्राह्मण के उत्तराधिकारी भी ब्राह्मण थे—पूर्वजन्म-स्मरण करने वाले, बुद्धिमान, धैर्यवान, तत्त्वदर्शी, विद्या-शील से विभूषित और तप में समृद्ध।

Verse 90

नामतः कर्मतश्चैव सुदरिद्रस्य ते सुताः । तपसे बुद्धिरभवत्तेषां वै द्विजजन्मनां

अत्यन्त दरिद्र पुरुष के वे पुत्र—नाम और कर्म दोनों से—तपस्या की ओर प्रवृत्त हुए; और उसी अनुशासन से वे द्विजत्व (ब्राह्मणत्व) को प्राप्त हुए।

Verse 91

यास्यामः परमां सिद्धिमूचुस्ते द्विजसत्तमाः । तत्तेषां वचनं श्रुत्वा सुदरिद्रो महातपाः

वे श्रेष्ठ द्विज बोले—“हम परम सिद्धि को प्राप्त करेंगे।” उनका वचन सुनकर वह अत्यन्त दरिद्र, पर महातपस्वी पुरुष (विचलित/प्रेरित) हुआ।

Verse 92

उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः । अधर्म एष वः पुत्रा पिता तानित्युवाच ह

वह दीन वाणी से बोला—“पुत्रो! यह क्या है?” फिर पिता ने उनसे कहा—“मेरे बेटो, यह तुम्हारा अधर्म है।”

Verse 93

वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिद्रं वनवासिनम् । क्व नु धर्मोत्र भविता मां त्यक्त्वा गतिमेव च

वृद्ध, दरिद्र और वनवासी पिता को छोड़कर यहाँ तुम्हारा धर्म कहाँ रहेगा? और मुझे त्यागकर तुम सचमुच कौन-सी सत्गति या परा गति पाओगे?

Verse 94

ऊचुस्ते कल्पिता वृत्तिस्तव तात वचश्शृणु । व्रतमेतत्पुरा राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलं

वे बोले—पुत्र, हमने तुम्हारे लिए एक उपाय रचा है; हमारी बात सुनो। यह व्रत पहले एक राजा ने किया था; यह तुम्हें प्रचुर फल देगा।

Verse 95

धनं ग्राम सहस्राणि प्रभाते पठतस्तव । कुरुक्षेत्रे तु ये विप्रा व्याधा दशपुरे तु ये

तुम जो प्रभात में पाठ करते हो, तुम्हें धन और हजारों ग्राम मिलेंगे। कुरुक्षेत्र के ब्राह्मण और दशपुर के व्याध भी उसी फल के भागी होंगे।

Verse 96

कालंजरे मृगा भूताश्चक्रवाकास्तु मानसे । इत्युक्त्वा पितरं जग्मुस्ते वनं तपसे पुनः

“कालंजर में वे मृग बने और मानस में चक्रवाक पक्षी बने”—यह पिता से कहकर वे फिर तपस्या के लिए वन को चले गए।

Verse 97

वृद्धोपि स द्विजो राजन्जगाम स्वार्थसिद्धये । अणुहो नाम वैभ्राजः पञ्चालाधिपतिः पुरा

हे राजन्, वह वृद्ध ब्राह्मण भी अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए चल पड़ा। पूर्वकाल में पंचालों का एक वैभ्राज राजा था, जिसका नाम अणुह था।

Verse 98

पुत्रार्थी देवदेवेशं पद्मयोनिं पितामहम् । आराधयामास विभुं तीव्रव्रतपरायणः

पुत्र की कामना से उसने देवों के देव, पद्मयोनि पितामह ब्रह्मा—उस सर्वशक्तिमान प्रभु—की कठोर व्रतों में तत्पर होकर आराधना की।

Verse 99

ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य पितामहः । वरं वरय भद्रं ते हृदयेभीप्सितं नृप

फिर बहुत समय बीतने पर पितामह ब्रह्मा प्रसन्न हुए और बोले—“हे नरेश, तुम्हारा कल्याण हो; अपने हृदय की अभिलाषा के अनुसार वर माँगो।”

Verse 100

अणुह उवाच । पुत्रं मे देहि देवेश महाबलपराक्रमम् । पारगं सर्वविद्यानां धार्मिकं योगिनां वरम्

अणुह ने कहा—“हे देवेश, मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो महान बल और पराक्रम वाला हो, समस्त विद्याओं में पारंगत, धर्मनिष्ठ और योगियों में श्रेष्ठ हो।”

Verse 101

सर्वसत्वरुतज्ञं मे देहि योगिनमात्मजम् । एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः

“मुझे ऐसा योगी पुत्र दीजिए जो समस्त प्राणियों की वाणी/ध्वनि को समझे।” ऐसा कहने पर विश्वात्मा परमेश्वर ने उससे कहा—“एवमस्तु—ऐसा ही हो।”

Verse 102

पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवांतरधीयत । ततः स तस्य पुत्रोभूद्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्

सब प्राणियों के देखते-देखते वह वहीं अंतर्धान हो गया। फिर उसके यहाँ प्रतापी पुत्र उत्पन्न हुआ—जिसका नाम ब्रह्मदत्त था।

Verse 103

सर्वसत्वानुकंपी च सर्वसत्वबलाधिकः । सर्वसत्वरुतज्ञश्च सर्वसत्वेश्वरेश्वरः

वह समस्त प्राणियों पर करुणा करने वाला, सबके बल से बढ़कर बलवान है। वह सब जीवों की पुकार और वाणी को जानने वाला तथा समस्त जीवों के ईश्वरों का भी परमेश्वर है।

Verse 104

अथ सत्वेन योगात्मा स पिपीलकमागतः । यत्र तत्कीटमिथुनं रममाणमवस्थितम्

तब सत्त्वगुण से युक्त वह योगात्मा एक चींटी के पास पहुँचा, जहाँ कीटों का एक युगल क्रीड़ा करता हुआ स्थित था।

Verse 105

ततः सा सन्नतिर्दृष्ट्वा प्रहसंतं सुविस्मितं । किमप्याशंकमाना सा तमपृच्छन्नरेश्वरम्

तब सन्नति ने मनुष्यों के स्वामी को हँसते हुए और अत्यन्त विस्मित देखकर, कुछ शंका करती हुई उनसे प्रश्न किया।

Verse 106

सन्नतिरुवाच । अकस्मादतिहासोयं किमर्थमभवन्नृप । हास्यहेतुं न जानामि यदकाले कृतं त्वया

सन्नति बोली— हे नृप! यह अचानक हँसी किस कारण से हुई? मैं इस हास्य का हेतु नहीं जानती, विशेषतः जब यह तुमने अनुचित समय में किया है।

Verse 107

अवदद्राजपुत्रोसौ तं पिपीलिकभाषितम् । रागवद्विरसोत्पन्नमेतद्धास्यं वरानने

उस राजपुत्र ने उसकी चींटी-सी बोली के विषय में कहा— हे वरानने! यह हँसी रागयुक्त-सी प्रतीत होती है, परन्तु रसहीन होकर ही उत्पन्न हुई है।

Verse 108

न चान्यत्कारणं किंचिद्धास्यहेतुः शुचिस्मिते । न सामन्यततं देवी प्राहालीकमिदं तव

हे शुचि-स्मिते! इस हँसी का कोई अन्य कारण नहीं है। हे देवी, यह साधारण बात नहीं—यह तो तुम्हारे विषय में अद्भुत और आश्चर्यजनक प्रसंग है।

Verse 109

अहमेवेह हसिता न जीविष्ये त्वयाधुना । कथं पिपीलिकालापं मर्त्यो वेत्ति सुरादृते

यहाँ मुझ पर ही हँसी की गई है; अब तुम्हारे कारण मैं जीवित न रहूँगा। देव-सहायता के बिना कोई मर्त्य चींटियों की बोली कैसे समझ सकता है?

Verse 110

तस्मात्त्वयाहमेवाद्य हसिता किमतः परम् । ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्तद्वचो हरेः

“इसलिए आज तुमने सचमुच मुझ पर हँसी की—इससे बढ़कर और क्या?” ऐसा कहकर राजा निरुत्तर रह गया और हरि (विष्णु) के वचनों को जानने के लिए उत्सुक हो उठा।

Verse 111

आस्थाय नियमं तस्थौ सप्तरात्रमकल्मषः । स्वप्नान्ते प्राह तं ब्रह्मा प्रभाते पर्यटन्पुरम्

नियम-व्रत धारण करके वह निष्पाप सात रातों तक अडिग रहा। स्वप्न के अंत में ब्रह्मा ने उससे कहा; और प्रभात होते ही वह नगर में विचरण करने लगा।

Verse 112

वृद्धद्विजोत्तमाद्वाक्यं सर्वं ज्ञास्यति ते प्रिया । इत्युक्त्वांतर्दधे ब्रह्मा प्रभाते च नृपः पुरात्

“वृद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मण के वचनों से तुम्हारी प्रिया सब कुछ जान लेगी।” ऐसा कहकर ब्रह्मा अंतर्धान हो गए; और प्रभात होते ही राजा नगर से निकल पड़ा।

Verse 113

निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमग्रतः । गदंतं विप्रमायांतं वृद्धं च स ददर्श ह

वह मंत्रियों के साथ और पत्नी सहित बाहर निकला; तब उसने अपने सामने आते हुए, बोलते हुए एक वृद्ध ब्राह्मण को देखा।

Verse 114

ब्राह्मण उवाच । ये विप्रमुख्याः कुरुजांगलेषु दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च । कालंजरे सप्त च चक्रवाका ये मानसे तेत्र वसंति सिद्धाः

ब्राह्मण ने कहा—कुरुजाङ्गल में जो द्विजों में श्रेष्ठ हैं, और दाशपुर में रहने वाले दाश तथा मृग; और कालञ्जर में सात चक्रवाक—वे सिद्धजन वहाँ मानसर में निवास करते हैं।

Verse 115

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य स पपात शुचान्वितः । जातिस्मरत्वमगमत्तौ च मंत्रिवरात्मजौ

उसके वचन सुनकर वह शोक से भरकर गिर पड़ा; और श्रेष्ठ मंत्री के वे दोनों पुत्र भी पूर्वजन्म-स्मरण को प्राप्त हुए।

Verse 116

कामशास्त्रप्रणेता तु बाभ्रव्यः स तु बालकः । पंचाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित्

कामशास्त्र के प्रणेता बाभ्रव्य थे; वे ‘बालक’ कहलाए। लोकों में वे ‘पञ्चाल’ नाम से प्रसिद्ध और समस्त शास्त्रों के ज्ञाता थे।

Verse 117

पुंडरीकोपि धर्मात्मा वेदशास्त्रप्रवर्तकः । भूत्वा जातिस्मरौ शोकात्पतितावग्रतस्तथा

पुण्डरीक भी—धर्मात्मा और वेद-शास्त्रों के प्रवर्तक—जातिस्मर हो गया; पर शोकवश वह भी उनके सामने वैसे ही गिर पड़ा।

Verse 118

हा वयं कर्मविभ्रष्टाः कामतः कर्मबंधनात् । एवं विलप्य बहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः

हाय! हम अपने स्वधर्म से गिर गए; कामवश कर्म-बंधन में पड़ गए। ऐसा बार-बार विलाप करते हुए वे तीन योग-पारंगत महात्मा बोले।

Verse 119

विस्मयाच्छ्राद्धमाहाम्यमभिनंद्य पुनः पुनः । स तु तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम्

विस्मित होकर उसने श्राद्ध के माहात्म्य की बार-बार प्रशंसा की। फिर उसने उस व्यक्ति को अनेक ग्रामों सहित बहुत-सा धन दिया।

Verse 120

विसृज्य ब्राह्मणं तं च वृद्धं धनमदान्वितम् । आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम्

धन के मद से युक्त उस वृद्ध ब्राह्मण को विदा करके राजा ने अपने पुत्र से कहा, जो राज-लक्षणों से संपन्न था।

Verse 121

विष्वक्सेनाभिधानं च राजाराज्येभ्यषेचयत् । मानसे सलिले सर्वे ततस्ते योगिनां वराः

और विष्वक्सेन नामक ने उसे राजाओं के राज्य पर अभिषिक्त किया। तब वे सब योगियों में श्रेष्ठ मानस-सरोवर के जल में एकत्र हुए।

Verse 122

ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन्पितृभक्ता विमत्सराः । सन्नतिश्चाभवद्धृष्टा मयैव तव दर्शितम्

वहाँ ब्रह्मदत्त आदि पितृ-भक्त और ईर्ष्या-रहित थे। उनकी विनम्र नम्रता स्पष्ट थी—यह मैंने ही तुम्हें दिखाया है।

Verse 123

राजन्योगफलं सर्वं यदेतदभिलक्ष्यते । तथेति प्राह राजापि पुरस्तादभिनंदयन्

“यह जो कुछ भी यहाँ देखा जा रहा है, वह राजयोग/राजधर्म का सम्पूर्ण फल है।” ऐसा कहकर सामने खड़े राजा ने भी प्रसन्न होकर कहा—“तथास्तु”, और अनुमोदन किया।

Verse 124

त्वत्प्रसादादिदं सर्वं मयैवं प्राप्यते फलम्

आपकी कृपा से ही यह सब मुझे प्राप्त हुआ है—यही फल (परिणाम) मैंने इस प्रकार पाया है।

Verse 125

ततस्ते योगमास्थाय सर्व एव वनौकसः । ब्रह्मरंध्रेण परमं पदमापुस्तपोबलात्

तदनन्तर वे सब वनवासी योग में स्थित होकर, तपोबल से ब्रह्मरन्ध्र (शीर्ष-छिद्र) के मार्ग से परम पद को प्राप्त हुए।

Verse 126

एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गमोक्षसुखानि च । प्रयच्छंति सुतं राज्यं नृणां तुष्टाः पितामहाः

इस प्रकार तुष्ट पितृगण मनुष्यों को आयु, धन, विद्या, स्वर्ग और मोक्ष के सुख, तथा पुत्र और राज्य-सम्पदा भी प्रदान करते हैं।

Verse 127

इदं च पितृमाहात्म्यं ब्रह्मदत्तस्य वै नृप । द्विजेभ्यः श्रावयेद्विद्वान्शृणोति पठतेपि वा । कल्पकोटिशतं साग्रं ब्रह्मलोके महीयते

हे नृप! यह पितृ-माहात्म्य ब्रह्मदत्त द्वारा कथित है। जो विद्वान इसे द्विजों को श्रवण कराए, या स्वयं सुने अथवा पढ़े भी, वह साग्र कल्प-कोटि-शत तक ब्रह्मलोक में पूजित होता है।