वसु मोहिनी को गंगा-अवगाहन (पवित्र स्नान) से आरम्भ होने वाले कर्मों के फल बताते हैं और गंगा को पुण्य-वर्धिनी तथा पितरों के उद्धार का प्रत्यक्ष साधन कहते हैं। गंगा-तट पर संध्या, कुश-तिल सहित पितृ-तर्पण और गंगा-जल की ऐसी महिमा वर्णित है कि नरकस्थ पितर भी उससे लाभ पाते हैं। गंगा-स्नान को नित्य शिवलिंग-पूजन, मंत्र-जप—अष्टाक्षरी ‘ॐ नमो नारायणाय’ और पंचाक्षरी ‘ॐ नमः शिवाय’—तथा गंगा-तट की मिट्टी से मूर्ति/लिंग-प्रतिष्ठा से जोड़ा गया है; नित्य अर्पण-विसर्जन से अनन्त पुण्य कहा गया है। वैशाख में अक्षय तृतीया और कार्तिक में रात्रि-जागरण सहित विष्णु, गंगा और शम्भु की भक्ति-सेवा का व्रत-कल्प बताया गया। उत्तरार्ध में दान-शास्त्र का विस्तार है—घृतधेनु, गौ, स्वर्ण, भूमि (निवर्तन माप), ग्रामदान, गंगा-तट पर उपवन व निवास-निर्माण—और प्रत्येक दान के फल को विष्णुलोक, शिवलोक, ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, गन्धर्वलोक आदि से जोड़ा गया है; अंत में ज्ञान और ब्रह्म-साक्षात्कार को परम फल कहा गया है।
Verse 1
वसुरुवाच । अथावगाहनादीनां कर्मणां फलमुच्यते । सावधाना श्रृणुष्व त्वं ब्रह्मपुत्रि नृपप्रिये ॥ १ ॥
वासु बोले—अब अवगाहन (तीर्थ-स्नान) आदि कर्मों के फल कहे जाते हैं। हे ब्रह्मपुत्री, राजप्रिय, तुम सावधान होकर सुनो।
Verse 2
यैः पुण्यवाहिनी गंगा सकृद्भक्त्यावगाहिता । तेषां कुलानां लक्षं तु भवात्तारयते शिवा ॥ २ ॥
जिन्होंने पुण्य-वाहिनी गंगा में एक बार भी भक्ति से अवगाहन किया है, उन कुलों की एक लाख पीढ़ियों को शिवा-स्वरूपिणी गंगा भव-बन्धन से तार देती है।
Verse 3
सामान्यस्थानतो देवि तत्र संध्या ह्युपासिता । पुण्यं लक्षगुणं कर्तुं समर्था द्विजपावनी ॥ ३ ॥
हे देवि, सामान्य स्थान से भी जहाँ संध्या-उपासना की जाती है, वह द्विजों को पवित्र करने वाली होकर पुण्य को लक्षगुणा बढ़ाने में समर्थ होती है।
Verse 4
दत्ताः पितृभ्यो यत्रापस्तनयैः श्रद्धयान्वितैः । अक्षयां तु प्रकुर्वंति तृप्तिं मोहिनि दुर्लभाम् ॥ ४ ॥
हे मोहिनि, जहाँ श्रद्धायुक्त अपस्तनय (वंशज) पितरों को जल-दान करते हैं, वहाँ वे दुर्लभ अक्षय तृप्ति प्रदान करते हैं।
Verse 5
यावंतश्च तिला मर्त्यार्गृहीताः पितृकर्मणि । तावद्वर्षसहस्राणि पितरः स्वर्गवासिनः ॥ ५ ॥
पितृकर्म में मनुष्यों द्वारा जितने तिल ग्रहण किए जाते हैं, उतने ही सहस्र वर्षों तक पितर स्वर्ग में निवास करते हैं।
Verse 6
पितृलोकेषु ये केचित्सर्वेषां पितरः स्थिताः । तर्प्यमाणाः परां तृप्तिं यांति गंगाजलैः शुभैः ॥ ६ ॥
पितृलोकों में स्थित जो-जो समस्त पितर हैं, वे शुभ गंगाजल से तर्पण किए जाने पर परम तृप्ति को प्राप्त होते हैं।
Verse 7
य इच्छेत्सफलं जन्म संततिं वा शुभानने । स पितॄंस्तर्पयेद्गंगामभिगम्य सुरांस्तथा ॥ ७ ॥
हे शुभानने, जो सफल जीवन या संतान की इच्छा करे, वह गंगा के पास जाकर पितरों को तर्पण दे और उसी प्रकार देवताओं को भी अर्पण करे।
Verse 8
ये मता दुर्गता मर्त्यास्तर्पितास्तत्कुलोद्भवैः । कुशैस्तिलैर्गांगजलैस्ते प्रयांति हरेः पदम् ॥ ८ ॥
जो मृतक दुर्भाग्य से मरे हुए माने जाते हैं, वे भी अपने ही कुल के वंशजों द्वारा कुशा, तिल और गंगाजल से तृप्त किए जाने पर श्रीहरि के परम धाम को प्राप्त होते हैं।
Verse 9
स्वर्गसस्थाश्च ये केचित्पितरः पुण्यशीलिनः । ते तर्पिता गांगजलैर्मोक्षे यांति विधेर्वचः ॥ ९ ॥
स्वर्ग में स्थित जो-जो पुण्यशील पितृगण हैं, वे गंगाजल के तर्पण से तृप्त होकर शास्त्र-विधान के अनुसार मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
Verse 10
मासं तर्पणमात्रेण पिंडसंपातनेन च । गंगायां पितरः सर्वे सुप्रीताः सूर्यवर्चसः ॥ १० ॥
गंगा में एक मास तक केवल तर्पण करने से और पिंडदान करने से भी, समस्त पितृगण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और सूर्य के समान तेजस्वी हो उठते हैं।
Verse 11
अप्सरो गणणसंयुक्तान्हेमरत्नविभूषितान् । मुक्ताजालपरिच्छन्नान्वेणुवीणानिनादितान् ॥ ११ ॥
उसने अप्सराओं के समूह देखे—जो स्वर्ण और रत्नों से विभूषित थे, मोतियों के जाल से आच्छादित थे, और वेणु तथा वीणा के नाद से गूँज रहे थे।
Verse 12
भेरीशंखमृदंगादिनिर्घोषान्स्रग्विभूषितान् । गन्धर्वदेहरुचिरान्दिव्यभोगसमन्वितान् ॥ १२ ॥
उसने माला से विभूषित, भेरी-शंख-मृदंग आदि के घोष से गूँजते, गंधर्वों के समान रुचिर देह वाले और दिव्य भोगों से युक्त (समूह) देखे।
Verse 13
आरुह्य तु विमानाग्र्यान्ब्रह्यलोकं प्रयांति हि । गंगायां तु नरः स्नात्वा यो नित्यं लिंगमर्चयेत् ॥ १३ ॥
वे निश्चय ही श्रेष्ठ विमानों पर आरूढ़ होकर ब्रह्मलोक को जाते हैं। जो मनुष्य गंगा में स्नान करके नित्य शिवलिंग की अर्चना करता है, वह वही फल प्राप्त करता है।
Verse 14
एकेन जन्मना मोक्षं परमान्पोति स ध्रुवम् । अग्निहोत्राणि वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः ॥ १४ ॥
वह एक ही जन्म में निश्चय ही परम मोक्ष को प्राप्त करता है। अग्निहोत्र, वेदाध्ययन तथा बहु-दक्षिणा सहित यज्ञ भी (उस सिद्धि के समकक्ष नहीं)।
Verse 15
गंगायां लिंगपूजायाः कोट्यंशेनापि नो समाः । पितॄनुदिश्य वा देवान्गंगांभिभिः प्रसिंचयेत् ॥ १५ ॥
गंगा-तट पर लिंग-पूजा के कोट्यंश के भी बराबर अन्य कर्म नहीं हैं। अथवा पितरों या देवताओं को उद्देश कर गंगाजल से उनका प्रक्षालन/अभिषेक करे।
Verse 16
तृप्ताः स्युस्तस्य पितरो नरकस्थाश्च तत्क्षणात् । मृत्कुंभात्ताम्रकुंभैस्तु स्नानं दशगुणं स्मृतम् ॥ १६ ॥
उसके पितर उसी क्षण तृप्त हो जाते हैं, चाहे वे नरक में ही क्यों न हों। और मिट्टी के घड़े की अपेक्षा तांबे के घड़े से स्नान का पुण्य दसगुना कहा गया है।
Verse 17
रौप्यैः शतगुणं पुण्यं हेमैः कोटिगुणं स्मृतम् । एवमर्घे च नैवेद्ये बलिपूजादिषु क्रमात् ॥ १७ ॥
रजत-पात्र से पुण्य शतगुण कहा गया है और स्वर्ण-पात्र से कोटिगुण। इसी प्रकार अर्घ्य, नैवेद्य, बलि, पूजा आदि में भी क्रमशः यही वृद्धि मानी गई है।
Verse 18
पात्रां तरविशेषेण फलं चैवोत्तरोत्तरम् । विभवे सति यो मोहान्न कुर्याद्विधिविस्तरम् ॥ १८ ॥
पात्र विशेष न भी हो, तो भी दान की वस्तु की श्रेष्ठता के अनुसार फल क्रमशः बढ़ता है। पर जिसके पास सामर्थ्य होते हुए भी जो मोह से विधि का पूरा विस्तार नहीं करता, वह उच्च फल से वंचित रहता है।
Verse 19
न स तत्कर्मफलभाग्देवद्रोही प्रकीर्त्यते । देवानां दर्शनं पुण्यं दर्शनात्स्पर्शनं वरम् ॥ १९ ॥
देवों से द्वेष रखने वाला उस कर्म के फल का भागी नहीं कहा जाता। देवों का दर्शन पुण्यदायक है, और दर्शन से भी श्रेष्ठ उनका स्पर्श (पावन सान्निध्य) है।
Verse 20
स्पर्शनादर्चनं श्रेष्ठं घृतस्नानमतः परम् । प्राहुर्गंगाजलैः स्नानं घृतस्नानसमं बुधाः ॥ २० ॥
स्पर्श से भी श्रेष्ठ पूजन है, और उससे भी ऊपर घृत-स्नान है। बुद्धिमान कहते हैं कि गंगा-जल में स्नान का पुण्य घृत-स्नान के समान है।
Verse 21
अर्घ्यं द्रव्यविशेषेण गंगातोयेन यः सकृत् । मागधप्रस्थमात्रेण ताम्रपात्रस्थितेन च ॥ २१ ॥
जो व्यक्ति गंगा-जल से, नियत सामग्री सहित, केवल एक बार भी अर्घ्य दे—मागध-प्रस्थ मात्र परिमाण में और ताम्र-पात्र में रखकर—वह उक्त पुण्य को प्राप्त करता है।
Verse 22
देवताभ्यः प्रदद्यात्तु स्वकीयपितृभिः सह । पुत्रपौत्रैश्च संयुक्तः स च वै स्वर्गमाप्नुयात् । आपः क्षीरं कुशाग्राणि घृतं दधि तथा मधु ॥ २२ ॥
मनुष्य को देवताओं को अर्पण अवश्य करना चाहिए और अपने पितरों के साथ भी। पुत्र-पौत्रों सहित जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही स्वर्ग को प्राप्त होता है। (अर्पण में) जल, दूध, कुश के अग्रभाग, घी, दही तथा मधु होते हैं।
Verse 23
रक्तानि करवीराणि तथा वै रक्तचन्दनम् । अष्टाङ्गैरेष युक्तोऽर्घो भानवे परिकीर्तितः ॥ २३ ॥
लाल कनेर के पुष्प तथा लाल चन्दन मिलाकर, आठ अंगों से युक्त यह अर्घ्य भानु (सूर्यदेव) के लिए उचित कहा गया है।
Verse 24
विष्णोः शिवस्य सूर्य्यस्य दुर्गाया ब्रह्मणस्तथा । गंगातीरे प्रतिष्ठां तु यः करोति नरोत्तमः ॥ २४ ॥
जो उत्तम पुरुष गंगा-तट पर विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा तथा ब्रह्मा की प्रतिष्ठा करता है, वह महान पुण्य का भागी होता है।
Verse 25
तथैवायतनान्येषां कारयत्यपि शक्तितः । अन्यतीर्थेषु करणात्कोटिगुणं भवेत् ॥ २५ ॥
इसी प्रकार जो अपनी शक्ति के अनुसार अन्य देवालय/आयतन बनवाता है, तो अन्य तीर्थ में ऐसा करने से उसका पुण्य करोड़ गुना हो जाता है।
Verse 26
गंगातीरसमुद्भूतमृदा लिगानि शक्तितः । सलक्षणानि कृत्वा तु प्रतिष्ठाप्य दिने दिने ॥ २६ ॥
गंगा-तट से उत्पन्न मिट्टी लेकर, अपनी शक्ति के अनुसार लक्षणयुक्त शिवलिंग बनाकर, उन्हें प्रतिदिन प्रतिष्ठित करना चाहिए।
Verse 27
मंत्रेश्च पत्रपुष्पाद्यैः पूजयित्वा च शक्तितः । गंगायां निक्षिपेन्नित्यं तस्य पुण्यमनंतकम् ॥ २७ ॥
मंत्रों तथा पत्ते-फूल आदि से अपनी शक्ति के अनुसार पूजन करके, उसे नित्य गंगा में प्रवाहित/निक्षेप करना चाहिए; उसका पुण्य अनन्त होता है।
Verse 28
सर्वानंदप्रदायिन्यां गंगायां यो नरोत्तमः । अष्टाक्षरं जपेद्भक्त्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता ॥ २८ ॥
जो नरश्रेष्ठ सर्वानन्ददायिनी गंगा में भक्तिभाव से अष्टाक्षरी मंत्र का जप करता है, उसकी मुक्ति मानो उसके हाथ की हथेली में स्थित हो जाती है।
Verse 29
नमो नारायणायेति प्रणवाद्यं नियम्य च । षण्मासं जपतः सर्वा ह्युपतिष्ठंति सिद्धयः ॥ २९ ॥
प्रणव से आरम्भ ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मंत्र को नियमपूर्वक साधकर जो छह मास तक जप करता है, उसके पास समस्त सिद्धियाँ निश्चय ही उपस्थित हो जाती हैं।
Verse 30
नमः शिवायेति मंत्रं सतारं विधिना तु यः । चतुर्विशतिलक्षं वै जपेत्साक्षात्सशंकरः ॥ ३० ॥
जो विधिपूर्वक प्रणव सहित ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का चौबीस लाख जप करता है, वह प्रत्यक्ष रूप से शंकरस्वरूप हो जाता है।
Verse 31
पंचाक्षरी सिद्धविद्या शिव एव न संशयः । अपवित्रः पवित्रो वा जपन्निष्पातको भवेत् ॥ ३१ ॥
पंचाक्षरी सिद्धविद्या है—वह निःसंदेह साक्षात् शिव ही है। अपवित्र हो या पवित्र, उसका जप करने से मनुष्य पापरहित हो जाता है।
Verse 32
पूजितायां तु गंगायां पूजिताः सर्व देवताः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूजयेदमरापगाम् ॥ ३२ ॥
गंगा की पूजा होने पर समस्त देवताओं की पूजा हो जाती है। इसलिए सर्वप्रयत्न से अमरापगा—दिव्य गंगा—की आराधना करनी चाहिए।
Verse 33
चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च सर्वावयवशोभिताम् । रत्नकुंभसितांभोजवराभयकरं शुभाम् ॥ ३३ ॥
वह शुभा देवी चार भुजाओं और तीन नेत्रों वाली, अंग-अंग से दीप्तिमान है; हाथों में रत्न-कुंभ और श्वेत कमल धारण करती, वर और अभय-मुद्रा दिखाती है।
Verse 34
श्वेतवस्त्रपरीधानां मुक्तामणिविभूषिताम् । सुप्रसन्नां सुवदनां करुणार्द्रहृदंबुजाम् ॥ ३४ ॥
वह श्वेत वस्त्र धारण किए, मोती-मणियों से विभूषित है; अत्यन्त प्रसन्न, सुन्दर मुख वाली, और करुणा से आर्द्र कमल-हृदया है।
Verse 35
सुधाप्लावितभूपृष्ठां त्रैलोक्यनमितां सदा । ध्यात्वा जलमयीं गंगां पूजयन्पुण्यभाग्भवेत् ॥ ३५ ॥
जो गंगाजी को ध्यान करे—जिनके जल से पृथ्वी अमृतवत् प्लावित होती है और जिन्हें त्रैलोक्य सदा नमस्कार करता है—और उनकी जलमयी रूप में पूजा करे, वह महान् पुण्य का भागी होता है।
Verse 36
मासार्द्धमपि यस्त्वेवं नैरंतर्येण पूजयेत् । स एव देवसदृशो बहुकाले फलाधिकः ॥ ३६ ॥
जो इस प्रकार निरन्तर केवल आधे मास तक भी पूजा करे, वही देवतुल्य हो जाता है और दीर्घकाल में उससे भी अधिक फल प्राप्त करता है।
Verse 37
वैशाखशुक्लसप्तम्यां जह्नुना जाह्नवी पुरा । क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरंघ्रात्तु दक्षिणात् ॥ ३७ ॥
पूर्वकाल में वैशाख शुक्ल सप्तमी को, क्रोधवश ऋषि जह्नु ने जाह्नवी (गंगा) को पी लिया; फिर उसे छोड़ दिया, और वह उनके दाहिने कान के छिद्र से प्रकट हुई।
Verse 38
तां तत्र पूजयेद्देवीं गंगां गगनमेखलाम् । अक्षयायां तु वैशाखे कार्तिकेऽपि शुभानने ॥ ३८ ॥
वहाँ उस देवी गंगा की पूजा करनी चाहिए, जो आकाश की मेखला-सी है—विशेषकर वैशाख की अक्षया तृतीया में, और कार्तिक में भी, हे शुभानने।
Verse 39
रात्रौ जागरणं कृत्वा यवान्नैश्च तिलैस्तथा । विष्णुं गंगां च शंभुं च पूजयेद्भक्ति भावतः ॥ ३९ ॥
रात भर जागरण करके, जौ के अन्न और तिल आदि अर्पित करते हुए, भक्तिभाव से विष्णु, गंगा और शंभु की पूजा करनी चाहिए।
Verse 40
तथा सुगंधैः कुसुमैः कुंकुमागरुमंदनैः । तुलसीबिल्वपत्राद्यैर्मातुलुंगफलादिभिः ॥ ४० ॥
इसी प्रकार सुगंधित पुष्पों से, कुंकुम, अगरु और चंदन से, तुलसी और बिल्वपत्र आदि से, तथा मातुलुंग (बिजौरा) फल आदि अर्पित करके (पूजा करे)।
Verse 41
धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्यथा विभवविस्तरैः । कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ॥ ४१ ॥
धूप, दीप और नैवेद्य से—अपने सामर्थ्य और वैभव के अनुसार—(उसका पुण्य) हजारों करोड़ कल्पों तक, और सैकड़ों करोड़ कल्पों तक भी स्थिर रहता है।
Verse 42
दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके महीयते । ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः ॥ ४२ ॥
दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर वह विष्णुलोक में सम्मानित होता है; फिर पृथ्वी पर आकर धर्मात्मा राजा बनता है।
Verse 43
भुक्त्वा विविधसौख्यानि रूपशीलगुणान्वितः । देहांते ज्ञानवान्भूत्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ४३ ॥
वह अनेक प्रकार के सुख भोगकर, रूप‑शील‑गुणों से युक्त होकर, देहांत में सच्चे ज्ञान से संपन्न हो शिव‑सायुज्य को प्राप्त होता है।
Verse 44
यज्ञो दानं तपो जप्यं श्राद्धं च सुरपूजनम् । गंगायां तु कृतं सर्वं कोटिकोटिगुणं भवेत् ॥ ४४ ॥
यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजन—इनमें से जो कुछ भी गंगा में किया जाए, वह कोटि‑कोटि गुना फलदायक होता है।
Verse 45
यस्त्वक्षयतृतीयायां गंगातीरे ददाति वै । घृतधेनुं विधानेन तस्य पुण्यफलं श्रृणु ॥ ४५ ॥
जो अक्षय तृतीया के दिन गंगा‑तट पर विधिपूर्वक घृतधेनु का दान करता है, उसके पुण्यफल को सुनो।
Verse 46
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । सहस्रादित्यसंकाशः सर्वकामसमन्वितः ॥ ४६ ॥
हजारों कोटि कल्पों तक और सैकड़ों कोटि कल्पों तक भी, वह हजार सूर्यों के समान तेजस्वी होकर, समस्त कामनाओं की सिद्धि से युक्त रहता है।
Verse 47
हेमरत्न मये चित्रे विमाने हंसभूषिते । स्वकीयपितृभिः सार्द्धं ब्रह्मलोके महीयते ॥ ४७ ॥
स्वर्ण और रत्नों से बने, विचित्र और हंसों से अलंकृत विमान में, वह अपने पितरों सहित ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।
Verse 48
ततस्तु जायते विप्रो गंगातीरे धनान्वितः । अंते तु ब्रह्मविद्भूत्वा मोक्षमाप्नोत्यसंशयः ॥ ४८ ॥
तत्पश्चात वह गंगा-तट पर धन-सम्पन्न ब्राह्मण के रूप में जन्म लेता है; और अंत में ब्रह्मविद् बनकर निःसंदेह मोक्ष प्राप्त करता है।
Verse 49
तथैव गोप्रदानं च विधिना कुरुते तु यः । गोलोमसंख्यवर्षाणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ४९ ॥
इसी प्रकार जो विधिपूर्वक गोदान करता है, वह गो के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
Verse 50
जायते च कुले पश्चाद्धनधान्यसमाकुले । रत्नकांचनभूपूर्णे शीलविद्यायशोन्विते ॥ ५० ॥
तत्पश्चात वह ऐसे कुल में जन्म लेता है जो धन-धान्य से परिपूर्ण, रत्न और स्वर्ण से भरा हुआ, तथा शील, विद्या और यश से युक्त होता है।
Verse 51
स भुक्त्वा विपुलान्भोगान्पुत्रपौत्रसमन्वितः । मोक्षभागी भवेन्नृनं नात्रकार्या विचारणा ॥ ५१ ॥
वह विपुल भोगों का उपभोग करके, पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर, मनुष्यों में मोक्ष का अधिकारी बनता है; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।
Verse 52
कपिला यदि दत्ता स्याद्विधिना वेदपारगे । नरकस्थान्पितॄन्सर्वान्स्वर्गं नयति वै तदा ॥ ५२ ॥
यदि विधिपूर्वक वेदपारंगत ब्राह्मण को कपिला गौ का दान दिया जाए, तो तब नरकस्थ समस्त पितर निश्चय ही स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
Verse 53
भूमिं निवर्तनमितां गंगातीरे ददाति यः । भूमिरेणुप्रमाणाब्दं ब्रह्मविष्णुशिवातिगः ॥ ५३ ॥
जो गंगा-तट पर एक निवर्तन-परिमित भूमि का दान करता है, वह उस भूमि के धूल-कणों जितने वर्षों तक ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी बढ़कर फल पाता है।
Verse 54
जायते च पुनर्भूमौ सप्तद्वीपपतिर्भवेत् । भेरीशंखादिनिर्घोषैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः ॥ ५४ ॥
वह फिर पृथ्वी पर जन्म लेता है और सात द्वीपों का अधिपति बनता है; भेरी-शंख के घोष तथा गीत और वाद्यों की गूँज के बीच उसका वैभव प्रकट होता है।
Verse 55
स्तुतिभिर्मागघानां च सुप्तोऽसौ प्रतिबुध्यते । सर्वसौख्यान्यवाप्येह सर्वधर्मपरायणः ॥ ५५ ॥
मागध भाटों की स्तुतियों से वह सोया हुआ भी जाग उठता है; और यहाँ इसी लोक में, सर्वधर्म-परायण होकर, समस्त सुखों को प्राप्त करता है।
Verse 56
नरकस्थान्पितॄन्सर्वान्प्रापयित्वा दिवं तथा । स्वर्गस्थितान्मोक्षयित्वा स्वयं ज्ञानी च मोहिनि ॥ ५६ ॥
हे मोहिनी! जो नरक में स्थित अपने समस्त पितरों को स्वर्ग पहुँचा देता है, और स्वर्ग में स्थितों को भी मोक्ष प्रदान कर देता है—वह स्वयं ज्ञानी बन जाता है।
Verse 57
अंते ज्ञानासिना छित्वा अविद्यां पंचपर्विकाम् । परं वैराग्यमापन्नः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ५७ ॥
अंत में वह ज्ञान-खड्ग से पाँच पर्वों वाली अविद्या को काटकर, परम वैराग्य को प्राप्त होता है और परम ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
Verse 58
सप्तहस्तेन दंडेन त्रिंशद्दंडा निवर्तनम् । त्रिभागहीनं गोचर्म मानमाह विधिः स्वयम् ॥ ५८ ॥
सात हाथ के दण्ड से नापने पर तीस दण्ड मिलकर एक निवर्तन होता है। उसी का एक-तिहाई घटाकर जो मान हो, उसे स्वयं विधि (ब्रह्मा) ने ‘गोचर्म’ कहा है।
Verse 59
ग्रामं गंगातटे यो वै ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । ब्रह्मविष्णुशिवप्रीत्ये दुर्गाया भास्करस्य च ॥ ५९ ॥
जो गंगा-तट पर स्थित ग्राम को ब्राह्मणों को दान करता है—ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रसन्नता हेतु, तथा दुर्गा और भास्कर (सूर्य) के लिए भी—वह महान पुण्य का भागी होता है।
Verse 60
सर्वदानेषु यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु यत्फलम् । तपोव्रतेषु पुण्येषु यत्फलं परिकीर्तितम् ॥ ६० ॥
समस्त दानों से जो पुण्य, समस्त यज्ञों से जो फल, और पवित्र तप-व्रतों से जो परिणाम कहा गया है—वह सब (यहाँ) प्राप्त होता है।
Verse 61
सहस्रगुणितं तत्तु विज्ञेयं ग्रामदायिनः । सूर्यकोटिप्रतीकाशे विमाने वैष्णवे पुरे ॥ ६१ ॥
परन्तु ग्राम-दान करने वाले के लिए वही पुण्य हजार गुना बढ़कर जानना चाहिए; वह वैष्णव-पुर में, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी विमान में (विराजता) है।
Verse 62
क्रीडते शांकरे वापि स्तुतो देवादिभिर्मुदा । भूमिरेण्वब्दसंख्याकं कालं स्थित्वा च तत्र सः ॥ ६२ ॥
वह वहाँ शांकर-लोक में भी क्रीड़ा करता है, देवताओं आदि द्वारा हर्षपूर्वक स्तुत होता है; और पृथ्वी की धूल-कणों के समान असंख्य वर्षों तक वहाँ निवास करके उसी स्थान में स्थित रहता है।
Verse 63
अणिमादिगुणैर्युक्ते योगिनां जायते कुले । अक्षयायां तु यो देवि स्वर्णं षोडशमासिकम् ॥ ६३ ॥
हे देवी, अक्षय तृतीया के दिन जो सोलह माषा भार का स्वर्ण दान करता है, वह अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त योगियों के कुल में जन्म पाता है।
Verse 64
ददाति द्विजमुख्याय सोऽपि लोकेषु पूज्यते । अन्नदानाद्विष्णुलोकं शैवं वै तिलदानतः ॥ ६४ ॥
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देता है, वह लोकों में पूज्य होता है। अन्नदान से विष्णुलोक मिलता है और तिलदान से निश्चय ही शिवलोक की प्राप्ति होती है।
Verse 65
ब्राह्मं रत्नप्रदानेन गोहिरण्येन वासवम् । गांधर्वं स्वर्णवासोभिः कीर्तिं कन्याप्रदानतः ॥ ६५ ॥
रत्नदान से ब्रह्मलोक, गौ और स्वर्णदान से वासव (इन्द्र) लोक मिलता है। स्वर्ण और वस्त्रदान से गन्धर्वलोक, और कन्यादान से स्थायी कीर्ति प्राप्त होती है।
Verse 66
विद्यया मुक्तिदं ज्ञानं प्राप्य यायान्निरंजनम् । गंगातीरे नरो यस्तु नानावृक्षैः समन्वितम् ॥ ६६ ॥
विद्या से मोक्षदायक ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य को निरंजन परमात्मा की ओर जाना चाहिए। जो गंगा-तट पर नाना वृक्षों से सुशोभित स्थान में निवास करता है, वह ऐसा ही पुण्यवान है।
Verse 67
आरामं कारयेद्भक्त्या गृहं चोपवनान्वितम् । कदलीनारिकेरैश्च कपित्थाशोकचंपकैः ॥ ६७ ॥
भक्ति से उद्यान (आराम) बनवाए और उपवन सहित गृह भी कराए—जिसमें केला, नारियल, कैथ, अशोक और चम्पा के वृक्ष लगाए जाएँ।
Verse 68
पनसैर्बिल्ववृक्षैश्च कदंबाश्वत्थपाटलैः । आम्रैस्तालैर्नागरंगैर्वृक्षैरन्यैश्च संयुतम् ॥ ६८ ॥
वह स्थान पनस और बिल्व-वृक्षों से, कदंब, अश्वत्थ और पाटल से; आम, ताड़, नागरंग तथा अन्य अनेक प्रकार के वृक्षों से भी सुशोभित और संयुक्त था।
Verse 69
जातीविजयसंयुक्तं तथा पाटलराजितम् । निचितं कारयित्वैवमावासं पुष्पशोभितम् ॥ ६९ ॥
उसने ऐसा निवास बनवाया जो जाती और विजय पुष्पों से संयुक्त था तथा पाटल के पुष्पों से शोभित; घना, सुव्यवस्थित और पुष्प-शोभा से दीप्तिमान आवास तैयार कराया।
Verse 70
शिवाय विष्णवे वापि दुर्गायै भास्कराय च । प्रयच्छति तथा भक्त्या सर्वार्थं परिकल्प्य च ॥ ७० ॥
भक्ति सहित शिव को, या विष्णु को, दुर्गा को तथा भास्कर (सूर्य) को भी—समस्त आवश्यक सामग्री को यथाविधि सजाकर—उचित अर्पण करना चाहिए।
Verse 71
तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये संक्षेपान्नतु विस्तरात् । यावंति तेषां वृक्षाणां पुष्पमूलफलानि च ॥ ७१ ॥
उस कर्म का पुण्यफल मैं संक्षेप से कहता हूँ, विस्तार से नहीं—उन वृक्षों के जितने पुष्प, मूल और फल हैं, उतना ही (पुण्य) प्राप्त होता है।
Verse 72
बीजानि च विचित्राणि तेषां मूलानि वै तथा । तावत्कल्पसहस्राणि तेषां लोकेषु संस्थितिः ॥ ७२ ॥
उनके बीज भी विविध हैं और वैसे ही उनके मूल भी; और उतने ही सहस्र कल्पों तक उनकी स्थिति लोकों में स्थिर रहती है।
Verse 73
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणोत्तरभागे मोहिनीवसुसंवादे गङ्गामाहात्म्ये दानादिविधिवर्णनं नामैकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के उत्तरभाग में, मोहिनी–वसु संवाद के अंतर्गत गङ्गामाहात्म्य में ‘दान आदि के विधि-वर्णन’ नामक इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥४१॥
Because the chapter treats Gaṅgā-jala as a tīrtha-substance that immediately gratifies pitṛs regardless of their state—even if they are said to be in naraka—and can elevate them to Hari’s abode or even to liberation when offered according to vidhi with faith and prescribed materials (tila, kuśa, arghya/tarpaṇa).
Daily Gaṅgā-snānā followed by Śiva-liṅga worship and disciplined mantra-japa is presented as surpassing many elaborate rites, with claims of attaining liberation within a single lifetime, while also integrating deva-offerings and pitṛ-rites as a complete dharma package.
Worship at the Gaṅgā with night-vigil (jāgaraṇa), offerings including barley-food and sesame, and devotion to Viṣṇu, Gaṅgā, and Śambhu; Vaiśākha and Kārttika are singled out as especially potent months, with Akṣaya-tṛtīyā as a peak day for dāna.