ऋषि विष्णु को प्रसन्न करने वाली विस्तृत विधि और पुरुषार्थ-प्राप्ति का उपाय पूछते हैं। सूत कहते हैं कि हृषीकेश धन से नहीं, भक्ति से प्रसन्न होते हैं, और गौतम द्वारा कही रुक्माङ्गद-राजा की कथा सुनाते हैं—क्षीरशायी/पद्मनाभ के अटल भक्त राजा ने ढोल-घोष से हरिवासर (एकादशी–द्वादशी) का अनुशासन स्थापित किया। योग्य लोग विष्णु के पवित्र दिन की घोषणा करें; उस दिन भोजन निंदनीय और सामाजिक दंडनीय है, जबकि दान और गंगा-स्नान प्रशंसित हैं। अध्याय बताता है कि बहाने से भी एकादशी-द्वादशी का पालन विष्णुलोक देता है; हरि-दिन का भोजन ‘पाप को खा जाता’ कहा गया है, और उपवास धर्म की रक्षा करता है। परिणामस्वरूप चित्रगुप्त के लेख मिट जाते हैं, नरक और स्वर्ग तक खाली हो जाते हैं, और जीव गरुड़ पर आरूढ़ होकर ऊपर जाते हैं। नारद यम से पापियों के अभाव का कारण पूछते हैं; यम बताता है कि राजा की घोषणाओं ने प्राणियों को उसके अधिकार से हटा दिया। व्याकुल यम नारद और चित्रगुप्त के साथ ब्रह्मलोक जाता है; वहाँ ब्रह्मा का व्यापक ब्रह्माण्डीय वर्णन, अंत में यम का विलाप और सभा का विस्मय होता है।
Verse 1
ऋषय ऊचुः । विस्तरेण समाख्या हि विष्णोराराधनक्रियाम् । यया तोषं समायाति प्रददाति समीहितम् ॥ १ ॥
ऋषियों ने कहा—विष्णु की आराधना-विधि का विस्तार से वर्णन कीजिए, जिससे वे प्रसन्न होकर अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।
Verse 2
लक्ष्मीभर्ताजगन्नाथोह्यशेषाघौघनाशनः । कर्मणा केन स प्रीतो भवेद्यः सचराचरः ॥ २ ॥
लक्ष्मीपति जगन्नाथ, जो समस्त पाप-समूह का नाशक है और चर-अचर में व्याप्त है—वह किस कर्म से प्रसन्न होता है?
Verse 3
सौतिरुवाच । भक्तिग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्द्धरणीधर । भक्त्या संपूजितो विष्णुः प्रददाति मनोरथम् ॥ ३ ॥
सूत ने कहा—हे धरणीधर! हृषीकेश धन से नहीं, केवल भक्ति से वश होते हैं। भक्ति से पूजित विष्णु भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।
Verse 4
तस्माद्विप्राः सदा भक्तिः कर्त्तव्या चक्रपाणिनः । जनेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशहा भवेत् ॥ ४ ॥
अतः हे विप्रों! चक्रपाणि भगवान् की भक्ति सदा करनी चाहिए। साधारण जन भी जगन्नाथ की पूजा करें तो वे उनके क्लेशों का नाश करते हैं।
Verse 5
परितोषं व्रजत्याशुतृषितस्तु जलैर्यथा । अत्रापि श्रूयते विप्रा आख्यानं पापनाशनम् ॥ ५ ॥
जैसे प्यासा मनुष्य जल पाकर शीघ्र तृप्त हो जाता है, वैसे ही हे विप्रों! यहाँ पाप-नाशक पवित्र आख्यान सुनाया जाता है।
Verse 6
रुक्मांगदस्य संवादमृषिणा गौतमेन हि । आसीद्ग्रुक्मांगदो राजा सार्वभौमः क्षमान्वितः ॥ ६ ॥
रुक्मांगद के प्रसंग का यह संवाद ऋषि गौतम ने कहा था। रुक्मांगद नामक राजा सार्वभौम और क्षमाशील था।
Verse 7
क्षीरशायिप्रियो भक्तो हरिवासरतत्परः । नान्यं पश्यति देवेशात्पद्मनाभान्महीपतिः ॥ ७ ॥
वह राजा क्षीरशायी भगवान् का प्रिय भक्त था, हरि-वास में तत्पर रहता था। देवेश पद्मनाभ के सिवा वह किसी और को नहीं देखता था।
Verse 8
पटहं वारणे धृत्वा वादयेद्धरि वासरे । अष्टवर्षाधिको यस्तु पञ्चाशीत्यूनवर्षकः ॥ ८ ॥
हरि के पावन वासर में हाथी पर नगाड़ा रखकर उसे बजवाए। यह कर्म आठ वर्ष से अधिक और पचासी वर्ष से कम आयु वाला करे।
Verse 9
भुनक्ति मानवो ह्यद्य विष्णोरहनि मंदधीः । स मे दंड्यश्च वध्यश्च निर्वास्यो नगराद्बहिः ॥ ९ ॥
जो मंदबुद्धि मनुष्य आज विष्णु के पावन दिन में भोजन करता है, वह मेरे मत में दंडनीय है, वध योग्य है और नगर-सीमा के बाहर निर्वासित किया जाए।
Verse 10
पिता च यदि वा भ्राता पुत्रो भार्या सुहृन्मम । पद्मनाभदिने भोक्ता निग्राह्यो दस्युवद्भवेत् ॥ १० ॥
चाहे पिता हो, भाई हो, पुत्र हो, पत्नी हो या मेरा प्रिय मित्र—जो पद्मनाभ के दिन भोजन करे, वह चोर के समान निग्रह योग्य और सुधार योग्य है।
Verse 11
ददघ्वंम विप्रमुख्यभ्यो मज्जध्वं जाह्नवीजले । ममेद वचनं श्रृत्वा राज्यं भुंजीत मामकम् ॥ ११ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान दो और जाह्नवी (गंगा) के जल में स्नान-निमज्जन करो। मेरा यह वचन सुनकर स्वीकार कर, वह मेरे राज्य का उपभोग करे।
Verse 12
वासरे वासरे विष्णोः शुक्लपक्षे महीपतिः । अशुक्ले तु विशेषेण पटहे हेमसंपुटे ॥ १२ ॥
हे महीपते! शुक्ल पक्ष में विष्णु के लिए प्रतिदिन इस विधान का पाठ/अनुष्ठान करे; किंतु कृष्ण पक्ष में विशेष सावधानी से—वस्त्र में लपेटकर और स्वर्ण-पेटिका में रखकर—इसे करे।
Verse 13
एवं प्रघुष्टे भूपेन सर्वभूमौ द्विजोत्तमाः । गच्छिद्भिः संकुलो मार्गः कृतो कृतो लोकैर्हरेर्द्विजाः ॥ १३ ॥
इस प्रकार राजा द्वारा समस्त देश में घोषणा कराए जाने पर, हे द्विजोत्तमो, हरि-भक्त जन बार-बार निकल पड़े; मार्ग लोगों से घने भर गए, हे ब्राह्मणो॥१३॥
Verse 14
ये केचिन्निधनं यांति भूपालविषये नराः । ज्ञानात्प्रमादतो वापि ते यांति हरिमन्दिरम् ॥ १४ ॥
राजा के राज्य-क्षेत्र में जो भी मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते हैं—चाहे जान-बूझकर या प्रमादवश—वे हरि के धाम (मन्दिर/आवास) को जाते हैं॥१४॥
Verse 15
अवश्यं वैष्णवो लोकः प्राप्यते मानवैर्द्विजाः । व्याजेनापि प्रकुर्वाणैर्द्वादशीं पापनाशिनीम् ॥ १५ ॥
हे द्विजो, मनुष्य निश्चय ही वैष्णव लोक को प्राप्त करते हैं—यदि वे पापनाशिनी द्वादशी का व्रत बहाने से भी कर लें॥१५॥
Verse 16
सोऽश्नाति पार्थिवं पापं योऽश्नाति हरिवासरे । स प्राप्नोति धराधर्मं यो नाश्नाति हरेर्दिने ॥ १६ ॥
जो हरि के पावन दिवस में खाता है, वह सांसारिक पाप को ही खाता है; और जो हरि के दिन नहीं खाता, वह धराधर्म (भूमि को धारण करने वाला धर्म) को प्राप्त करता है॥१६॥
Verse 17
ब्राह्मणो नैव हंतव्य इत्येषा वैदिकी स्मृतिः । एकादश्यां न भोक्तव्यं पक्षयोरुभयोरपि ॥ १७ ॥
“ब्राह्मण का वध कदापि नहीं करना चाहिए”—यह वैदिक स्मृति है; वैसे ही एकादशी को, दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) में, भोजन नहीं करना चाहिए॥१७॥
Verse 18
वैलक्ष्यमगमद्राजा रविसूनुर्द्विजोत्तमाः । लेख्यकर्मणि विश्रांतश्चित्रगुप्तोऽभवत्तदा ॥ १८ ॥
हे द्विजोत्तम! सूर्यपुत्र राजा लज्जित हो गया; और उसी समय चित्रगुप्त लेखा-लेखन के कर्म में तल्लीन होकर लग गया।
Verse 19
संमार्जितानि लेख्यानि पूर्वकर्मोद्भवानि च । गच्छंति वैष्णवं लोकं स्वधर्मैर्मानवाः क्षणात् ॥ १९ ॥
जब पूर्वकर्म से उत्पन्न कर्म-लेख मिटा दिए जाते हैं, तब मनुष्य अपने स्वधर्म का पालन करके क्षणभर में वैष्णव लोक को पहुँच जाते हैं।
Verse 20
शून्यास्तु निरयाः सर्वे पापप्राणिविवर्जिताः । भग्नो याम्योऽभवन्मार्गो द्वादशादित्यतापितः ॥ २० ॥
सब नरक पापी प्राणियों से रहित होकर सूने हो गए; और बारह आदित्यों की तपन से यम का दक्षिण मार्ग टूट-सा गया।
Verse 21
सर्वे हि गरुडारूढा जना यांति हरेः पदम् । देवा नामपि ये लोकास्ते शून्या ह्यभवँस्तथा ॥ २१ ॥
सभी जन गरुड़ पर आरूढ़ होकर हरि के परम पद को जाते हैं; और देवताओं के लोक भी उसी प्रकार सूने हो गए।
Verse 22
उत्सन्नाः पितृदेवेज्यास्तीर्थदानादिसत्क्रियाः । मुक्त्वैकां द्वादशीं मर्त्या नान्यं जानंति ते व्रतम् ॥ २२ ॥
पितृ-तर्पण, देव-पूजन, तीर्थ-स्नान, दान आदि सत्कर्म मानो लुप्त-से हो गए; क्योंकि मर्त्य एकादशी-द्वादशी में से केवल द्वादशी को छोड़कर कोई अन्य व्रत जानते ही नहीं।
Verse 23
शून्ये त्रिविष्टपे जाते शून्ये च नरके तथा । नारदो धर्मराजानं गत्वा चेदमुवाच ह ॥ २३ ॥
जब त्रिविष्टप स्वर्ग सूना हो गया और वैसे ही नरक भी रिक्त हो गया, तब नारद धर्मराज यम के पास गए और यह वचन बोले।
Verse 24
नारद उवाच । नाक्रंदः श्रूयते राजन् प्रांगणे नरकेष्वथ । न चापि क्रियते लेख्यं किंचिद्दुष्कृतकर्मणाम् ॥ २४ ॥
नारद बोले—हे राजन्! नरकों के प्रांगण में कोई क्रंदन सुनाई नहीं देता; और दुष्कर्म करने वालों का कोई लेखा भी वहाँ लिखा नहीं जाता।
Verse 25
चित्रगुप्तो मुनिरिव स्थितोऽयं मौनसंयुतः । कारणं किं न चायांति पापिनो येन ते गृहम् ॥ २५ ॥
यह चित्रगुप्त मुनि के समान मौन धारण किए खड़ा है। किस कारण से पापीजन तुम्हारे गृह में नहीं आते?
Verse 26
मायादंभसमाक्रांता दुष्टकर्मरतास्तथा । एवमुक्ते तु वचने नारदेन महात्मना ॥ २६ ॥
माया और दंभ से आक्रांत, तथा दुष्ट कर्मों में रत—महात्मा नारद के ऐसे वचन कहे जाने पर…
Verse 27
प्राह वैवस्वतो राजा किंचिद्दैन्यसमन्वितः । यम उवाच । योऽयं नारद भूपालः पृथिव्यां सांप्रतं स्थितः ॥ २७ ॥
तब वैवस्वत यमराज कुछ दैन्य से युक्त होकर बोले—यम ने कहा: हे नारद! यह जो राजा इस समय पृथ्वी पर स्थित है—
Verse 28
स हि भक्तो हृषीकेशे पुराणपुरुषोत्तमे । प्रबोधयति राजेंद्रः स जनं पटहेन हि ॥ २८ ॥
वह हृषीकेश—आदि पुरुषोत्तम—का भक्त है। हे राजेंद्र, वह राजा ढोल-नगाड़े की घोषणा से प्रजा को जगाता और उपदेश देता है।
Verse 29
न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं संप्राप्ते हरिवासरे । ये केचिद्भुञ्जते मर्त्यास्ते मे दंडेषु यांति हि ॥ २९ ॥
हरिवासर (एकादशी) आ जाने पर भोजन नहीं करना चाहिए—नहीं करना चाहिए। जो मनुष्य उस दिन खाते हैं, वे निश्चय ही मेरे दंड-भाग में जाते हैं।
Verse 30
तद्भयाद्धि जनाः सर्वे द्वादशीं समुपासते । व्याजेनापि मुनुश्रेष्ठ द्वादश्यां समुपोषिताः ॥ ३० ॥
उसी भय से सब लोग द्वादशी का पालन करते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ, बहाने से ही सही, वे द्वादशी को उपवास कर ही लेते हैं।
Verse 31
प्रयांति वैष्णवं लोकं दाहप्रलयवर्जितम् । द्वादशीसेवनाल्लोकाः प्रायांति हरिमंदिरम् ॥ ३१ ॥
वे वैष्णव लोक को प्राप्त होते हैं, जो दाह-प्रलय से रहित है। द्वादशी-सेवन से लोग निश्चय ही हरि के धाम को पहुँचते हैं।
Verse 32
तेन राज्ञा द्विजश्रेष्ठ मार्गा लुप्ता ममाधुना । कृत हि नरकाः शून्या लोकाश्चापि दिवौकसाम् ॥ ३२ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ, उस राजा ने अब मेरे लोक के मार्ग काट दिए हैं। सचमुच नरक सूने हो गए हैं और देवताओं के लोक भी (फलतः) रिक्त हो गए हैं।
Verse 33
विश्रांतं लेखकेर्लेख्यं लिखितं मार्जितं जनैः । एकादश्युपवासस्य माहात्म्येन द्विजोत्तम ॥ ३३ ॥
हे द्विजोत्तम! एकादशी-उपवास के माहात्म्य से लेखक का जो लेख विश्राम को प्राप्त हुआ था, उसे लोगों ने फिर से लिख दिया और मिटाकर शुद्ध भी कर दिया।
Verse 34
ब्रह्महत्यादिपापानि अभुक्त्वैव जना द्विज । समुपोष्य दिनं विष्णोः प्रयांति हरिमंदिरम् ॥ ३४ ॥
हे द्विज! ब्रह्महत्या आदि पापों के फल भोगे बिना ही लोग विष्णु के लिए एक दिन पूर्ण उपवास करके हरि के धाम को प्राप्त होते हैं।
Verse 35
सोऽहं काष्टमृगेणैव तुल्यो जातो महामुने । नेत्रहीनः कर्णहीनः संध्याहीनो द्विजो यथा ॥ ३५ ॥
हे महामुने! मैं काष्ठ-मृग के समान हो गया हूँ—मानो नेत्रहीन और कर्णहीन; जैसे संध्या-वंदन से रहित द्विज होता है।
Verse 36
स्त्रीजितो वा पुमान्यद्वत्षंढो वा प्रमदापतिः । त्यक्तकामस्त्वहं ब्रह्मंल्लोकपालत्वमीदृशम् ॥ ३६ ॥
जैसे स्त्री से जीता हुआ पुरुष हो, या नपुंसक हो, या केवल स्त्रियों का पति-मात्र हो—वैसे ही; पर हे ब्रह्मन्! मैं काम का त्याग करके लोकपालत्व का ऐसा पद प्राप्त कर सका।
Verse 37
यास्यामि ब्रह्मलोके वै दुःखं ज्ञापयितुं स्वकम् । निर्व्यापारो नियोगी तु नियोगे यस्तु तिष्ठति ॥ ३७ ॥
मैं ब्रह्मलोक में जाकर अपना दुःख निवेदित करूँगा। पर जो नियोगी स्वयं अनासक्त होकर भी नियुक्ति का कार्य करता है, उसे उसी नियोग की मर्यादा में स्थित रहना चाहिए।
Verse 38
स्वामिवित्तं समश्नाति स याति नरकं ध्रुवम् । सौतिरुवाच । एवमुक्त्वा यमो विप्रा नारदेन समन्वितः ॥ ३८ ॥
जो अपने स्वामी के धन को भोगता या हड़प लेता है, वह निश्चय ही नरक को जाता है। सूति बोले—ऐसा कहकर नारद सहित यम ने ब्राह्मणों से कहा।
Verse 39
ययौ विरंचिसदनं चित्रगुप्तेन चान्वितः । स ददर्श समासीनं मूर्तामूर्तजनावृतम् ॥ ३९ ॥
चित्रगुप्त के साथ वह विरञ्चि (ब्रह्मा) के सदन को गया। वहाँ उसने उन्हें आसनस्थ देखा, जो मूर्त और अमूर्त जनों से घिरे थे।
Verse 40
वेदाश्रयं जगद्बीजं सर्वेषां प्रपितामहम् । स्वभवं भूतनिलयमोंकाराख्यमकल्मषम् ॥ ४० ॥
वे वेदों के आश्रय, जगत् के बीज और सबके प्रपितामह हैं। स्वयम्भू, समस्त भूतों के निलय, वे ‘ओंकार’ नाम से प्रसिद्ध—निर्मल और निष्कलुष हैं।
Verse 41
शुचिं शुचिपदं हंसं ब्रह्माणं दर्भलांछनम् । उपास्यमानं विविधैर्लोकपालैर्दिगीश्वरैः ॥ ४१ ॥
उसने ब्रह्मा को देखा—पवित्र, शुचि-पद में स्थित, हंस-स्वरूप, दर्भ-चिह्नित—जिनकी विविध लोकपाल और दिगीश्वर उपासना कर रहे थे।
Verse 42
इतिहासपुराणैश्च वेदौर्वेग्रहसंस्थितैः । मूर्तिमद्भिः समुद्रैश्य नदीभिश्च सरोवरैः ॥ ४२ ॥
इतिहास-पुराणों द्वारा, तथा ग्रहों सहित व्यवस्थित वेदों द्वारा; और मूर्तिमान समुद्रों, नदियों तथा सरोवरों द्वारा (उनकी उपासना हो रही थी)।
Verse 43
देहधृग्भिस्तथा वृक्षैरश्वत्थाद्यैर्विशेषतः । वापीकूपतडागाद्यैर्मूर्तिमद्भिश्च पर्वतैः ॥ ४३ ॥
उसी प्रकार देहधारी प्राणियों में, तथा वृक्षों में—विशेषतः अश्वत्थ आदि में—वापी, कूप, तड़ाग आदि जलाशयों में, और मूर्तिमान पर्वतों में भी पवित्र तत्त्व का दर्शन होता है।
Verse 44
अहोरात्रैस्तथा पक्षैर्मासैः संवत्सरैर्द्विजाः । कलाकाष्ठानिमेषैश्च ऋतुभिश्चायनैर्युगैः ॥ ४४ ॥
हे द्विजो! काल की गणना दिन-रात, पक्ष, मास और संवत्सर से होती है; तथा कला, काष्ठा, निमेष से भी, और ऋतु, अयन तथा युगों से भी।
Verse 45
मन्वंतरैस्तथा कल्पैर्निमेषैरुन्मिषैरपि । ऋक्षैर्योगैश्च करणैः पौर्णमासेंदुसंक्षयैः ॥ ४५ ॥
काल की गणना मन्वंतर और कल्पों से भी होती है, निमेष और उन्मेष से भी; तथा नक्षत्रों, योगों, करणों, पौर्णमास और चन्द्रक्षय से भी की जाती है।
Verse 46
सुखैर्दुःखैस्तथा द्वंद्वैर्लाभालाभैर्जयाजयैः । सत्यानृतैश्च देवेशो वेष्टितो धर्मपावकः ॥ ४६ ॥
सुख-दुःख, द्वंद्व, लाभ-हानि, जय-पराजय, तथा सत्य-असत्य—इन सब से देवेश आवृत प्रतीत होते हैं; और धर्मरूपी पावक इन अवस्थाओं के भीतर लिपटा रहता है।
Verse 47
कर्मविद्भिश्च पुरुषैरनुरुपैरुपास्यते । सत्त्वेन रजसा चैव तमसा च पितामहः ॥ ४७ ॥
कर्मविद् पुरुष, अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार, सत्त्व, रज और तम—इन गुणों के द्वारा पितामह (ब्रह्मा) की उपासना करते हैं।
Verse 48
शांतमूढातिघोरैश्च विकारैः प्राकृतैर्विभुः । वायुना श्लेष्मपित्ताभ्यां मूर्तैरातंकनामभिः ॥ ४८ ॥
सर्वव्यापी प्रभु वायु, कफ और पित्त से उत्पन्न, प्रकट होकर ‘रोग’ कहलाने वाले शान्त, मोहक और अति-घोर प्राकृतिक विकारों से भी संबद्ध दिखते हैं।
Verse 49
आनंदेन च विश्वात्मा परधर्मं समाश्रितः । अनुक्तैरपि भूतैश्च संवृतो लोककृत्स्वयम् ॥ ४९ ॥
आनन्दस्वरूप विश्वात्मा परम-धर्म का आश्रय लेता है; और यद्यपि उसका वर्णन न भी हो, फिर भी वह समस्त भूतों से आवृत है—क्योंकि वही स्वयं लोकों का कर्ता और धारक है।
Verse 50
दुरुक्तैः कटुवाक्याद्यैर्मूर्तिमद्भिरुपास्यते । तेषां मध्येऽविशत्सौरिः सव्रीडेव वधूर्यथा ॥ ५० ॥
देहधारी जन कटु वचनों—कड़वे और अपमानजनक शब्दों—से उपासना कर रहे थे; उन्हीं के बीच सौरि ऐसे प्रविष्ट हुए जैसे लज्जित वधू संकोच से प्रवेश करे।
Verse 51
विलोकयन्नधोभागं नम्रवक्त्रो व्यदर्शयत् । ते प्रविष्टं यमं दृष्ट्वा सकायस्थं सनारदम् ॥ ५१ ॥
वह नीचे की ओर देखते हुए, मुख झुकाकर, उसे दिखाने लगा; तब उन्होंने यम को—अपने कायस्थ (दूतों) सहित—प्रविष्ट देखा, और वहाँ नारद को भी देखा।
Verse 52
विस्मिताक्षा मिथः प्रोचुः किमयं भास्करिस्त्विह । संप्राप्तो हि लोककरं द्रष्टुं देवं पितामहम् ॥ ५२ ॥
वे विस्मय से आँखें फैलाकर आपस में बोले—“यहाँ यह भास्कर (सूर्यदेव) कौन है? क्या यह सचमुच लोक-कर्ता देव पितामह ब्रह्मा को देखने आया है?”
Verse 53
निर्व्यापारः क्षणं नास्ति योऽयं व्यग्रो रवेः सुतः । सोऽयमभ्यागतः कस्मात्कञ्चित्क्षेमं दिवौकसाम् ॥ ५३ ॥
रवि का यह पुत्र क्षणभर भी निष्क्रिय नहीं रहता; सदा व्यग्र होकर अपने कार्य में लगा रहता है। फिर वह यहाँ क्यों आया है? निश्चय ही स्वर्गवासी देवताओं के किसी कल्याण हेतु ही आया होगा।
Verse 54
आश्चर्यातिशयं मन्ये यन्मार्जितपटस्त्वयम् । लेखकः समनुप्राप्तो दैन्येन महतान्वितः ॥ ५४ ॥
मैं इसे आश्चर्य की पराकाष्ठा मानता हूँ कि तुम—मानो धुला-पोंछा वस्त्र—हो, और फिर भी महान दैन्य से युक्त एक लेखक तुम्हारे पास आ पहुँचा है।
Verse 55
न केनचित्पटो ह्यस्य मार्जितोऽभूच्च धर्मिणा । यन्न दृष्टं श्रुंत वापि तदिहैव प्रदृश्यते ॥ ५५ ॥
किसी धर्मात्मा ने इस वस्त्र को कभी नहीं मारा-धोया; फिर भी जो न देखा गया, न सुना गया—वही यहाँ प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है।
Verse 56
एवमुच्चरतां तेषां भूतानां कृतशासनः । निपपाताग्रतो विप्रा ब्रह्मणो रविनन्दनः ॥ ५६ ॥
उन भूतों के ऐसा कहते रहते समय, उन्हें पहले ही वश में कर चुका वह—हे ब्राह्मणों—रवि का नन्दन, ब्रह्मा का पुत्र, उनके सामने गिर पड़ा।
Verse 57
मूलच्छिन्नो यथा शाखी त्राहि त्राहीति संरुदन् । परिभूतोऽस्मि देवेश यन्मार्जितपटः कृतः ॥ ५७ ॥
जैसे जड़ से कटी हुई डाल, मैं बार-बार रोते हुए पुकारता हूँ—‘त्राहि, त्राहि!’ हे देवेश, मेरा अपमान हुआ है; मुझे मारा-धोया वस्त्र-सा बना दिया गया है।
Verse 58
त्वया नाथेन विधुरं पश्यामि कमलासन । एवं ब्रुवन्स निश्चेष्टो बभूव द्विजसंत्तमाः ॥ ५८ ॥
हे कमलासन नाथ! आप मेरे रक्षक होकर भी मैं अपने को विधुर, असहाय देखता हूँ। ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ द्विज मुनि निश्चेष्ट हो गया।
Verse 59
ततो हलहलाशब्दः सभायां समवर्तत । योऽर्थं रोदयते लोकान्सर्वान्स्थावरज गमान् ॥ ५९ ॥
तब सभा में “हलहला!” का शब्द उठा, जिसने स्थावर और जंगम सहित समस्त लोकों को रुला दिया।
Verse 60
सोऽयं रोदिति दुःखार्तः कस्माद्वैवस्वतो यमः । अथवा सत्यगाथेयं लौकिकी प्रतिभाति नः ॥ ६० ॥
यह दुःख से पीड़ित होकर रो रहा है—फिर इसे वैवस्वत यम क्यों कहा जाता है? अथवा यह सत्य वृत्तांत ही है, क्योंकि यह हमें केवल लौकिक कथा-सा नहीं प्रतीत होता।
Verse 61
जनसन्तापकर्ता यः सोऽचिरेणोपतप्यते । नहि दुष्कृतकर्मा हि नरः प्राप्नोति शोभनम् ॥ ६१ ॥
जो जनों को संताप देने वाला होता है, वह शीघ्र ही स्वयं तप्त होता है। क्योंकि दुष्कर्म करने वाला मनुष्य कभी भी शोभन, कल्याणकारी फल नहीं पाता।
Verse 62
ततो निवारयामास वायुस्तेषां वचस्तदा । लोकानां समचित्तानां मतं ज्ञात्वा हि वेधसः ॥ ६२ ॥
तब वायु ने उनके वचन को रोक दिया, क्योंकि उसने समचित्त लोकों के विषय में वेधस (ब्रह्मा) का अभिप्राय जान लिया था।
Verse 63
निवार्य शंकां मार्तंडिं शनैरुत्थापयन् विभुः । भुजाभ्यां साधुपीनाभ्यां लोकमूर्तिरुदारधीः ॥ ६३ ॥
मार्तण्डी की शंका दूर करके वह सर्वशक्तिमान, उदार बुद्धि और लोकस्वरूप प्रभु ने अपने सुगठित, बलवान दोनों भुजाओं से उसे धीरे-धीरे उठाया।
Verse 64
विह्वलं तं पलायंतमासने संन्यवेशयत् । सकायस्थमुवाचेदं व्योममूर्तिं रवेः सुतम् ॥ ६४ ॥
उसे व्याकुल होकर भागते देख, उसने उसे आसन पर बैठा दिया। फिर वह देहधारी होकर वहीं खड़ा था, तब उसने आकाश-स्वरूप प्रकट रूप—रवि के पुत्र—से यह कहा।
Verse 65
केन त्वमभिभूतोऽसि केन स्थानाद्विवासितः । केनापमार्जितो देवपटो लोकपटस्तव ॥ ६५ ॥
तुम किसके द्वारा पराजित किए गए हो? किसने तुम्हें तुम्हारे स्थान से निकाल दिया? किसने तुम्हारा देवध्वज—लोक के सामने का ध्वज—मिटा दिया?
Verse 66
ब्रूहि सर्वमशेषेण कुशकेतुर्वदत्वयम् । यः प्रभुस्तात सर्वेषां स ते कर्ता समुन्नतिम् । अपनेष्यति मार्तंडे दुःखं हृदयसंस्थितम् ॥ ६६ ॥
सब कुछ बिना छिपाए कहो—कुशकेतु बोलें। हे मार्तण्ड, जो प्रभु सबके स्वामी हैं, वही तुम्हारा उत्थान करेंगे और हृदय में बैठा दुःख दूर कर देंगे।
Verse 67
स एवमुक्तस्तु प्रभंजनेन दिनेशसूनुस्तमथो बभाषे । विलोक्य वक्त्रं कुशकेतुसूनोः सगद्गदं मंदमुदीरयन्वचः ॥ ६७ ॥
प्रभञ्जन के ऐसा कहने पर, दिनेश (सूर्य) का पुत्र उससे बोला। कुशकेतु के पुत्र के मुख को देखकर, वह भावविह्वल होकर धीमे-धीमे काँपती वाणी में शब्द कहने लगा।
Verse 68
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणोत्तरे भागे यमस्य ब्रह्मलोकगमनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के उत्तरभाग में “यम का ब्रह्मलोक-गमन” नामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ॥३॥
The chapter frames Dvādaśī as a concentrated vrata whose observance (even imperfectly or ‘on a pretext’) redirects karmic trajectories: it nullifies recorded demerit, breaks access to Yama’s southern path, and yields immediate eligibility for the Vaiṣṇava realm—thereby functioning as a mokṣa-oriented ritual shortcut anchored in Viṣṇu-bhakti.
Citragupta represents karmic auditability—deeds as ‘written records.’ The narrative’s claim that records are rewritten/erased by Ekādaśī–Dvādaśī observance dramatizes the Purāṇic doctrine that devotional vrata can supersede punitive karmic administration under Yama.
Ekādaśī is emphasized as the day of strict non-eating (Harivāsara restraint), while Dvādaśī is highlighted as the sin-destroying observance whose uptake becomes widespread due to fear of consequences; together they form a paired vrata-logic: restraint (Ekādaśī) culminating in salvific observance (Dvādaśī).