वसु–मोहिनी संवाद में वसु, नारायण की सम्पूर्ण उपासना-विधि बताते हैं। चार द्वारों वाले चौकोर आवरण के भीतर अष्टदल कमल-मण्डल बनाकर, आचमन और वाणी-संयम आदि शुद्धि के बाद साधक मंत्र-ध्यान से अंतःशोधन करता है—हृदय में क्ष/र का भाव, शिखा/मस्तक के चन्द्रमण्डल में एकार का न्यास; फिर अमृत-स्नान समान शुद्धि से ‘दिव्य देह’ की प्राप्ति कही गई है। इसके बाद अष्टाक्षरी न्यास, वैष्णव पंचांग सहायक, कर-शुद्धि और चतुर्व्यूह (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) का देहव्यापी चिंतन होता है। दिशाओं की रक्षा हेतु विष्णु-नामों का परितः विन्यास कर सूर्य–चन्द्र–अग्नि मण्डलों का आवाहन किया जाता है। कमल-कर्णिका में देवता की प्रतिष्ठा कर अष्टाक्षरी व द्वादशाक्षरी मंत्रों से पूजन, तथा मत्स्य, नरसिंह, वामन आदि अवतारों का आवाहन होता है। पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, गन्ध, उपवीत, दीप, धूप, नैवेद्य आदि उपचार बताए गए हैं; दलों पर व्यूह/अवतार, शंख-चक्र-गदा-शार्ङ्ग, खड्ग, तूणीर, गरुड़ आदि तथा दिक्पाल और लोकाधारों का भी विन्यास है। अंत में जप-संख्या (8/28/108), मुद्राएँ और फलश्रुति—ऐसी पूजा का दर्शन भी अक्षय विष्णु की ओर ले जाता है, पर हरि-पूजा-विधि का अज्ञान परम धाम की प्राप्ति में बाधक है।
Verse 1
वसुरुवाच । देवान् ऋषीन्पितॄंश्चान्यान्संतर्प्याचम्य वाग्यतः । हस्तमात्रं चतुष्कोणं चतुर्द्वारं सुशोभनम् ॥ १ ॥
वसु बोले—देवों, ऋषियों, पितरों और अन्य सबको विधिपूर्वक तृप्त करके, आचमन कर वाणी को संयमित रखकर, हाथ-भर का सुंदर चौकोर मंडल बनाए, जिसमें चार सुशोभित द्वार हों।
Verse 2
पुरं विलिख्य विधिजेतीरे तस्य महोदधेः । मध्ये तत्र लिखेत्पद्मष्टपत्रं सकर्णिकम् ॥ २ ॥
उस महान समुद्र के तट पर विधिपूर्वक ‘पुर’ (पवित्र आवरण) अंकित करके, उसके मध्य में कर्णिका सहित आठ पंखुड़ियों वाला कमल बनाना चाहिए।
Verse 3
एवं मंडलमालिख्य पूजयेत्तत्र मोहिनि । अष्टाक्षरविधानेन नारायणमजं विभुम् ॥ ३ ॥
हे मोहिनी! इस प्रकार मंडल बनाकर, वहाँ अष्टाक्षर मंत्र-विधान के अनुसार अज, विभु, नारायण की पूजा करनी चाहिए।
Verse 4
अथ ते संप्रवक्ष्यामि कायशोधनमुत्तमम् । क्षकारं हृदये चिंत्यं रक्तं रेफसमन्वितम् ॥ ४ ॥
अब मैं तुम्हें शरीर-शोधन की उत्तम विधि बताता हूँ—हृदय में ‘क्ष’ अक्षर का ध्यान करो, जो लाल वर्ण का हो और ‘र’ (रेफ) से युक्त हो।
Verse 5
ज्वलंतं त्रिशिखं चैव दहंतं पापसंचयम् । चंद्रमंडलमध्यस्थमेकारं मूर्ध्नि चिंतयेत् ॥ ५ ॥
चंद्र-मंडल के मध्य स्थित ‘ए’ (एकार) का ध्यान मस्तक-शिखर पर करो—जो ज्वलंत, त्रिशिखा-युक्त हो और पापों के संचित समूह को भस्म कर दे।
Verse 6
शुक्लवर्णं प्रवर्षंतममृतं प्लावयन्महीम् । एवं निर्द्धूतपापस्तु दिव्यदेहस्ततो भवेत् ॥ ६ ॥
श्वेत-वर्ण अमृत की वर्षा होती है, जिससे पृथ्वी प्लावित हो जाती है। इस प्रकार पाप पूर्णतः धुलकर साधक दिव्य देह को प्राप्त होता है॥
Verse 7
अष्टाक्षरं ततो मंत्रं न्यसेद्देहात्मनेर्बुधः । वामपादं समारभ्य क्रमशश्चैव विन्यसेत् ॥ ७ ॥
तत्पश्चात् बुद्धिमान साधक अपने ही शरीर पर अष्टाक्षर मंत्र का न्यास करे। वाम पाद से आरम्भ करके क्रमशः विधिपूर्वक स्थापित करे॥
Verse 8
पंचांगं वैष्णवं चैव चतुर्व्यूहं तथैव च । करशुद्धिं प्रकुर्वीत मूलमंत्रेण साधकः ॥ ८ ॥
साधक वैष्णव पंचांग तथा चतुर्व्यूह का ध्यान करे। और मूल-मंत्र से कर-शुद्धि अर्थात् हाथों की पवित्रता सम्पन्न करे॥
Verse 9
एकैकं चैव वर्णं तु अंगुलीषु पृथक् पृथक् । ॐकारं पृथिवी शुक्लं वामपादे तु विन्यसेत् ॥ ९ ॥
प्रत्येक वर्ण को अलग-अलग उँगलियों पर स्थापित करे। फिर श्वेत रूप से ध्येय पृथ्वी-तत्त्व सहित ॐकार को वाम पाद पर न्यास करे॥
Verse 10
नकारस्तु भावः श्यामो दक्षिणे तु व्यवस्थितः । मोकारं कालमेवाहुर्वामकट्यां निधापयेत् ॥ १० ॥
‘न’कार भाव-तत्त्व है, श्याम-वर्ण का, उसे दक्षिण भाग में स्थापित करे। ‘म’कार को काल कहा गया है; उसे वाम कटि पर न्यास करे॥
Verse 11
नाकारं पूर्वबीजं तु दक्षिणस्यां व्यवस्थितम् । राकारस्तेज इत्याहुर्नाभिदेशे व्यवस्थितः ॥ ११ ॥
‘न’ अक्षर, जो पूर्व बीज है, उसे दाहिनी ओर स्थापित करें। ‘र’ अक्षर तेजोमय कहा गया है; उसे नाभि-प्रदेश में रखें।
Verse 12
वायव्योऽयं यकारस्तु वामस्कंधे समाश्रितः । णाकारः सर्वदा ज्ञेयो दक्षिणांसे व्यवस्थितः ॥ १२ ॥
वायु-तत्त्व से संबद्ध ‘य’ अक्षर को बाएँ कंधे पर आश्रित करें। ‘ण’ अक्षर को सदा दाहिने कंधे पर स्थित समझें।
Verse 13
यकारोऽयं शिरस्थश्च यत्र लोका व्यवस्थिताः । ॐकारं हृदये न्यस्य विकारं वा शिरस्यथ ॥ १३ ॥
यह ‘य’ अक्षर शिर में स्थापित करें, क्योंकि उसी में लोक व्यवस्थित हैं। ‘ॐ’ को हृदय में न्यास करके, फिर ‘वि’ अक्षर को शिर पर रखें।
Verse 14
ष्णकारं वै शिखायां तु वेकारं कवचे न्यसेत् । नकारं नेत्रयोस्तु स्यान्मकारं चास्त्रमीरितम् ॥ १४ ॥
‘ष्ण’ अक्षर को शिखा में न्यास करें और ‘वे’ अक्षर को कवच में रखें। ‘न’ अक्षर नेत्रों में हो; ‘म’ अक्षर को अस्त्र-मंत्र कहा गया है।
Verse 15
ललाटे वासुदेवस्तु शुक्लवर्णः समास्थितः । रक्तः संकर्षणश्चैव मुखे वह्न्यकसन्निभः ॥ १५ ॥
ललाट पर श्वेतवर्ण वासुदेव प्रतिष्ठित हैं। मुख पर रक्तवर्ण संकर्षण भी विराजते हैं, जो अग्नि और सूर्य के समान प्रभामय हैं।
Verse 16
प्रद्युम्नो हृदये पीतोऽनिरुद्धो मेहने स्थितः । सर्वांगे सर्वशक्तिश्च चतुर्व्यूहार्चितो हरिः ॥ १६ ॥
प्रद्युम्न को स्वर्णवर्ण मानकर हृदय में ध्यान करो; अनिरुद्ध जननेन्द्रिय में स्थित हैं। सम्पूर्ण देह में व्याप्त सर्वशक्ति सहित हरि चतुर्व्यूह रूप से पूज्य हैं।
Verse 17
ममाग्रेऽवस्थितो विष्णुः पृष्ठतश्चापि केशवः । गोविंदो दक्षिणे पार्श्वे वामे तु मधुसूदनः ॥ १७ ॥
मेरे आगे विष्णु विराजमान हैं, और पीछे केशव। दाहिने पार्श्व में गोविंद हैं, तथा बाएँ मधुसूदन।
Verse 18
उपरिष्टात्तु वैंकुठो वाराहः पृथिवीतले । अवांतरदिशो यास्तु तासु सर्वासु माधवः ॥ १८ ॥
ऊपर वैकुण्ठ है; पृथ्वी-तल पर वराह-रूप प्रभु हैं। और समस्त अवांतर दिशाओं में, हर दिशा में, माधव विराजमान हैं।
Verse 19
गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा । नरसिंहकृता गुप्तिर्वासुदेवमयो ह्यहम् ॥ १९ ॥
चलते-फिरते या खड़े रहते, जागते या सोते हुए भी—नरसिंह द्वारा की हुई रक्षा है; क्योंकि मैं वास्तव में वासुदेवमय हूँ।
Verse 20
एवं विष्णुमयो भूत्वा ततः कर्म समारभेत् । यथा देहे तथा देवे सर्वतत्वानि योजयेत् ॥ २० ॥
इस प्रकार विष्णुमय होकर फिर कर्म का आरम्भ करे। जैसे अपने देह में, वैसे ही देवता में भी, समस्त तत्त्वों का यथायोग्य संयोजन करे।
Verse 21
फकारांतं समुद्दिष्टं सर्वविघ्नहरं शुभम् । तत्रार्कचंद्रवह्नीयनां मंडलानि विचिंतयेत् ॥ २१ ॥
‘फ’कारान्त अक्षर को शुभ और समस्त विघ्नों का हरण करने वाला कहा गया है। उस पर सूर्य, चन्द्र और अग्नि के मण्डलों का ध्यान करे।
Verse 22
पद्ममध्ये न्यसेद्विष्णुं भुवनस्यांतरस्य तु । ततो विचिंत्य हृदये प्रणवं ज्योतिरुत्तमम् ॥ २२ ॥
कमल के मध्य, जगत् के अन्तराकाश में विष्णु को स्थापित करे। फिर हृदय में प्रणव ‘ॐ’—परम ज्योति—का ध्यान करे।
Verse 23
कर्णिकायां समासीनं ज्योतीरूपं सनातनम् । अष्टाक्षरं ततो मंत्रं न्यसेच्चैव यथाक्रमम् ॥ २३ ॥
कमल की कर्णिका पर ज्योति-स्वरूप सनातन प्रभु विराजमान हैं। तत्पश्चात् अष्टाक्षर मन्त्र का यथाक्रम न्यास करे।
Verse 24
तेन व्यस्तसमस्तेन पूजनं परमं स्मृतम् । द्वादशाक्षरमंत्रेण यजेद्देवं सनातनम् ॥ २४ ॥
उसी विधि से—विस्तार से हो या संक्षेप से—पूजन परम माना गया है। द्वादशाक्षर मन्त्र से सनातन देव का यजन करे।
Verse 25
ततोऽवधार्य हृदये कर्णिकायां बहिर्न्यसेत् । चतुर्भुजं महासत्वं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ २५ ॥
फिर हृदय में दृढ़ निश्चय करके, हृदय-कमल की कर्णिका पर बाहर की ओर (प्रभु को) स्थापित करे—चतुर्भुज महापुरुष, जिनकी प्रभा कोटि-कोटि सूर्यों के समान है।
Verse 26
चिंतयित्वा महायोगं ततश्चावाहयेत्क्रमात् । मीनरूपावहश्चैव नरसिंहश्च वामनः ॥ २६ ॥
परम महायोग का ध्यान करके, फिर क्रम से उनका आवाहन करे—मीनरूप धारण करने वाले, तथा नरसिंह और वामन रूप में।
Verse 27
आयांतु देवा वरदा मम नारायणाग्रतः । सुमेरुः पादपीठं ते पद्मकल्पितमासनम् ॥ २७ ॥
वर देने वाले देवगण मेरे नारायण के सम्मुख पधारें। सुमेरु आपका पादपीठ बने और कमल-रचित आसन आपका सिंहासन हो।
Verse 28
सर्वतत्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन । पाद्यं ते पादयोर्देव पद्मनाभ सनातन ॥ २८ ॥
समस्त तत्त्वों के हित और परम प्रयोजन हेतु, हे मधुसूदन, यहाँ विराजिए। हे देव, सनातन पद्मनाभ—यह पाद्य आपके चरणों में अर्पित है।
Verse 29
विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन । मधुपर्कं महादेव ब्रह्माद्यैः कल्पितं मया ॥ २९ ॥
हे विष्णु, कमलपत्र-नेत्र मधुसूदन, हे महादेव—ब्रह्मा आदि देवों की विधि के अनुसार मैंने जो मधुपर्क बनाया है, उसे स्वीकार करें।
Verse 30
निवेदितं च भक्त्यार्घं गृहाण पुरुषोत्तम । मंदाकिन्यास्ततो वारि सर्वपापहरं शिवम् ॥ ३० ॥
हे पुरुषोत्तम, भक्ति से अर्पित यह अर्घ्य स्वीकार करें। तत्पश्चात मंदाकिनी का जल ग्रहण करें—जो शुभ है और समस्त पापों का हरण करने वाला है।
Verse 31
गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् । त्वमापः पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वायुरेव च ॥ ३१ ॥
भक्ति से अर्पित यह आचमनीय जल आप स्वीकार करें। आप ही जल और पृथ्वी हैं; आप ही ज्योति (अग्नि) हैं और आप ही वायु हैं।
Verse 32
लोकसंधृतिमात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् । देवतंतुसमायुक्ते यज्ञवर्णसमन्विते ॥ ३२ ॥
जितना जल लोक-धारण के लिए आवश्यक है, उतने ही जल से मैं स्नान-विधि करता हूँ। यह देवताओं के तंतु से संयुक्त और यज्ञ के पवित्र वर्णों से युक्त है।
Verse 33
स्वर्णवर्णप्रभे देव वाससी प्रतिगृह्यताम् । शरीरं च न जानामि चेष्टां च तव केशव ॥ ३३ ॥
हे स्वर्णवर्ण-प्रभामय देव! ये वस्त्र स्वीकार करें। हे केशव, मैं न आपके दिव्य शरीर को जानता हूँ, न आपकी लीलामयी चेष्टाओं को समझ पाता हूँ।
Verse 34
मया निवेदितं गंधं प्रतिगृह्य विलिप्यताम् । ऋग्यजुःसाममंत्रेण त्रिवृतं पद्मयोनिना ॥ ३४ ॥
मेरे द्वारा अर्पित यह गंध स्वीकार कर, इसका लेपन हो। यह पद्मयोनि (ब्रह्मा) द्वारा ऋग्-यजुः-साम मंत्रों से त्रिवार अभिमंत्रित है।
Verse 35
सावित्रीग्रंथिसंयुक्तमुपवीतं तवार्प्यते । दिव्यरत्नसमायुक्ता वह्निभानुसमप्रभाः ॥ ३५ ॥
सावित्री-ग्रंथि से संयुक्त यह उपवीत मैं आपको अर्पित करता हूँ। यह दिव्य रत्नों से सुशोभित है और अग्नि तथा सूर्य के समान प्रभामय है।
Verse 36
गात्राणि शोभयिष्यंति अलंकारास्तु माधव । सूर्याचंद्रसोमर्ज्योतिर्विद्युदग्न्योस्तथैव च ॥ ३६ ॥
हे माधव! अलंकार मेरे अंगों को शोभित करेंगे; और सूर्य, चन्द्र, सोम, विद्युत तथा अग्नि का तेज भी वैसे ही प्रकाशित होगा।
Verse 37
त्वमेव ज्योतिषां देव दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् । वनस्पतिरसो दिव्यो गंधाढ्यः सुरभिश्च ते ॥ ३७ ॥
हे देव! आप ही ज्योतियों में परम ज्योति हैं; कृपा कर यह दीप स्वीकार करें। यह वनस्पतियों के दिव्य रस (तेल) से युक्त, सुगंध से परिपूर्ण और आपके लिए सुरभित है।
Verse 38
मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् । अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समान्विताम् ॥ ३८ ॥
मेरे द्वारा भक्ति से अर्पित यह धूप कृपा कर स्वीकार करें। और षड्रसों से युक्त यह स्वादिष्ट चतुर्विध अन्न भी स्वीकार करें।
Verse 39
मया निवेदितं भक्त्या नैवेद्यं तव केशव । पूर्वे दले वासुदेवं याम्ये संकीर्षणं न्यसेत् ॥ ३९ ॥
हे केशव! भक्ति से मैंने आपके लिए नैवेद्य अर्पित किया है। पूर्व-दल (भाग) में वासुदेव को और दक्षिण-दल में संकीर्षण को स्थापित करे।
Verse 40
प्रद्युम्नं पश्चिमे कुर्यादनिरुद्धं तथोत्तरे । वाराहं च तथाग्रेये नरसिंहं च नैर्ऋते ॥ ४० ॥
पश्चिम में प्रद्युम्न को, और उत्तर में अनिरुद्ध को स्थापित करे। उत्तर-पूर्व (आग्नेय) में वाराह को तथा दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य) में नरसिंह को भी रखे।
Verse 41
वायव्यां माधवं चैव तथैशाने त्रिविक्रमम् । तथाष्टाक्षरदेवस्य गरुडं परितो न्यसेत् ॥ ४१ ॥
वायव्य दिशा में माधव का न्यास करे और ईशान दिशा में त्रिविक्रम का। तथा अष्टाक्षरी-मंत्र के देव के चारों ओर गरुड़ का विन्यास करे।
Verse 42
वामपार्श्वे तथा चक्रं शंखं दक्षिणतो न्यसेत् । तथा महागदां चैव न्यसेद्देवस्य दक्षिणे ॥ ४२ ॥
वाम पार्श्व में चक्र का न्यास करे और दक्षिण पार्श्व में शंख का। तथा देव के दाहिने भाग में महागदा भी स्थापित करे।
Verse 43
ततः शार्ङ्गधनुर्विद्वान्न्यसेद्देवस्य वामतः । दक्षिणे चेषुधी दिव्ये खङ्गं वामे च विन्यसत् ॥ ४३ ॥
तदनंतर विद्वान उपासक देव के वाम भाग में शार्ङ्ग धनुष का न्यास करे। दाहिने भाग में दिव्य इषुधि और वाम में खड्ग भी स्थापित करे।
Verse 44
श्रियं दक्षिणतः स्थाप्य पुष्टिमुत्तरतो न्यसेत् । वनमालां च पुरतस्ततः श्रीवत्सकौस्तुभौ ॥ ४४ ॥
श्री (लक्ष्मी) को दाहिनी ओर स्थापित कर, पुष्टिदेवी को उत्तर ओर न्यास करे। सामने वनमाला सजाकर, तत्पश्चात श्रीवत्स-चिह्न और कौस्तुभ मणि का विन्यास करे।
Verse 45
विन्यसेद्धृदयादीनि पूर्वादिषु चतुर्ष्वपि । ततोऽस्त्रं देवदेवस्य कोणे चैव तु विन्यसेत् ॥ ४५ ॥
हृदय आदि (अंग-न्यास) को पूर्व आदि चारों दिशाओं में विन्यस्त करे। तत्पश्चात देवाधिदेव के अस्त्र-मंत्र को कोण (मध्य दिशा) में भी स्थापित करे।
Verse 46
इंद्रमग्निं यमं चैव निर्ऋतिं वरुणं तथा । वायुं धनदमीशानमनंतं ब्रह्मणा सह ॥ ४६ ॥
इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, धनद (कुबेर), ईशान तथा अनन्त—और ब्रह्मा सहित—(यहाँ आवाहन/स्मरण किए जाते हैं)।
Verse 47
पूजयेत्तान्स्वकैर्मंत्रैरधश्चोर्ध्वं तथैव च । एवं संपूज्य देवेशं मंडलस्थं जनार्दनम् ॥ ४७ ॥
अपने-अपने मंत्रों से, नीचे और ऊपर भी, उन सबकी पूजा करे। इस प्रकार मण्डल में स्थित देवेश जनार्दन का विधिपूर्वक पूजन करके (कर्म सिद्ध होता है)।
Verse 48
लभेदभिमतान्कामान्नरो नास्त्यत्र संशयः । अनेनैव विधानेन मंडलस्थं जनार्दनम् ॥ ४८ ॥
इस विधि से मनुष्य अभिलषित कामनाएँ प्राप्त करता है—इसमें संशय नहीं। इसी विधान से मण्डलस्थ जनार्दन (विष्णु) की पूजा करे।
Verse 49
पूजितं यस्तु पश्येत्स प्रविशेद्विष्णुमव्ययम् । सकृदप्यर्चितो येन विधिनानेन केशवः ॥ ४९ ॥
जो (भगवान् को) पूजित होते देखता है, वह अव्यय विष्णु में प्रवेश करता है। क्योंकि इस विधान से केशव का एक बार भी अर्चन हो जाए तो (महाफलदायक होता है)।
Verse 50
जन्ममृत्युजरास्तीर्त्वा विष्णोः पदमवाप्नुयात् । यः स्मरेत्सततं भक्त्या नारायणमतंद्रितः ॥ ५० ॥
जो भक्तिभाव से, प्रमादरहित होकर, निरंतर नारायण का स्मरण करता है—वह जन्म, मृत्यु और जरा को पार करके विष्णु-पद को प्राप्त होता है।
Verse 51
अन्वहं तस्य वासाय श्वेतद्वीपः प्रकीर्तितः । ॐकारादिसमायुक्तं नमस्कारं तदीयकम् ॥ ५१ ॥
उनके नित्य निवास के लिए श्वेतद्वीप प्रसिद्ध है। और उनका नमस्कार वही है जो ॐकार आदि से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाता है।
Verse 52
सनाम सर्वतत्त्वानां मंत्र इत्यभिधीयते । अनेनैव विधानेन गंधपुष्पं निवेदयेत् ॥ ५२ ॥
जिस उच्चारण में समस्त तत्त्वों के नाम समाहित हों, वही ‘मंत्र’ कहलाता है। इसी विधि से गंध और पुष्प भी अर्पित करने चाहिए।
Verse 53
एकैकस्य प्रकुर्वीत यथोद्दिष्टं क्रमेण तु । मुद्रास्ततो निबध्नीयाद्यथोक्तिक्रमवेदितम् ॥ ५३ ॥
प्रत्येक कर्म को निर्देशानुसार क्रम से अलग-अलग करना चाहिए। तत्पश्चात, जैसा क्रम कहा गया है उसे जानकर मुद्राएँ बाँधनी चाहिए।
Verse 54
जपं चैव प्रकुवर्ति मूलमंत्रेण तत्ववित् । अष्टाविंशतिमष्टौ वा शतमष्टोत्तरं तथा ॥ ५४ ॥
तत्त्व का जानने वाला साधक मूल-मंत्र से जप अवश्य करे—या तो अट्ठाईस बार, या आठ बार, अथवा एक सौ आठ बार।
Verse 55
काम्येषु च यथोक्तं स्याद्यथाशक्ति समाहितः । पद्मं शंखं च श्रीवत्सं गदां गरुडमेव च ॥ ५५ ॥
काम्य कर्मों में भी जैसा कहा गया है वैसा ही, शक्ति के अनुसार मन को एकाग्र करके करना चाहिए—पद्म, शंख, श्रीवत्स, गदा और गरुड़ का भी (चिन्तन/चिह्नन) करे।
Verse 56
चक्रं खङ्गं च शार्ङ्गं च अष्टौ मुद्राः प्रकीर्तिताः । गच्छ गच्छ परं स्थानं पुराणपुरुषोत्तम ॥ ५६ ॥
चक्र, खड्ग और शार्ङ्ग धनुष—ये आठ पवित्र मुद्राओं में गिने गए हैं। हे आद्य पुरुषोत्तम, जाओ, जाओ परम धाम को।
Verse 57
यन्न ब्रह्मादयो देवा विंदंति परमं पदम् । अर्चनं ये न जानंति हरेर्मंत्रैर्यथोदितम् ॥ ५७ ॥
जो हरे के मंत्रों सहित शास्त्रोक्त विधि से अर्चन नहीं जानते, वे ब्रह्मा आदि देव भी परम पद को नहीं पाते।
Verse 58
ते त्वत्र मूलमंत्रेण पूजयंत्यच्युतं शुभे ॥ ५८ ॥
परन्तु यहाँ, हे शुभे, वे मूल मंत्र से अच्युत (विष्णु) की पूजा करते हैं।
Verse 59
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे उत्तरभागे वसुमोहिनीसंवादे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीय पुराण के उत्तरभाग में वसु–मोहिनी संवाद के अंतर्गत ‘पुरुषोत्तम माहात्म्य’ का सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
It functions as the cosmological and liturgical ‘body’ of the rite: Viṣṇu is installed in the pericarp (core), while petals and directions receive vyūhas/avatāras and protective placements, integrating inner meditation with outer sacred space.
Nyāsa sacralizes the practitioner’s body by mapping mantra-syllables onto bodily loci and tattva/element associations, enabling identification with Viṣṇu (viṣṇu-mayatā) before commencing external worship.
It asserts that proper worship and constant remembrance of Nārāyaṇa carry one beyond birth, death, and old age to Viṣṇu’s abode; remarkably, even seeing the worship performed is said to lead toward imperishable Viṣṇu.