Uttara BhagaAdhyaya 5669 Verses

Puruṣottama-kṣetra Māhātmya: Śveta-Mādhava & Matsya-Mādhava; Mārkaṇḍeya-tīrtha Mārjana and Bath Liturgy

वसु मोहिनी को श्री पुरुषोत्तम-क्षेत्र के परम पुण्य तीर्थों का माहात्म्य बताते हैं—केवल दर्शन से भी पाप नष्ट होते हैं। वे श्वेत-माधव का वैष्णव लक्षणों सहित वर्णन कर श्वेतगंगा-स्नान से श्वेतद्वीप-प्राप्ति कहते हैं। फिर मत्स्य-माधव का स्तवन करते हुए प्रलय-सागर में मत्स्यावतार के जगत्-रक्षण का स्मरण कराते हैं और हरि की एकाग्र पूजा व योग से अजेयता, राज्य-लाभ तथा अंततः मोक्ष का फल बताते हैं। आगे विधि-भाग में मर्कण्डेय सरोवर पर मार्जन, चतुर्दशी तथा ज्येष्ठ पूर्णिमा (ज्येष्ठा नक्षत्र) के विशेष काल, कल्पवट के पास जाकर प्रदक्षिणा का विधान है। अष्टाक्षरी मंत्र-न्यास, दिशात्मक विष्णु-कवच, आत्म-तादात्म्य ध्यान और तीर्थराज से स्नान-प्रार्थना दी गई है। स्नान के बाद अघमर्षण, शुद्ध वस्त्र, प्राणायाम, संध्या व सूर्य-पूजा, 108 गायत्री-जप, स्वाध्याय और कुश-विन्यास सहित देव-पितृ तर्पण का क्रम बताया है, तथा पितृ-दान पृथ्वी पर ही करने का कारण भी कहा है।

Shlokas

Verse 1

वसुरुवाच । अन्यच्छणु महाभागे तस्मिञ्छ्रीपुरुषोत्तमे । तीर्थव्रजं महत्पुण्यं दर्शनात्पापनाशनम् ॥ १ ॥

वसु बोले—हे महाभागे! उस श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र के विषय में और सुनो। वहाँ तीर्थों का महान् समूह है, अत्यन्त पुण्यदायक; जिनका दर्शन मात्र पापों का नाश करता है ॥१॥

Verse 2

अनंताख्यं वासुदेवं दृष्ट्वा भक्त्या प्रणम्य च । सर्वपापविनिर्मुक्तो नरो याति परं पदम् ॥ २ ॥

अनन्त नामक वासुदेव का दर्शन करके और भक्ति से उन्हें प्रणाम करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है ॥२॥

Verse 3

श्वेतगंगां नरः स्नात्वा यः पश्येच्छ्वतमाधवम् । मत्स्याख्यं माधवं चैव श्वेतद्वीपं स गच्छति ॥ ३ ॥

जो मनुष्य श्वेतगंगा में स्नान करके श्वेतमाधव का दर्शन करता है, और मत्स्य नामक माधव का भी—वह श्वेतद्वीप को जाता है ॥३॥

Verse 4

तुषारप्रतिमं शुद्धं शंखचक्रगदाधरम् । सर्वलक्षणसंयुक्तं पुंडरीकायतेक्षणम् ॥ ४ ॥

वे हिम-प्रभा के समान शुद्ध हैं, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले; समस्त शुभ-लक्षणों से युक्त, और कमल-पत्र के समान दीर्घ नेत्रों वाले हैं ॥४॥

Verse 5

श्रीवत्सवक्षसा युक्तं सुप्रसन्नं चतुर्भुजम् । वनमालावृतोरस्कं मुकुटांगदधारिणम् ॥ ५ ॥

उसके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था; वह अत्यन्त प्रसन्न, चतुर्भुज, वनमाला से आवृत उरःस्थल वाला, मुकुट और अंगद धारण किए हुए था।

Verse 6

पीतवस्त्रं सुपीनांसं कुंडलाभ्यामलं कृतम् । कुशाग्रेणापि राजेंद्र श्वेतगांगेयमेव च ॥ ६ ॥

हे राजेन्द्र! वह पीताम्बरधारी, पुष्ट कंधों वाला, युगल कुंडलों से सुशोभित था; और कुशा के अग्रभाग के स्पर्श मात्र से भी (सब) गंगाजल के समान श्वेत-शुद्ध हो जाता है।

Verse 7

स्पृष्ट्वा स्वर्गं गमिष्यंति विष्णुभक्ताः समाहिताः । यस्त्विमां प्रतिमां पश्येन्माधवाख्यां शशिप्रभाम् ॥ ७ ॥

उस प्रतिमा का स्पर्श करके एकाग्र विष्णुभक्त स्वर्ग को प्राप्त होते हैं—इसमें संशय नहीं। और जो कोई माधव नामक, चन्द्रप्रभा-सम दीप्त उस मूर्ति का दर्शन करता है, वह भी पुण्य पाता है।

Verse 8

शंखगोक्षीरसंकाशामशेषाघविनाशिनीम् । तां प्रणम्य सकृद्भक्त्या पुंडरीकनिभेक्षणाम् ॥ ८ ॥

शंख और गोदुग्ध के समान उज्ज्वल, समस्त पापों का नाश करने वाली, कमल-नयन देवी को जो भक्तिभाव से एक बार भी प्रणाम करता है, वह यहीं पवित्र हो जाता है।

Verse 9

विहाय सर्वकामान्वै विष्णुलोके महीयते । मन्वंतराणि तत्रैव देवकन्याभिरावृतः ॥ ९ ॥

समस्त कामनाओं का त्याग करके वह विष्णुलोक में पूजित होता है; और वहीं देवकन्याओं से घिरा हुआ, अनेक मन्वन्तरों तक निवास करता है।

Verse 10

गीयमानश्च गंधर्वैः सिद्धविद्याधरार्चितः । भुनक्ति विपुलान्भोगान्यथेष्टं दैवतैः सह ॥ १० ॥

गंधर्वों द्वारा गाया गया और सिद्ध‑विद्याधरों से पूजित वह देवताओं के साथ, अपनी इच्छा के अनुसार, अपार भोगों का उपभोग करता है।

Verse 11

च्युतस्तस्मादिहागत्य मानुष्ये ब्राह्मणो भवेत् । वेदवेदांगविद्धीमान् भोगवांश्चिरजीवितः ॥ ११ ॥

उस पद से च्युत होकर यहाँ मनुष्यलोक में आकर वह ब्राह्मण होता है—बुद्धिमान, वेद‑वेदाङ्गों का ज्ञाता, भोगसम्पन्न और दीर्घायु।

Verse 12

गजाश्वरथयानाढ्यो धनधान्यवृतः शुचिः । रूपवान्बहुभाग्यश्च पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥ १२ ॥

वह हाथी‑घोड़े‑रथ और वाहनों से सम्पन्न, धन‑धान्य से घिरा, आचरण में शुद्ध; रूपवान, अत्यन्त भाग्यशाली तथा पुत्र‑पौत्रों से युक्त होता है।

Verse 13

पुरुषोत्तमं पुनः प्राप्य वटमूलेऽथ सागरे । त्यक्त्वा देहं हरिं स्मृत्वा ततः शांतं पदं व्रजेत् ॥ १३ ॥

समुद्र के तट पर वटवृक्ष के मूल में स्थित पुरुषोत्तम को पुनः प्राप्त कर, हरि का स्मरण करते हुए देह त्यागे; तब वह शान्त पद को प्राप्त होता है।

Verse 14

श्वेतमाधवमालोक्य समीपे मत्स्यमाधवम् । एकार्णवे जले पूर्वं रूपं रोहितमास्थितः ॥ १४ ॥

श्वेत‑माधव का दर्शन कर और समीप स्थित मत्स्य‑माधव को देखकर, वह स्मरण करता है कि पूर्वकाल में एकार्णव जल में प्रभु ने रोहित (लाल मत्स्य) का रूप धारण किया था।

Verse 15

वेदानां हरणार्थाय रसातलतले स्थितः । चिंतयित्वा क्षितिं मत्स्यं तस्मिन्स्थाने व्यवस्थितम् ॥ १५ ॥

वेदों का हरण करने के उद्देश्य से वह रसातल के तल में स्थित होकर योजना सोच रहा था; उसी स्थान पर पृथ्वी को धारण करने वाले मत्स्यावतार दृढ़ होकर स्थित थे।

Verse 16

आधाय तरुणं रूपं माधवं मत्स्यमाधवम् । प्रणम्य प्रयतो भूत्वा सर्वान्कष्टान्विमुंचति ॥ १६ ॥

माधव के तरुण रूप—मत्स्य-माधव—में मन को स्थिर करके, संयमपूर्वक प्रणाम करने वाला सब कष्टों से मुक्त हो जाता है।

Verse 17

प्रयाति परमं स्थानं यत्र देवो हरिः स्वयम् । काले पुनरिहायातो राजा स्यात्पृथिवीतले ॥ १७ ॥

वह परम धाम को प्राप्त होता है जहाँ स्वयं देव हरि निवास करते हैं; और समय आने पर फिर इस लोक में लौटकर पृथ्वी पर राजा बनता है।

Verse 18

मत्स्यमाधवमासाद्य दुराधर्षो भवेन्नरः । दाता भोक्ता भवेद्योद्धा वैष्णवः सत्यसंगरः ॥ १८ ॥

मत्स्य-माधव का आश्रय लेकर मनुष्य अजेय हो जाता है। वह दानी, उचित भोग करने वाला, योद्धा, वैष्णव और सत्य के लिए संग्राम करने वाला बनता है।

Verse 19

योगं प्राप्य हरेः पश्चात्ततो मोक्षमवाप्नुयात् । मत्स्यमाधवमाहात्म्यं मया ते परिकीर्तितम् ॥ १९ ॥

हरि के साथ योग (एकत्व-भाव) प्राप्त करके, उसके बाद वह मोक्ष को पाता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें मत्स्य-माधव का माहात्म्य कहा है।

Verse 20

यं दृष्ट्वा ब्रह्मतनये सर्वान्कामानवाप्नुयात् । मार्जनं तत्र वक्ष्यामि मार्कंडेयह्रदे शुभे ॥ २० ॥

हे ब्रह्मपुत्र! जिसका दर्शन मात्र से सब अभीष्ट सिद्ध होते हैं। अब मैं उस शुभ मार्कण्डेय-ह्रद में मर्जन (शुद्धि) की विधि कहता हूँ॥२०॥

Verse 21

भक्त्या तु तन्मना भूत्वा पुराणं पुण्यमुक्तिदम् । मार्कंडेयह्रदे स्नानं सर्वकालं प्रशस्यते ॥ २१ ॥

परन्तु भक्ति से उसी में मन लगाकर—यह पुराण, जो पुण्य और मुक्ति देने वाला है—कहता है कि मार्कण्डेय-ह्रद में स्नान सर्वकाल प्रशंसनीय है॥२१॥

Verse 22

चतुर्दश्यां विशेषेण सर्वपापप्रणाशनम् । तद्वत्स्नानं समुद्रस्य सर्वकालं प्रशस्यते ॥ २२ ॥

चतुर्दशी को विशेष रूप से किया गया स्नान समस्त पापों का नाशक है; उसी प्रकार समुद्र-स्नान भी सर्वकाल प्रशंसनीय कहा गया है॥२२॥

Verse 23

पौर्णमास्यां विशेषेण हयमेधफलं लभेत् । पूर्णिमा ज्येष्ठमासस्य ज्येष्ठा ऋक्षं यदा भवेत् ॥ २३ ॥

पौर्णमासी को विशेषतः हयमेध-यज्ञ के फल के तुल्य पुण्य मिलता है—जब ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा ज्येष्ठा नक्षत्र में हो॥२३॥

Verse 24

तदा गच्छेद्विशेषण तीर्थराजं परं शुभम् । कायवाङ्मानसैः शुद्धसद्भावोऽनन्यमानसः ॥ २४ ॥

तब, हे विशिष्ट जन! वह परम शुभ तीर्थराज के पास जाए—शरीर, वाणी और मन से शुद्ध, सद्भावयुक्त, और अनन्य-चित्त होकर॥२४॥

Verse 25

सर्वद्वंद्वविनिर्मुक्तो वीतरागो विमत्सरः । कल्पवृक्षं वटं रम्यं यत्र साक्षाज्जनार्दनः ॥ २५ ॥

जो समस्त द्वंद्वों से मुक्त, आसक्ति-रहित और ईर्ष्या-रहित हो, वह उस रमणीय वट-वृक्ष का ध्यान/आश्रय करे जो कल्पवृक्ष-सा है, जहाँ साक्षात् जनार्दन विराजमान हैं।

Verse 26

प्रदक्षिणं प्रकुर्वीतं त्रीन्वारान्सुसमाहितः । दृष्ट्वा नश्यति यत्पापं सप्तजन्मसमुद्भवम् ॥ २६ ॥

पूर्ण एकाग्रता से तीन बार प्रदक्षिणा करे; उस दिव्य स्वरूप का केवल दर्शन करने से ही सात जन्मों से उपजा पाप नष्ट हो जाता है।

Verse 27

पुण्यं प्राप्नोति विपुलं गतिमिष्टां च मोहिनि । तस्य नामानि वक्ष्यामि सप्रमाणं युगे युगे ॥ २७ ॥

हे मोहिनी, (इससे) मनुष्य अपार पुण्य और इच्छित परम गति प्राप्त करता है। अब मैं युग-युग में उसके नाम प्रमाण सहित कहूँगा।

Verse 28

वटं वटेश्वरं शांतं पुराणपुरुषं विदुः । वटस्यैतानि नामानि कीर्तितानि कृतादिषु ॥ २८ ॥

उस वट को ‘वट’, ‘वटेश्वर’, ‘शांत’ और ‘पुराणपुरुष’ कहा जाता है। कृत आदि युगों में ये वट के नाम प्रसिद्ध हैं।

Verse 29

योजनं पादहीनं च योजनार्द्धतदर्द्धकम् । प्रमाणं कल्पवृक्षस्य कृतादिषु यथाक्रमम् ॥ २९ ॥

कृत आदि युगों में कल्पवृक्ष का प्रमाण क्रमशः—कृत में एक योजन; त्रेता में पाद-हीन (चौथाई कम) एक योजन; द्वापर में आधा योजन; और कलि में उसका भी आधा है।

Verse 30

पूर्वोक्तेन तु मंत्रेण नमस्कृत्त्वा च तं वटम् । दक्षिणाभिमुखो गच्छेद्धन्वंतरशतत्रयम् ॥ ३० ॥

पूर्वोक्त मंत्र से उस वटवृक्ष को नमस्कार करके, दक्षिणाभिमुख होकर तीन सौ धन्वंतर की दूरी तक आगे बढ़े।

Verse 31

यत्रासौ दृश्यते चिह्नं स्वर्गद्वारं मनोरमम् । सागरांतः समाकृष्टं काष्ठं सर्वगुणान्वितम् ॥ ३१ ॥

जहाँ वह शुभ चिह्न दिखाई देता है—स्वर्गद्वार के समान मनोहर—वहीं समुद्र की गहराई से खींचकर आया, सर्वगुणसम्पन्न काष्ठ भी है।

Verse 32

प्रणिपत्य ततस्तिष्ठेत्परिपूज्य ततः पुनः । मुच्यते सर्वपापौघैस्तथा पापग्रहादिभिः ॥ ३२ ॥

प्रणाम करके फिर श्रद्धापूर्वक वहाँ खड़ा रहे; और पुनः विधिपूर्वक पूजन करने पर, वह समस्त पापसमूह से तथा पापग्रहादि बाधाओं से मुक्त हो जाता है।

Verse 33

उग्रसेनः पुरा दृष्ट्वा स्वर्गद्वारेण सागरम् । गत्वाऽचम्य शुचिस्तत्रध्यात्वा नारायणं परम् ॥ ३३ ॥

प्राचीन काल में उग्रसेन ने स्वर्गद्वार पर समुद्र को देखकर वहाँ जाकर आचमन किया; शुद्ध होकर उसने परम नारायण का ध्यान किया।

Verse 34

न्यसेदष्टाक्षरं मंत्रं पश्चाद्धस्तशरीरयोः । ॐ नमो नारायणायेति यं वदंति मनीषिणः ॥ ३४ ॥

तदनन्तर हाथों और शरीर पर अष्टाक्षर मंत्र का न्यास करे—जिसे मनीषीजन ‘ॐ नमो नारायणाय’ कहते हैं।

Verse 35

किं कार्यं बहुभिर्मंत्रैर्मनोविभवकारकैः । नमोनारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ ३५ ॥

मन की चतुराई दिखाने वाले अनेक मंत्रों से क्या प्रयोजन? ‘नमो नारायणाय’ मंत्र स्वयं ही समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है।

Verse 36

आपो नरस्य सूनुत्वान्नारा इति ह कीर्तिताः । विष्णोस्तस्त्वालयं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ ३६ ॥

जल (आपः) नर के पुत्र होने से ‘नारा’ कहलाते हैं। प्राचीन काल से वे विष्णु-तत्त्व का आलय हैं, इसलिए भगवान ‘नारायण’ स्मरण किए जाते हैं।

Verse 37

नारायणपरा वेदा नारायणपरा द्विजाः । नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरा क्रिया ॥ ३७ ॥

वेदों का परम केंद्र नारायण हैं; द्विजों का भी आश्रय नारायण हैं। ज्ञान का परम लक्ष्य नारायण हैं और क्रिया (कर्म) भी नारायण-परायण है।

Verse 38

नारायणपरो धर्मो नारायणपरं तपः । नारायणपरं दानं नारायणपरं व्रतम् ॥ ३८ ॥

धर्म नारायण-परायण हो; तप नारायण-परायण हो। दान नारायण के लिए हो और व्रत भी नारायण के लिए ही हो।

Verse 39

नारायणपरा लोका नारायणपराः सुराः । नारायणपरं नित्यं नारायणपरं पदम् ॥ ३९ ॥

समस्त लोक नारायण-परायण हैं; देवता भी नारायण-परायण हैं। नित्यतः परम लक्ष्य नारायण ही हैं और परम पद भी नारायण ही हैं।

Verse 40

नारायणपरा पृथ्वी नारायणपरं जलम् । नारायणपरो वह्निर्नारायणपरं नभः ॥ ४० ॥

पृथ्वी नारायण-परायण है, जल नारायण-निष्ठ है। अग्नि नारायण-पर है और नभ (आकाश) भी नारायण-पर है।

Verse 41

नारायणपरो वायुर्नारायणपरं मनः । अहंकारश्च बुद्धिश्च उभे नारायणात्मके ॥ ४१ ॥

वायु (प्राण) नारायण-पर है, मन नारायण-पर है। अहंकार और बुद्धि—दोनों ही नारायण-स्वरूप हैं।

Verse 42

भूतं भव्यं भविष्यच्च यत्किंचिज्जीवसंज्ञितम् । स्थूलं सूक्ष्मं परं चैव सर्वं नारायणात्मकम् ॥ ४२ ॥

भूत, वर्तमान और भविष्य—जो कुछ भी ‘जीव’ कहलाता है, स्थूल, सूक्ष्म और पर—सब कुछ नारायण-स्वरूप ही है।

Verse 43

नारायणात्परं किंचिन्नेह पश्यामि मोहिनि । तेन व्याप्तमिदं सर्वं दृश्यादृश्यं चराचरम् ॥ ४३ ॥

हे मोहिनि! मैं यहाँ नारायण से परे कुछ भी नहीं देखता। उसी से यह समस्त जगत व्याप्त है—दृश्य-अदृश्य, चर-अचर सब।

Verse 44

आपो ह्यायतनं विष्णोः स चा सावम्भसांपतिः । तस्मादप्सु स इत्येवं नारायणमघापहम् ॥ ४४ ॥

जल ही विष्णु का आयतन (आवास) है और वही जलों के स्वामी हैं। इसलिए ‘अप्सु सः’—जल में निवास करने वाले—वे नारायण, पापहर कहलाते हैं।

Verse 45

स्नानकाले विशेषेण चोपस्थाय जले शुचिः । स्मरेन्नारायणं ध्यायेद्धस्ते काये च विन्यसेत् ॥ ४५ ॥

स्नान के समय विशेषतः शुद्ध होकर जल में खड़े होकर नारायण का स्मरण करे, उनका ध्यान करे और मंत्र का न्यास हाथों तथा शरीर पर करे।

Verse 46

ॐकारं वामकट्यां तु नाकारं दक्षिणे तथा । राकारं नाभिदेशे तु यकारं वामबाहुके ॥ ४६ ॥

ॐकार को बाईं कटि पर रखे, ‘न’ को दाईं ओर; ‘र’ को नाभि-प्रदेश में और ‘य’ को बाएँ बाहु पर विन्यस्त करे।

Verse 47

णाकारं दक्षिणे न्यस्य यकारं मूर्ध्नि विन्यसेत् । अधश्चोर्द्ध्वं च हृदये पार्श्वतः पृष्ठतोऽग्रतः ॥ ४७ ॥

‘ण’कार को दाईं ओर न्यास करे और ‘य’कार को मस्तक-शिखर पर रखे। फिर हृदय में भी—नीचे-ऊपर, दोनों पार्श्वों में, पीछे और आगे—विन्यास करे।

Verse 48

ध्यात्वा नारायणं पश्चादारभेत्कवचं बुधः । पूर्वे मां पातु गोविंदो दक्षिणे मधुसूदनः ॥ ४८ ॥

पहले नारायण का ध्यान करके फिर बुद्धिमान भक्त कवच का आरम्भ करे। पूर्व दिशा में गोविन्द मेरी रक्षा करें, और दक्षिण में मधुसूदन।

Verse 49

पश्चिमे श्रीधरो देवः केशवस्तु तथोत्तरे । पातु विष्णुस्तथाग्नेये नैर्ऋते माधवोऽव्ययः ॥ ४९ ॥

पश्चिम में देव श्रीधर मेरी रक्षा करें, और उत्तर में केशव। आग्नेय दिशा में विष्णु रक्षा करें, और नैऋत्य में अव्यय माधव।

Verse 50

वायव्ये तु हृषीकेशस्तथेशाने च वामनः । भूतले पातु वाराहस्तथोर्द्ध्वे च त्रिविक्रमः ॥ ५० ॥

वायव्य दिशा में मेरी रक्षा हृषीकेश करें, और ईशान दिशा में वामन। पृथ्वी पर वराह मेरी रक्षा करें, तथा ऊर्ध्व लोकों में त्रिविक्रम रक्षा करें॥५०॥

Verse 51

कृत्वैवं कवचं पश्चादात्मानं चिंतयेत्ततः । अहं नारायणो देवः शंखचक्रगदाधरः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार कवच करके, फिर अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करे—“मैं नारायण देव हूँ, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाला।”॥५१॥

Verse 52

एवं ध्यात्वा तदात्मानमिमं मन्त्रमुदीरयेत् । त्वमग्निर्द्विपदां नाथ रेतोधाः कामदीपनः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार उस तत्त्व से तादात्म्य का ध्यान करके, यह मंत्र उच्चारे—“हे द्विपदों के नाथ! आप अग्नि हैं; आप रेतोधा हैं, काम को प्रज्वलित करने वाले।”॥५२॥

Verse 53

प्रधानः सर्वभूतानां जीवानां प्रभुख्ययः । अमृतस्यारणिस्त्वं हि देवयोनिरपांपते ॥ ५३ ॥

आप समस्त भूतों में प्रधान हैं, जीवों के प्रभु के नाम से प्रसिद्ध हैं। हे अपांपते! आप ही अमृत की अरणि हैं, देवों की योनि (उत्पत्तिस्रोत) हैं॥५३॥

Verse 54

वृजिनं हर मे सर्वं तीर्थराज नमोऽस्तु ते । एवमुच्चार्य विधिवत्ततः स्नानं समाचरेत् ॥ ५४ ॥

“हे तीर्थराज! मेरा समस्त पाप हर लें; आपको नमस्कार है।” ऐसा विधिपूर्वक उच्चारकर, फिर नियमानुसार स्नान करे॥५४॥

Verse 55

अन्यथा ब्रह्मतनये स्नानं तत्र न शस्यते । कृत्वा चाब्दैवतैमत्रैरभिषेकं च मार्जनम् ॥ ५५ ॥

अन्यथा, हे ब्रह्मा-पुत्र, वहाँ स्नान करना प्रशस्त नहीं है। पहले वर्ष-देवताओं के मंत्रों से अभिषेक और मार्जन करके शुद्धि करनी चाहिए।

Verse 56

अन्तर्जले जपन्पश्चात्त्रिरावृत्याघमर्षणम् । हयमेधो यथा देवि सर्वपापहरः क्रतुः ॥ ५६ ॥

फिर जल के भीतर खड़े होकर जप करते हुए अघमर्षण कर्म तीन बार करना चाहिए। हे देवी, जैसे अश्वमेध यज्ञ सर्वपापहर है, वैसे ही यह भी सब पापों का नाशक होता है।

Verse 57

तथाघमर्षणं चात्र सूक्तं सर्वाघपर्षणम् । उत्तीर्य वाससी धौते निर्मले परिधाय च ॥ ५७ ॥

इसी प्रकार यहाँ सर्वपाप-नाशक अघमर्षण सूक्त का पाठ करे। फिर जल से बाहर निकलकर धुले हुए, निर्मल दो वस्त्र धारण करे।

Verse 58

प्राणानायम्य चाचम्य संध्यां चोपास्य भास्करम् । उपातिष्ठेत्ततश्चोर्द्ध्वं क्षिप्त्वा पुष्पजलाञ्जलिम् ॥ ५८ ॥

प्राणायाम करके और आचमन करके, संध्या तथा भास्कर (सूर्य) की उपासना करे। फिर पुष्प और जल की अंजलि अर्पित करके ऊपर की ओर खड़ा हो।

Verse 59

उपस्थायोर्द्धबाहुश्च तल्लिंगैभांस्करं ततः । गायत्रीं पावनीं देवीं जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥ ५९ ॥

फिर खड़े होकर भुजाएँ ऊपर उठाए, उन निर्धारित लक्षणों से भास्कर की उपासना करे। इसके बाद पावनी देवी गायत्री का जप एक सौ आठ बार करे।

Verse 60

अन्यांश्च सोरमन्त्रान्हि जप्त्वा तिष्ठन्समाहितः । कृत्वा प्रदक्षिणं सूर्यं नमस्कृत्योपविश्य च ॥ ६० ॥

तब साधक मन को समाहित रखकर खड़ा होकर अन्य सौर मन्त्रों का जप करे। सूर्य की प्रदक्षिणा करके, नमस्कार कर, फिर बैठ जाए।

Verse 61

स्वाध्यायं प्राङ्मुखः कृत्वा तर्पयेद्देवमानवान् । ऋषीन्पितॄन्हि स्वीयांश्च विधिवन्नामगोत्रवित् ॥ ६१ ॥

पूर्वमुख होकर स्वाध्याय करके, देवों और मनुष्यों को तर्पण दे। फिर ऋषियों, पितरों और अपने दिवंगत स्वजनों को भी नाम-गोत्र जानकर विधिपूर्वक तर्पित करे।

Verse 62

तोयेन तिलमिश्रेण विधिवत्सुसमाहितः । श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन निर्वपेत् ॥ ६२ ॥

तिल मिले जल से, विधि के अनुसार पूर्ण एकाग्र होकर, श्राद्ध में और हवन के समय भी, एक ही हाथ से अर्पण करे।

Verse 63

तर्पणे तूभयं कुर्यादेष एव विधिः सदा । अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ॥ ६३ ॥

तर्पण में दोनों प्रकार से करना चाहिए; यही नियम सदा है—बाएँ हाथ से बिना सहारा दिए, और दाएँ हाथ से विधि के अनुसार।

Verse 64

तृप्यतामिति सुव्यक्तं नामगोत्रेण वाग्यतः । कायस्थैर्यस्तिलैर्मोहात्करोति पितृतर्पणम् ॥ ६४ ॥

“तृप्यताम्” ऐसा स्पष्ट कहकर, नाम-गोत्र का उच्चारण संयत वाणी से करे। शरीर में स्थिर रहकर तिल सहित पितृतर्पण करे—यद्यपि बहुत से लोग इसे मोहवश ही करते हैं।

Verse 65

तर्पितास्तेन पितरस्त्वङ्मांसरुधिरास्थिभिः । जले स्थित्वा स्थले दत्तं स्थले स्थित्वा जलेऽर्पितम् ॥ ६५ ॥

उस कर्म से पितर त्वचा, मांस, रक्त और अस्थियों से तृप्त किए हुए-से होते हैं—मानो जल में खड़े होकर दिया हुआ दान स्थल पर दिया गया हो, और स्थल में खड़े होकर अर्पित किया जल में फेंका गया हो।

Verse 66

नोपतिष्ठति तत्तोयं यद्भूम्यां न प्रतदीयते । पितॄणामक्षयं स्थानं मही दत्ता विरंचिना ॥ ६६ ॥

जो जल भूमि पर नहीं डाला जाता, वह वास्तव में अर्पण-रूप से उपस्थित नहीं होता। क्योंकि विरञ्चि (ब्रह्मा) द्वारा प्रदत्त यह पृथ्वी पितरों का अक्षय स्थान है।

Verse 67

तस्मात्तत्रैव दातव्यं पितॄणां प्रीतिमिच्छता । भूमिस्तेन समुत्पन्ना भूम्यां चैव तु संस्थितम् ॥ ६७ ॥

इसलिए जो पितरों की प्रीति चाहता है, उसे अर्पण वहीं करना चाहिए। क्योंकि उसी से पृथ्वी उत्पन्न हुई है और पृथ्वी में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है।

Verse 68

भूम्यां चैव लयं यांति भूमौ दद्यात्ततो जलम् । आस्तीर्य च कुशान्साग्रानावाह्य स्वस्वमन्त्रतः । प्राचीनाग्रेषु वै देवान्याम्याग्रेषु तथा पितॄन् ॥ ६८ ॥

सब कुछ अंत में भूमि में ही लय को प्राप्त होता है; इसलिए पहले भूमि पर जल अर्पित करे। फिर अग्रभाग सहित कुश बिछाकर, अपने-अपने मंत्रों से आवाहन करे—पूर्वाभिमुख अग्रों पर देवताओं का और दक्षिणाभिमुख अग्रों पर पितरों का।

Verse 69

इति श्रीबगृहन्नारदीयपुराणोत्तरभागे मोहिनीवसुसंवादे पुरुषोत्तममाहात्म्ये षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥

इस प्रकार श्री बृहन्नारदीयपुराण के उत्तरभाग में, मोहिनी और वसु के संवाद में, ‘पुरुषोत्तम-माहात्म्य’ नामक छप्पनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Matsya-Mādhava functions as a tīrtha-linked icon where avatāra memory becomes soteriology: meditative fixation and reverential worship promise relief from hardships, attainment of Hari’s abode, and eventual liberation (mokṣa), while also granting dharmic worldly power (invincibility, righteous kingship) framed as subordinate to yoga with Hari.

Nyāsa sacralizes the practitioner’s body as a mantra-body aligned to Nārāyaṇa, while the kavaca establishes directional protection through Viṣṇu’s names. Together they convert bathing from a physical act into a consecrated rite (mārjana/śuddhi) that is doctrinally grounded in Nārāyaṇa as the indwelling principle of waters and the supreme telos of dharma and knowledge.

It argues that the earth—granted by Brahmā (Virañci)—is the imperishable abode/support of the Pitṛs; therefore offerings become properly ‘established’ when placed upon earth. This instruction reorients tarpaṇa from mere immersion to a cosmological placement rule (ādhāra), followed by kuśa arrangement and differentiated invocations to Devas and Pitṛs.