Uttara BhagaAdhyaya 3370 Verses

Dharmāṅgada’s Discourse (Dharmāṅgadopadeśa) in the Mohinī Episode

वसिष्ठ बताते हैं कि रानी सन्ध्यावली राजा रुक्माङ्गद को समझाती है—पुत्र-त्याग जैसा असह्य दुःख भी हो, फिर भी सत्य और धर्म का त्याग उससे भी बड़ा अनर्थ है। यहाँ ‘निकष’ (कसौटी) का भाव तीव्र होता है: व्रत की परीक्षा में हरि (हृषीकेश) फल देते हैं और सत्य की स्थापना हेतु आई विपत्तियाँ भी पुण्य बन जाती हैं। रुक्माङ्गद मोहिनी से विनती करता है कि पुत्र के बदले अन्य तप स्वीकार करे; वह दुर्लभ आध्यात्मिक धन—सुपुत्र, गङ्गाजल, वैष्णव दीक्षा, हरि-पूजन और माघ-व्रत—की प्रशंसा करता है। मोहिनी स्पष्ट करती है कि वह केवल हरि के पवित्र दिन राजा का भोजन चाहती है, पुत्र-वध नहीं। तब धर्माङ्गद आगे बढ़कर तलवार अर्पित करता है और पिता को प्रतिज्ञा-पालन के लिए प्रेरित करता है—आत्म-बलिदान सत्य-रक्षा का धर्म है और उत्तम लोक देता है। अध्याय का उपसंहार सत्य की मुक्तिदायिनी और कीर्तिदायिनी महिमा से होता है, चाहे देवता भी भक्त की राह में बाधा बनकर क्यों न आएँ।

Shlokas

Verse 1

वसिष्ठ उवाच । संध्यावली ततः पादौ भर्तुः संगृह्य भूपते । उवाच वचनं देवी धर्मां गदविनाशनम् ॥ १ ॥

वसिष्ठ बोले—तब, हे राजन्, संध्यावली ने अपने पति के चरण पकड़कर धर्मयुक्त, शोक-पीड़ा का नाश करने वाले वचन कहे।

Verse 2

बहुधाप्यनुशिष्टेयं मया भूप यथा त्वया । मोहिन्या मोहरूपाया नान्यत्संरोचतेऽधुना ॥ २ ॥

हे राजन्, तुम्हारे पूछने पर मैंने बार-बार उपदेश दिया, फिर भी उस मोहस्वरूपा मोहिनी के कारण अब तुम्हें और कुछ रुचिकर नहीं लगता।

Verse 3

भोजनं वासरे विष्णोर्वधं वा तनयस्य वै । धर्मत्यागाद्वरं नाथ पुत्रस्य विनिपातनम् ॥ ३ ॥

हे नाथ! विष्णु के पावन व्रत-दिन में भोजन कर लेना, या अपने ही पुत्र का वध कर देना भी—धर्म का त्याग करने से श्रेष्ठ है; धर्म-परित्याग से तो पुत्र का पतन ही अच्छा है।

Verse 4

यादृशी हि जनन्यास्तु पीडा भवति भूपते । पुत्रस्योत्पादने तीव्रातादृशी न भवेत्पितुः ॥ ४ ॥

हे भूपते! पुत्र-प्रसव के समय माता जो तीव्र पीड़ा सहती है, वैसी पीड़ा पिता को कभी नहीं होती।

Verse 5

गर्भसंधारणे राजन् खेदः स्नेहोऽधिको यथा । मातुर्भवति भूपाल तथा नहि भवेत्पितुः ॥ ५ ॥

हे राजन्! गर्भ धारण में माता को जैसा अधिक कष्ट और जैसा गहरा स्नेह होता है, हे भूपाल, वैसा पिता में उतना नहीं होता।

Verse 6

बीजनिर्वाषकः प्रोक्तः पिता राजेंद्र भूतले । जननी धारिणी क्लिष्टा वर्द्धने पालनेऽधिका ॥ ६ ॥

हे राजेन्द्र! इस पृथ्वी पर पिता को केवल बीज देने वाला कहा गया है; परन्तु जननी—जो धारण करती है और कष्ट सहती है—पालन-पोषण और रक्षण में अधिक महान है।

Verse 7

पितुः शतगुणः स्नेहो मातुः पुत्रे प्रवर्तते । स्नेहाधिक्यं तु संप्रेक्ष्य मातरं महतीं विदुः ॥ ७ ॥

पुत्र के प्रति माता का स्नेह पिता के स्नेह से सौ गुना कहा गया है। इस अपार प्रेम को देखकर विद्वान जन माता को परम वन्दनीया मानते हैं।

Verse 8

साहं जाता गतस्नेहा परलोकजिगीषया । पुत्रस्य नृपशार्दूल सत्यवाक्यस्य पालनात् ॥ ८ ॥

हे नृपशार्दूल! पुत्र के सत्य-वचन का पालन करने से मैं स्नेह-रहित होकर परलोक-प्राप्ति की अभिलाषा वाली हो गई।

Verse 9

व्यापादय सुतं भूप स्नेहं त्यक्त्वा सुदूरतः । मा सत्यलंघनं कार्षीः शापितोऽसि मयात्मना ॥ ९ ॥

हे भूप! दूर से ही स्नेह त्यागकर पुत्र का वध कर; सत्य का उल्लंघन मत कर—तू मेरे आत्म-शाप से शापित है।

Verse 10

निकषेषु ह्यषीकेशो भविष्यति फलप्रदः । यस्मिंश्चीर्णे रुजा देहे नाल्पापि नृप जायते ॥ १० ॥

इन निकषों में हृषीकेश निश्चय ही फल देने वाले होंगे; हे नृप! यह व्रत करने पर शरीर में तनिक भी पीड़ा नहीं होती।

Verse 11

अधर्मान्मानवोऽवश्यं स्वर्गभ्रष्टो न संशयः । प्राणानादाय पुत्रं वा सर्वस्वं वा महीपते ॥ ११ ॥

अधर्म से मनुष्य अवश्य स्वर्ग से गिरता है—इसमें संदेह नहीं; चाहे वह प्राण हर ले, या पुत्र, या समस्त धन—हे महीपते!

Verse 12

यश्चानुवर्तते दैवं स पुमान् गीयते महान् । ता आपदोऽपि भूपाल धन्या याः सत्यकारिकाः ॥ १२ ॥

जो दैव-विधान का अनुसरण करता है, वही महान कहा जाता है; हे भूपाल! जो आपदाएँ सत्य की स्थापना का कारण बनें, वे भी धन्य हैं।

Verse 13

सत्तयसंरक्षणार्थत्वान्नृणां स्युर्मोक्षदायिकाः । कीर्तिसंस्तरणार्थाय कर्त्तव्यं मनुजैः सदा ॥ १३ ॥

अपने अस्तित्व और कल्याण की रक्षा करने वाले ये धर्माचरण मनुष्यों के लिए मोक्षदायक होते हैं। इसलिए उत्तम कीर्ति के प्रसार हेतु इन्हें सदा करना चाहिए।

Verse 14

कर्म भूपाल शास्त्रोक्तं स्नेहद्वेषविवर्जितम् । तदलं परितापेन सत्यं पालय भूपते ॥ १४ ॥

हे राजन्, शास्त्रों में कहे गए कर्तव्य को राग-द्वेष से रहित होकर करो। उसके लिए आत्म-पीड़ा न करो; हे पृथ्वीपति, सत्य का पालन करो।

Verse 15

सत्यस्य पालनाद्राजन्विष्णुदेहेन युज्यते । देवैरुत्पादिता ह्येषा निकषा ते विमोहिनी ॥ १५ ॥

हे राजन्, सत्य की रक्षा से मनुष्य विष्णु-स्वरूप से संयुक्त होता है। यह परीक्षा-शिला देवताओं ने रची है, पर तुम्हारे लिए यह मोह का फंदा बन सकती है।

Verse 16

मन्ये भूपाल सा पत्न्या कृता तां त्वं न बुध्यसे । पुत्रव्यपादनाद्देवा भविष्यंति ह्यवाङ्मुखाः ॥ १६ ॥

हे भूपाल, मैं मानता हूँ कि वह कर्म तुम्हारी पत्नी ने किया है, और तुम उसे नहीं समझ रहे। पुत्र-वध के कारण देवता निश्चय ही विमुख हो जाएंगे।

Verse 17

तेषां दत्वा पदं मूर्ध्नि यास्यसे परमं पदम् । विष्णोरुद्वहतां भक्तिं देवताः परिपंथिनः ॥ १७ ॥

उनके मस्तक पर पग रखकर तुम परम पद को प्राप्त करोगे। जो विष्णु-भक्ति को धारण करते हैं, उनके मार्ग में देवता भी बाधक बन जाते हैं।

Verse 18

भविष्यत्यंधता लोके तदेव प्रकटीकृतम् । विरुद्धा विबुधा भूप सेश्वरास्तव चेष्टितैः ॥ १८ ॥

जगत में अंधकार/अंधता उत्पन्न होगी—यह अब प्रकट हो गया है। हे राजन्, तुम्हारे आचरण से देवतुल्य बुद्धिमान भी अपने-अपने स्वामियों सहित तुम्हारे विरोधी हो गए हैं।

Verse 19

मोक्षमार्गप्रभेत्तारस्तव निश्चया लोपकाः । स त्वं भूप दृढो भूत्वा घातयस्व सुतं प्रियम् ॥ १९ ॥

मोक्ष-मार्ग को उद्घाटित करने वाले तुम्हारे निश्चय से रोके जा रहे हैं। इसलिए, हे राजन्, दृढ़ होकर अपने प्रिय पुत्र का वध करवा दो।

Verse 20

मोहिन्याः कुरु वाक्यं तु आत्मनः सत्यपालनात् ॥ २० ॥

अतः मोहिनी की बात मानो, क्योंकि यह तुम्हारे अपने सत्य-पालन के धर्म के अनुरूप है।

Verse 21

लुप्तेऽपि वाक्ये भविता नृपेश पापं समं ब्रह्मवधेन घोरम् । तंतासि लोके शमनस्य भूप यशःप्रणाशो भविता धरायाम् ॥ २१ ॥

हे नृपश्रेष्ठ, वचन लुप्त या अस्वीकार कर देने पर भी ब्रह्महत्या के समान घोर पाप उत्पन्न होगा। हे भूप, तुम लोक में यम के दण्ड के भागी बनोगे और पृथ्वी पर तुम्हारा यश नष्ट हो जाएगा।

Verse 22

वसिष्ठ उवाच । भार्याया वचनं श्रुत्वा राजा रुक्मांगदस्तदा । संध्यावलीमुवाचेदं मोहिन्याः सन्निधौ नृप ॥ २२ ॥

वसिष्ठ बोले—पत्नी के वचन सुनकर राजा रुक्माङ्गद ने तब, हे राजन्, मोहिनी के सन्निधि में संध्यावली से यह कहा।

Verse 23

पुत्रहत्या महाहत्या ब्रह्महत्याधिका प्रिये । घातयित्वा सुतं लोके का गतिर्म्मे भविष्यति ॥ २३ ॥

प्रिये, पुत्र-हत्या महापाप है—ब्रह्महत्या से भी बढ़कर। यदि मैं इस लोक में अपने पुत्र का वध करूँ, तो मेरी क्या गति होगी?

Verse 24

क्व गतो मंदरं शैलं क्व प्राप्ता मोहिनी मया । धर्मांगदविनाशाय देवि कालप्रिया त्वियम् ॥ २४ ॥

मंदर पर्वत कहाँ चला गया, और यह मोहिनी मुझे कहाँ से प्राप्त हुई? हे देवी, काल की प्रिया यह स्त्री धर्म के अंगों के विनाश के लिए ही प्रकट हुई है।

Verse 25

धर्मज्ञं विनयोपेतं प्रजारंजनकारकम् । अप्रजं च सुतं हत्वा का गतिर्मे भविष्याति ॥ २५ ॥

धर्म को जानने वाले, विनययुक्त और प्रजा को आनंदित करने वाले—यद्यपि निःसंतान—ऐसे पुत्र को मारकर अब मेरी क्या गति होगी?

Verse 26

कुपुत्रस्यापि हननाद्देवि दुःखं भवेत्पितुः ॥ २६ ॥

हे देवी, कुपुत्र का वध करने पर भी पिता को दुःख ही होता है।

Verse 27

किं पुनर्द्धर्मशीलस्य गुरुसेवाविधायिनः । जम्बूद्वीपमिदं भुक्तं मया तु वरवर्णिनि ॥ २७ ॥

फिर धर्मशील और गुरु-सेवा करने वाले का तो कहना ही क्या! हे वरवर्णिनी, मैंने तो समस्त जम्बूद्वीप का भोग (राज्य) किया है।

Verse 28

द्वीपानि सप्त भुक्तानि तनयेन तवाधुना । विष्णोरंशो वरारोहे पितुरप्यधिको भवेत् ॥ २८ ॥

अब तुम्हारे पुत्र द्वारा सातों द्वीप भोगे और शासित किए जा रहे हैं। हे वरारोहे, वह विष्णु का अंश होने से अपने पिता से भी अधिक महान होगा।

Verse 29

पुराणेषु वरारोहे कविभिः परिकीर्तितः । योऽयमत्यधिकः पुत्रो धर्मांगद इति क्षितौ ॥ २९ ॥

हे वरारोहे, यह अत्यन्त तेजस्वी पुत्र—जो पृथ्वी पर ‘धर्माङ्गद’ नाम से प्रसिद्ध है—पुराणों में कवियों द्वारा गाया गया है।

Verse 30

मम वंशस्य चार्वंगि किं पुनर्मम मानदः । अहो दुःखमनुप्राप्तं पुत्रादप्यधिकं मया ॥ ३० ॥

हे चार्वङ्गि, यदि मेरे वंश की ऐसी गति है, तो फिर मेरा क्या होगा—जो सबका मान्य हूँ? अहो, मैंने पुत्र-जनित दुःख से भी बड़ा शोक पाया है।

Verse 31

पुनरेव वरारोहे ब्रूहि त्वं वचनैः शुभैः । मोहिनीं मोहसंप्राप्तां मम दुःखप्रदायिनीम् ॥ ३१ ॥

हे वरारोहे, फिर से शुभ वचनों से कहो—उस मोहिनी माया के विषय में, जो मन को मोहित कर मेरे दुःख का कारण बनती है।

Verse 32

एवमुक्त्वा तु नृपतिः प्रियां सन्ध्यावलीं तदा । समीपमागत्य नृपो मोहिनीमिदमब्रवीत् ॥ ३२ ॥

ऐसा कहकर नृपति ने तब अपनी प्रिया सन्ध्यावली से (बात कर) राजा समीप जाकर मोहिनी से यह कहा।

Verse 33

न भोक्ष्ये वासरे विष्णोर्न हिंस्ये तनयं शुभे । आत्मानं दारयिष्यामि देवीं सन्ध्यावलीं तथा ॥ ३३ ॥

विष्णु के पावन व्रत-दिन मैं भोजन नहीं करूँगा; हे शुभे, मैं पुत्र को हानि नहीं पहुँचाऊँगा। मैं अपने ही शरीर को दण्ड दूँगा और देवी सन्ध्यावली के विषय में भी संयम रखूँगा।

Verse 34

अन्यद्वा दारुणं कर्म करोमि तव शासनात् । दुष्टाग्रहमिमं सुभ्रु परित्यज सुतं प्रति ॥ ३४ ॥

अन्यथा तुम्हारे आदेश से मैं कोई कठोर कर्म भी कर बैठूँगा। हे सुन्दर-भ्रूवाली, पुत्र के प्रति यह दुष्ट आग्रह छोड़ दो।

Verse 35

किं फलं भविता तुभ्यं हत्वा धर्मांगदं सुतम् । भोजयित्वा दिने विष्णोः को लाभो भविता वद ॥ ३५ ॥

धर्माङ्गद नामक अपने पुत्र को मारकर तुम्हें क्या फल मिलेगा? और विष्णु के दिन दान-भोजन कराकर क्या लाभ होगा—मुझे बताओ।

Verse 36

दासोऽस्मि तव भृत्योऽस्मि वशगोऽस्मि वरानने । अन्यं याचस्व सुभगे वरं त्वां शरणं गतः ॥ ३६ ॥

मैं तुम्हारा दास हूँ, सेवक हूँ, और पूर्णतः तुम्हारे वश में हूँ, हे सुन्दर-मुखी। हे सुभगे, कोई अन्य वर माँगो; मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ।

Verse 37

रक्ताशोकसमानाभ्यां तव चार्वंगिसर्वशः । अन्यत्प्रयोजनं किंचित्कर्त्ताऽस्मि वशगस्तव ॥ ३७ ॥

हे चारु-अंगी, तुम्हारे दोनों अधर रक्त-अशोक के पुष्पों के समान हैं। मैं तुम्हारे वश में हूँ; बताओ, और कौन-सा प्रयोजन है जिसे मैं करूँ?

Verse 38

प्रसादं कुरु मे देवि पुत्रभिक्षां प्रयच्छ मे । दुर्लभो गुणवान्पुत्रो दुर्लभो हरिवासरः ॥ ३८ ॥

हे देवी, मुझ पर प्रसन्न होइए; मुझे पुत्र-भिक्षा का वर दीजिए। गुणवान पुत्र दुर्लभ है, और हरि-वासर (हरि का पावन दिन) भी दुर्लभ है।

Verse 39

दुर्लभः जाह्नवीतोयं दुर्लभा जननी क्षितौ । दुर्लभं हि कुले जन्म दुर्लभा वंशजा प्रिया ॥ ३९ ॥

जाह्नवी (गंगा) का जल दुर्लभ है, और पृथ्वी पर जननी भी दुर्लभ है। कुल में जन्म भी दुर्लभ है, और सु-वंश में जन्मी प्रिय पत्नी भी दुर्लभ है।

Verse 40

दुर्लभं कांचनं दानं दुर्लभं हरिपूजनम् । दुर्लभा वैष्णवी दीक्षा दुर्लभः स्मृतिसंग्रहः ॥ ४० ॥

कंचन (स्वर्ण) का दान दुर्लभ है, और हरि-पूजन भी दुर्लभ है। वैष्णवी दीक्षा दुर्लभ है, और शुद्ध रूप से संकलित स्मृति-संग्रह भी दुर्लभ है।

Verse 41

दुर्लभः शौकरे वासो दुर्लभं हरिचिन्तनम् । दुर्लभो जागरो विष्णोर्दुर्लभा ह्यात्मसत्क्रिया ॥ ४१ ॥

शौकर नामक पवित्र स्थान में वास दुर्लभ है, और हरि-चिन्तन भी दुर्लभ है। विष्णु के लिए जागरण दुर्लभ है, और आत्म-सत्क्रिया—अंतःकरण की सच्ची साधना-युक्त सदाचार—भी दुर्लभ है।

Verse 42

दुर्लभा पुत्रसंप्राप्तिर्दुर्लभं पौष्करं जलम् । दुर्लभः शिष्टसंसर्गो दुर्लभा भक्तिरुच्यते ॥ ४२ ॥

योग्य पुत्र की प्राप्ति दुर्लभ है, और पुष्कर का पवित्र जल भी दुर्लभ है। शिष्टों का सत्संग दुर्लभ है, और भक्ति भी—ऐसा कहा गया है—दुर्लभ है।

Verse 43

दुर्लभं कपिलादानं दुर्लभं नीलमोक्षणम् । कृतं श्राद्धं त्रयोदश्यां दुर्लभं वरवर्णिनि ॥ ४३ ॥

कपिला गौ का दान दुर्लभ है, नीलमोक्षण-विधि भी दुर्लभ है। और हे सुन्दर वर्ण वाली, त्रयोदशी को किया गया श्राद्ध भी दुर्लभ है।

Verse 44

दुर्लभा वसुधा चीर्णं व्रतं पातकनाशनम् । धेनुस्तिलमयी सुभ्रु दुर्लभा विप्रगामिनी ॥ ४४ ॥

हे सुन्दर भौंहों वाली, वसुधा (और उसके साधन) दुर्लभ हैं; विधिपूर्वक किया गया व्रत पापों का नाशक होता है। तिल से बनी धेनु तो विशेषकर ब्राह्मण को देने हेतु अत्यन्त दुर्लभ है।

Verse 45

धात्रीस्नानं वरारोहे दुर्लभो हरिवासरः । दुर्लभं पर्वकाले तु स्नानं शीतलवारिणा ॥ ४५ ॥

हे वरारोहे, धात्री (आँवला) तीर्थ में स्नान दुर्लभ है; हरि का पावन दिवस भी दुर्लभ है। और पर्वकाल में शीतल जल से स्नान तो और भी दुर्लभ है।

Verse 46

माघमासे विशेषेण प्रत्यूषसमये शुभे । यथाशास्त्रोदितं कर्म तद्देवि भुवि दुर्लभम् ॥ ४६ ॥

हे देवी, विशेषकर माघ मास में, शुभ प्रत्यूष काल में, शास्त्रों के अनुसार जैसा कर्म कहा गया है वैसा ही करना—पृथ्वी पर अत्यन्त दुर्लभ है।

Verse 47

दुर्लभं कुशलं पथ्यं दुर्लभं चौषधं तथा । व्याधेर्विघातकरणं दुर्लभं शास्त्रमार्गतः ॥ ४७ ॥

हितकर पथ्य का कुशल उपदेश दुर्लभ है, और उचित औषध भी दुर्लभ है। शास्त्रमार्ग के अनुसार रोग का मूल से नाश करने वाला उपाय तो और भी दुर्लभ है।

Verse 48

दुर्लभं स्मरणं विष्णोर्मरणे वरवर्णिनि । एवं वचो वरारोहे कुरु मे धर्मरक्षकम् ॥ ४८ ॥

हे सुंदरी, मृत्यु के समय भगवान विष्णु का स्मरण अत्यंत दुर्लभ है। इसलिए, हे कुलीन नारी, मेरे इस वचन को धर्म का रक्षक बनाओ।

Verse 49

किं वधेनेवै चार्वंगि प्रसादं कर्तुमर्हसि । सेविता विषयाः सम्यक्कृतं राज्यमकंटकम् ॥ ४९ ॥

हे सुंदरी, वध करने से क्या लाभ? तुम्हें मुझ पर कृपा करनी चाहिए। मैंने विषयों का भली-भांति सेवन किया है और राज्य को निष्कंटक बनाया है।

Verse 50

मया मूर्घ्नि पदं दत्तं देवगोविप्ररक्षिणाम् । अदृष्टविषयं पुत्रं नाहं हिंस्ये कदाचन ॥ ५० ॥

मैंने देव, गाय और ब्राह्मणों के रक्षकों के मस्तक पर अपना पैर रखा है; फिर भी मैं अपने अदृष्टविषय पुत्र की हिंसा कभी नहीं करूँगा।

Verse 51

स्वहस्तेनेह चार्वंगि किं नु पापमतः परम् । मोहिन्युवाच । धर्मांगदो न मे शत्रुर्नाहं हन्मि सुतं तव ॥ ५१ ॥

"हे सुंदरी, अपने ही हाथों से (पुत्र वध) करने से बड़ा पाप और क्या हो सकता है?" मोहिनी ने कहा: "धर्मांगद मेरा शत्रु नहीं है; मैं तुम्हारे पुत्र को नहीं मारूँगी।"

Verse 52

पूर्वमेव मया प्रोक्तं भुंक्ष्वत्वं हरिवासरे । वसुधां स्वेच्छया राजंस्त्वं शाधि बहुवत्सरम् ॥ ५२ ॥

"मैंने पहले ही कहा था—हरि-वासर (एकादशी) के दिन भोजन करो। हे राजन, तुम अपनी इच्छा के अनुसार पृथ्वी पर अनेक वर्षों तक शासन करो।"

Verse 53

नाहं व्यापादये पुत्रमर्थसिद्धिस्तु भोजने । मम भूमिपते कार्यं न पुत्रनिधने तव ॥ ५३ ॥

मैं पुत्र का वध नहीं करूँगी; भोजन प्राप्त होने से ही मेरा प्रयोजन सिद्ध है। हे भूमिपति, मेरा कार्य बस यही है, तुम्हारे पुत्र की मृत्यु नहीं।

Verse 54

यदि पुत्रः प्रियो राजन्भुज्यतां हरिवासरे । किं विलापैर्महीपाल एतैर्द्धर्मबहिष्कृतैः ॥ ५४ ॥

यदि पुत्र तुम्हें प्रिय है, हे राजन्, तो हरि-वासर में ही भोजन करो। हे महीपाल, धर्म से बहिष्कृत इन विलापों का क्या प्रयोजन?

Verse 55

सत्यं संरक्ष यत्नेन कुरुष्व वचनं मम । एवं ब्रुवाणां तां राजन्मोहिनीं तनुमध्यमाम् ॥ ५५ ॥

सत्य की बड़ी सावधानी से रक्षा करो; मेरे वचन का पालन करो। हे राजन्, ऐसा कहती हुई उस मोहिनी, सुकुमार कटि वाली (ने कहा)।

Verse 56

धर्मांगदः प्रत्युवाच दृष्ट्वा नत्वाग्रतः स्थितः । एतदेव गृहाण त्वं मा शंकां कुरु भामिनि ॥ ५६ ॥

धर्मांगद ने उत्तर दिया; उसे देखकर प्रणाम कर सामने खड़ा हुआ और बोला—“इसी को ग्रहण करो; हे भामिनि, कोई शंका मत करो।”

Verse 57

गृहीत्वा निर्मलं खङ्गं विन्यस्य नृपतेः पुरः । आत्मानं च प्रत्युवाच सत्यधर्मव्यवस्थितः ॥ ५७ ॥

निर्मल खड्ग को लेकर राजा के सामने रखकर, फिर सत्य और धर्म में दृढ़ होकर उसने अपना उत्तर कहा।

Verse 58

न विलंबः पितः कार्यस्त्वया मम निपातने । मन्मातुर्वचनं सत्यं कुरु भूप प्रतिश्रुतम् ॥ ५८ ॥

हे पिता, मेरे वध में तुम्हें विलम्ब नहीं करना चाहिए। हे भूप, मेरी माता के वचन को सत्य करो—जो प्रतिज्ञा की है उसे पूर्ण करो।

Verse 59

आत्मा रक्ष्यो धनैर्दारैरथवापि निजात्मजैः । अपत्यं धर्मकामार्थं श्रेयस्कामस्य भूपतेः ॥ ५९ ॥

हे भूपते, अपने आत्मा की रक्षा करनी चाहिए—धन से, पत्नी से, अथवा अपने पुत्रों से भी। संतान तो धर्म, काम और अर्थ के लिए चाही जाती है; पर जो श्रेय चाहता है, उसके लिए आत्म-रक्षा ही प्रधान कर्तव्य है।

Verse 60

त्वदर्थे मरणं मह्यमक्षय्य गतिदायकम् । तवापि निर्मला लोकाः स्ववाक्यपरिपालनात् ॥ ६० ॥

तुम्हारे लिए मरना मुझे अक्षय गति प्रदान करेगा। और तुम्हारे लिए भी, अपने वचन का पालन करने से तुम्हारे लोक निर्मल रहेंगे।

Verse 61

परित्यज्य परं दुःखं पुत्रव्यापादनोद्भवम् । देहत्यागे ममारंभो नरदेहे भविष्यति ॥ ६१ ॥

पुत्र-वध से उत्पन्न उस परम दुःख को त्यागकर, इस देह के त्याग पर मेरा आगे का प्रवाह फिर मनुष्य-देह में होगा।

Verse 62

सर्वामयविनिर्मुक्ते शतक्रतुसमे विभो । पितुरर्थे हता ये तु मातुरर्थे हतास्तथा ॥ ६२ ॥

हे विभो, उस पावन अवस्था में मनुष्य सर्व रोगों से मुक्त होकर शतक्रतु (इन्द्र) के समान हो जाता है। और जो पिता के लिए मारे गए हैं—तथा जो माता के लिए मारे गए हैं—वे भी वैसा ही उत्तम फल पाते हैं।

Verse 63

गवार्थे ब्राह्यणार्थे वा प्रमदार्थे महीपते । भूम्यर्थे पार्थिवार्थे वा देवतार्थे तथैव च ॥ ६३ ॥

हे महीपते! चाहे गौओं के हेतु, ब्राह्मणों के हेतु, स्त्री के हेतु, भूमि के हेतु, राजकार्य के हेतु, अथवा देवताओं के हेतु ही क्यों न हो—

Verse 64

बालार्थे विकलार्थे च यांति लोकान्सुभास्वरान् । तदलं परितापेन जहि मां त्वं वरासिना ॥ ६४ ॥

बालक के हेतु और असहाय-पीड़ित के हेतु वे उज्ज्वल लोकों को प्राप्त होते हैं। इसलिए शोक पर्याप्त है; अपने उत्तम खड्ग से मुझे काट डालो।

Verse 65

सत्यं पालय राजेंद्र मा भुंक्ष्व हरिवासरे । धर्मार्थे तनयं हन्याद्भार्यां वापि महीपते ॥ ६५ ॥

हे राजेंद्र! सत्य का पालन करो; हरि के वासर (पवित्र दिन) में भोजन न करो। धर्म के हेतु, हे महीपते, पुत्र—यहाँ तक कि पत्नी—का भी त्याग करने को तत्पर होना चाहिए।

Verse 66

श्रूयते वेदवाक्येषु पुत्रं हन्यान्मखस्थितः । अश्वमेघे मखवरे न दोषो जायते नृप ॥ ६६ ॥

वेदवचनों में यह सुना जाता है, हे नृप, कि यज्ञ में स्थित पुरुष पुत्र का भी वध कर सकता है; श्रेष्ठ यज्ञ अश्वमेध में कोई दोष (पाप) उत्पन्न नहीं होता।

Verse 67

यद्ब्रवीति महीपाल मोहिनी जननी मम । तत्त्वया ह्यविचारेण कर्त्तव्यं वचनं ध्रुवम् ॥ ६७ ॥

हे महीपाल! मेरी जननी मोहिनी जो कुछ कहती है, उसे तुम्हें निश्चय ही बिना विचार-हिचक के अवश्य करना चाहिए।

Verse 68

प्रसीद राजेंद्र कुरुष्व वाक्यं मयेरितं चात्मवधाय सत्यम् । विमोचयेथा नृपते सुघोराद्वाक्यानृतान्मोहिनिहस्तयोगात् ॥ ६८ ॥

हे राजेन्द्र, प्रसन्न होइए और मेरे कहे वचन को पूरा कीजिए—यद्यपि वह मेरे प्राणों का त्याग कराए, फिर भी वह सत्य है। हे नृप, मोह और पराधीनता से उत्पन्न वाणी के असत्य रूपी घोर बंधन से आप मुक्त हो जाएंगे।

Verse 69

वधेन ते भूमिपते सुतस्य यशः प्रकाशं गमयिष्यते च । यशः प्रकाशाद्भविता हि कीर्तिस्तथाक्षया तात न संशयोऽत्र ॥ ६९ ॥

हे भूमिपते, आपके पुत्र-वध से आपका यश पूर्ण प्रकाश में आएगा। उस यश के प्रकाश से, हे प्रिय, आपकी अक्षय कीर्ति उत्पन्न होगी—इसमें कोई संदेह नहीं।

Verse 70

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणोत्तरभागे मोहिनीचरिते धर्मांगदोक्तिर्नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्री बृहन्नारदीयपुराण के उत्तरभाग में मोहिनी-चरित के अंतर्गत ‘धर्माङ्गद-उक्ति’ नामक तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Nikaṣa frames dharma as verifiable under pressure: truth and vow-keeping are not merely declared but ‘tested’ in lived crisis. The chapter presents Hari as the giver of results when one’s resolve is refined by trial, turning adversity into a means of establishing satya and advancing mokṣa-dharma.

Hari-vāsara functions as the vow’s temporal anchor: Mohinī’s demand centers on eating on Viṣṇu’s sacred day, making time itself a site of dharma. The king’s struggle illustrates how vrata-kalpa observance can become an intense ethical crucible when truth, attachment, and royal duty collide.

Dharmāṅgada treats the body as secondary to satya and dharma, urging his father to preserve truth even at personal loss. He interprets self-offering as spiritually elevating—purifying the father’s worlds through vow-keeping and granting the son exalted destiny—thereby aligning familial tragedy with liberation-oriented ethics.