Uttara BhagaAdhyaya 27155 Verses

The Account of Kāṣṭhīlā (Kāṣṭhīlā-ākhyāna) within the Mohinī Narrative

वसिष्ठ बताते हैं कि धर्माङ्गद अपनी माता सन्ध्यावली को बुलाता है। सन्ध्यावली राजा रुक्माङ्गद और मोहिनी के बीच मध्यस्थ बनकर कहती है कि हरिवासर/एकादशी के दिन राजा को पापयुक्त या निषिद्ध भोजन नहीं करना चाहिए; सत्य और व्रत की रक्षा करते हुए मोहिनी से किसी अन्य वर की याचना करने को कहती है। फिर स्त्री-धर्म का विस्तार होता है—पत्नी का कर्तव्य है कि वह पति के धर्म-व्रत को संभाले, और उसे अधर्म में बाध्य करने से नरक तथा नीच योनियों का फल मिलता है। मोहिनी पाप, भाग्य और गर्भाधान के समय मनोवृत्ति से संतान-स्वभाव बनने की प्रधानता पर भी बोलती है। इसके बाद काष्ठीला का अंतर्कथानक आता है—वह सन्ध्यावली से पूर्वजन्म का अपराध स्वीकारती है: अहंकार, गिरे हुए पति की सहायता न करना और गृह-लोभ से कर्म-पतन हुआ; अनेक जन्मों के बाद राक्षस-प्रसंग में अपहरण, सौतिया-वैमनस्य, छल और हिंसा का संकट खड़ा होता है। अध्याय संकट के बीच रुकता है और एकादशी-धर्म व सत्यव्रत को नैतिक केंद्र बनाता है।

Shlokas

Verse 1

वसिष्ठ उवाच । तत्पितुर्वचनं श्रुत्वा पुत्रो धर्मांगदस्तदा । आहूय जननीं शीघ्रं नाम्ना संध्यावलीं शुभाम् ॥ १ ॥

वसिष्ठ बोले—पिता के वचन सुनकर पुत्र धर्मांगद ने तब शीघ्र ही संध्यावली नाम की अपनी शुभ माता को बुलाया।

Verse 2

सूर्यायुत समप्रख्यां तेजसा रुचिरस्तनाम् । पालयंतीं धरां सर्वां पादविन्यासविक्रमैः ॥ २ ॥

वह दस हज़ार सूर्यों के समान तेजस्विनी, रूप-लावण्य से युक्त, और अपने चरण-प्रहार व पदचाप की महिमा से समस्त पृथ्वी का पालन-रक्षण करने वाली थी।

Verse 3

पुत्रस्य वचनात्प्राप्ता तत्क्षणं नृपसन्निधौ । श्राविता मोहिनी वाक्यं पितुर्वाक्यं तथैव च ॥ ३ ॥

पुत्र के वचन से वह तत्क्षण राजा के सम्मुख पहुँची। वहाँ मोहिनी को पुत्र का कथन और उसी प्रकार पिता का कथन भी सुनाया गया।

Verse 4

उभयोः संविदं कृत्वा परिसांत्वय्य मोहिनीम् । भोजनाय स्थितामेनां नृपस्य हरिवासरे ॥ ४ ॥

दोनों पक्षों में समझौता कराकर उसने मोहिनी को शान्त किया। किन्तु राजा के हरिवासर (हरि का पावन दिन) में वह भोजन करने को तत्पर खड़ी रही।

Verse 5

यथा नो च्यवते सत्याद्यथा भुंक्ते न मे पिता । तथा विधीयतामेवं कुशलं चोभयोर्भवेत् ॥ ५ ॥

ऐसी व्यवस्था की जाए कि मैं सत्य से न डिगूँ और मेरे पिता को भी (अधर्म या कष्ट का) भोग न करना पड़े। ऐसा ही किया जाए, जिससे हम दोनों का कल्याण हो।

Verse 6

तत्पुत्रवचनं श्रुत्वा देवी संध्यावली नृप । मोहिनीं श्लक्ष्णया वाचा प्राह ब्रह्मसुता तदा ॥ ६ ॥

हे राजन्, पुत्र के वचन सुनकर ब्रह्मा की पुत्री देवी संध्यावली ने तब मोहिनी से कोमल वाणी में कहा।

Verse 7

माग्रहं कुरु वामोरु कथंचिदपि भूपतिः । नास्वादयति पापान्न संप्राप्ते हरिवासरे ॥ ७ ॥

हे सुजंघे, आग्रह मत करो; हरिवासर (एकादशी) के आ जाने पर राजा किसी भी प्रकार पापमय अन्न का आस्वाद नहीं करता।

Verse 8

अनुवर्तय राजान गुरुरेष सनातनः । सदा भवति या नारी भर्तुर्वचनकारिणी ॥ ८ ॥

हे राजन्, इसका पालन करो—यह सनातन सदाचार-नियम है। जो नारी सदा पति के वचन का पालन करती है, वही साध्वी मानी जाती है।

Verse 9

तस्याः स्युरक्षयया लोकाः सावित्र्यास्तु यथामलाः । यद्यनेन पुरा देवि तव दत्तः करो गिरौ ॥ ९ ॥

हे देवी, उसके लोक अक्षय हो जाते हैं और सावित्री के समान निर्मल होते हैं; क्योंकि इसी ने पूर्वकाल में पर्वत पर तुम्हें अपना हाथ अर्पित किया था।

Verse 10

कामार्तेन विमूढेन तन्न योऽग्यं विचिंतितम् । यद्देयं तद्ददात्येष ह्यदेयं प्रार्थयस्व मा ॥ १० ॥

काम से पीड़ित और मोहित होकर उसने उचित-अनुचित का विचार नहीं किया। यह वही देगा जो देने योग्य है; इसलिए जो अदेय है, वह मुझसे मत माँगो।

Verse 11

विपत्तिरपि भद्रैव सन्मार्गे संस्थितस्य तु । न भुक्तं येन सुभगे शैशवेऽपि हरेर्दिने ॥ ११ ॥

हे सुभगे, जो सन्मार्ग में स्थित है उसके लिए विपत्ति भी कल्याणकारी है; क्योंकि उसने बाल्यकाल से भी हरि के दिन में भोजन नहीं किया (व्रत-भंग नहीं किया)।

Verse 12

स कथं भोक्ष्यते पुण्ये माधवस्य दिनेऽधुना । कामं वरय वामोरुवरमन्यं सुदुर्लभम् ॥ १२ ॥

वह अब माधव के इस पुण्य-दिन में कैसे भोजन करेगा? हे वामोरु, चाहे जितना दुर्लभ हो, कोई अन्य वर चुन लो।

Verse 13

तं ददात्येव भूपालो निवृत्ता भव भोजने । मन्यसे यदि मां देवि धर्मांगदविरोहिणीम् ॥ १३ ॥

राजा निश्चय ही उसे दे देगा। इसलिए, हे देवी, भोजन से विरत हो जाओ—यदि तुम मुझे धर्म-आभूषण का विरोध न करने वाली मानती हो॥१३॥

Verse 14

अस्मज्जीवितसंयुक्तं राज्यं वरय सुव्रते । सप्तद्वीपसमेतं हि ससरिद्वनपर्वतम् ॥ १४ ॥

हे सुव्रते, हमारे प्राणों से जुड़ा हुआ राज्य चुन लो—सातों द्वीपों सहित, नदियों, वनों और पर्वतों समेत॥१४॥

Verse 15

कनिष्ठाया वरिष्ठाहं करिष्ये पादवंदनम् । भर्तुरर्थे विशालाक्षि प्रसीद तनुमध्यमे ॥ १५ ॥

मैं ज्येष्ठ होकर भी कनिष्ठा के चरणों में प्रणाम करूँगी। पति के हित के लिए, हे विशालाक्षि, प्रसन्न हो, हे तनुमध्यमा॥१५॥

Verse 16

वाचा शपथदोषैस्तु संनिरुध्य पतिं हि या । अकार्यं कारयेत्पापा सा नारी निरये वसेत् ॥ १६ ॥

जो पापिनी स्त्री वाणी से—शपथ और शाप के दोषों का सहारा लेकर—पति को बाँधती है और उससे अकार्य कराती है, वह नरक में वास करती है॥१६॥

Verse 17

सा च्युता नरकाद्धोरात्सप्तजन्मानि पंच च । सूकरीं योनिमाप्नोति चांडालीं च ततः परम् ॥ १७ ॥

उस भयानक नरक से गिरकर वह बारह जन्म भोगती है; वह सूकरी की योनि पाती है और उसके बाद चाण्डाली स्त्री होती है॥१७॥

Verse 18

एवं ज्ञात्वा मया देवि विक्रियां पापसंभवाम् । निवारितासि वामोरु सखीभावेन सुंदरि ॥ १८ ॥

हे देवि! पाप से उत्पन्न इस हानिकारक विकृति को जानकर, हे सुन्दर वामोरु, मैंने सखी-भाव से तुम्हें रोक दिया है।

Verse 19

विपक्षस्यापि सद्बुद्धिर्दातव्या धर्ममिच्छता । किं पुनः सखिसंस्थायास्तव पद्मनिभानने ॥ १९ ॥

धर्म चाहने वाले को विरोधी को भी सद्बुद्धि देनी चाहिए; फिर जो सखी-स्थान में हो, हे पद्म-निभानने, उसे तो और भी।

Verse 20

संध्या वलीवचः श्रुत्वा मोहिनी मोहकारिणी । उवाच कनकाभां तां भर्तुर्ज्येष्ठां प्रियां तदा ॥ २० ॥

संध्यावली के वचन सुनकर, मोह उत्पन्न करने वाली मोहिनी ने तब अपने पति की ज्येष्ठ प्रिया, उस कनक-प्रभा स्त्री से कहा।

Verse 21

माननीयासि मे सुभ्रु करोमि वचनं तव । विद्वद्भिर्मुनिभिर्य्यत्तु गीयते नारदादिभिः ॥ २१ ॥

हे सुभ्रु! तुम मेरे लिए माननीय हो; मैं तुम्हारा वचन मानूँगी—वही जो विद्वान मुनियों द्वारा, नारद आदि ऋषियों के द्वारा गाया जाता है।

Verse 22

यदि तन्नाचरेद्राजा भोजनं हरिवासरे । क्रियतामपरं देवि मरणादधिकं तव ॥ २२ ॥

यदि राजा हरिवासर में भोजन से विरत न हो, तो हे देवि, कोई और उपाय करो; यह तुम्हारे लिए मृत्यु से भी अधिक भयंकर है।

Verse 23

ममापि दुःखदंह्येतद्दैवाज्जल्पाम्यहं शुभे । कस्येष्टमात्महननं कस्येष्टं विषभक्षणम् ॥ २३ ॥

यह बात मुझे भी दुःख देती है; फिर भी, हे शुभे, दैववश मैं इसे कह रहा हूँ। भला किसे आत्म-विनाश प्रिय है? किसे विष-भक्षण प्रिय है?

Verse 24

पतनं वा गिरेर्मूर्ध्रः क्रीडा वापि बिलेशयैः । व्याघ्रसिंहाभिगमनं समुद्रतरणं तथा ॥ २४ ॥

चाहे पर्वत-शिखर से गिरना हो, या बिलों में रहने वाले जीवों के साथ खेलना; चाहे व्याघ्र-सिंहों के पास जाना हो, या समुद्र पार करना—(धर्म और पुण्य से रक्षित जन के लिए) ये भय के कारण नहीं हैं।

Verse 25

दरुक्तानृतवाक्यं वा परदाराभिमर्शनम् । अपथ्यभक्षणं लोके तथाभक्ष्यस्य भक्षणम् ॥ २५ ॥

कठोर और असत्य वचन बोलना, पर-स्त्री का संसर्ग चाहना; लोक में अपथ्य खाना तथा अभक्ष्य का भक्षण—ये पापाचार हैं।

Verse 26

मृगाटनमथाक्षैर्वा क्रीडनं साहसं तथा । छेदनं तृणकाष्ठानां लोष्टानामवमर्द्दनम् ॥ २६ ॥

शिकार के पीछे भटकना, पासों से जुआ खेलना, और वैसी ही उद्दंडता; घास-लकड़ी काटना तथा मिट्टी के ढेलों को रौंदना—ये प्रमाद के कर्म हैं, त्याज्य हैं।

Verse 27

हिंसनं सूक्ष्मदेवानां जलपावकखेलनम् । दैवाविष्टो वरारोहे नरः सर्वं करोति वै ॥ २७ ॥

हे वरारोहे, जब मनुष्य पर दैवी आवेश छा जाता है, तब वह सचमुच सब कुछ कर बैठता है—सूक्ष्म देवताओं की हिंसा भी, और जल-अग्नि से खिलवाड़ भी।

Verse 28

त्रिवर्गविच्युतं घोरं यशोदेहहरं क्षितौ । नरकार्हो नरो देवि करोत्यशुभकर्म तत् ॥ २८ ॥

हे देवी, मनुष्य जो अशुभ कर्म करता है, वही उसे नरक का अधिकारी बनाता है; वह कर्म भयानक है, त्रिवर्ग से च्युत करता है और पृथ्वी पर यश तथा देह-कल्याण का नाश करता है।

Verse 29

साहं पापा दुराचारा वक्तुकामा सुनिर्घृणम् । यादृशेन हि भावेन योनौ शुक्रं समुत्सृजेत् ॥ २९ ॥

मैं—पापिनी और दुराचारी—उस अत्यन्त निर्दय कर्म को कहना चाहती हूँ: किस भाव से मनुष्य गर्भाशय में वीर्य का उत्सर्जन करता है?

Verse 30

तादृशेन हि भावेन संतानं संभवेदिति । साहं विवादभावेन राज्ञो रुक्मांगदस्य हि ॥ ३० ॥

ऐसे ही भाव से संतान उत्पन्न होती है; इसलिए मैं विवाद-भाव लेकर राजा रुक्मांगद के पास गई/उससे उलझ पड़ी।

Verse 31

जाता जलजजातेन स्त्रीरूपा वरवर्णिनी । दुष्टभावा तथा जाता कर्त्री दुष्टं नृपस्य तु ॥ ३१ ॥

कमलज से उत्पन्न होकर वह उत्तम वर्ण वाली स्त्री-रूपा बनी; पर वह दुष्ट-भाव से भी जन्मी और राजा में दुष्टता की कर्त्री/प्रेरिका हो गई।

Verse 32

न लग्नं न ग्रहा देवि न होरा पुण्यदर्शिनी । तत्कालभावना ग्राह्या तद्भावो जायते सुतः ॥ ३२ ॥

हे देवी, पुण्यदर्शिनी, न लग्न निर्णायक है, न ग्रह, न होरा; उस क्षण की भावना ही ग्रहणीय है—पुत्र उसी भाव को लेकर जन्मता है।

Verse 33

तेन भावेन जातस्य दाक्षिण्यं नोपपद्यते । न च व्रीडा न च स्नेहो न धर्मो देवि विद्यते ॥ ३३ ॥

उस ही भाव से उत्पन्न व्यक्ति में यथोचित दाक्षिण्य (उदारता) नहीं टिकता। हे देवी, उसमें न लज्जा रहती है, न स्नेह, और न ही धर्म का कोई अंश मिलता है।

Verse 34

जानन्नपि यथायुक्तस्तं भावमनुवर्तते ॥ ३४ ॥

सत्य को जानकर भी, जो जैसा उचित समझता है, वह उसी भाव का अनुसरण करता रहता है।

Verse 35

वक्ष्ये वचः प्राणहरं तवाधुना भर्तुः सलोकस्य वधूजनस्य । धर्मापहं वाच्यकरं ममापि कर्तुं न शक्यं मनसापि भीरु ॥ ३५ ॥

हे भीरु, अब मैं तुम्हें ऐसे वचन कहूँगा जो प्राणहर हो सकते हैं—तुम्हारे पति और इसी लोक की स्त्रियों के विषय में। पर जो धर्म का अपहरण करे, और जिसे कहकर कर्म में उतारा जाए, ऐसा वचन मैं मन से भी नहीं कर सकता।

Verse 36

करोषि वाक्यं यदि मामकं हि भवेच्च कीर्तिर्महतीह लोके । भर्तुर्यशः स्यात्त्रिदिवे गतिस्ते पुत्रे प्रशंसा मम धिग्विवादः ॥ ३६ ॥

यदि तुम मेरे वचन का पालन करोगी, तो इस लोक में तुम्हारी महान कीर्ति होगी। तुम्हारे पति का यश त्रिदिव तक पहुँचेगा; वहाँ तुम्हारी गति उन्नत होगी; पुत्र की प्रशंसा होगी—अतः मेरे इस विवाद को धिक्कार है।

Verse 37

वसिष्ठ उवाच । मोहिनीवचनं श्रुत्वा देवी संध्यावली विभो । धैर्यमालंब्य तां तन्वीं ब्रूहि ब्रूहीत्यचोदयत् ॥ ३७ ॥

वसिष्ठ बोले—हे विभो, मोहिनी के वचन सुनकर देवी संध्यावली ने धैर्य धारण किया और उस सुकुमार स्त्री को बार-बार प्रेरित किया—“कहो, कहो!”

Verse 38

कीदृशं वदसे वाक्यं येन दुःखं भवेन्मम । भर्तुर्मे सत्यकरणे न दुःखं जायते क्वचित् । आत्मनो निधने वापि पुत्रस्य निधनेऽपि वा । भर्तुरर्थे प्रकुर्वंत्या राज्यनाशे न मे व्यथा ॥ ३८ ॥

तुम ऐसे वचन क्यों कहती हो जिनसे मुझे शोक हो? पति की सत्य-प्रतिज्ञा को पूरा करने में मुझे कभी दुःख नहीं होता। चाहे मेरा प्राण जाए या पुत्र का भी—पति के हित के लिए करते हुए राज्य का नाश भी मुझे व्यथा नहीं देता।

Verse 39

यस्या दुःखी भवेद्भर्ता भार्याया वरवार्णिनी । समृद्धायाः सपापायास्तस्याः प्रोक्ता ह्यधोगतिः ॥ ३९ ॥

हे सुन्दर वर्ण वाली नारी! जिस पत्नी के कारण पति दुःखी हो, वह चाहे समृद्ध भी हो पर पापिनी है; उसके लिए शास्त्रों में अधोगति ही कही गई है।

Verse 40

सा याति नरकं पापा पूयाख्यं युगसप्ततिम् । ततश्छुछुन्दरी स्याच्च सप्त जन्मानि भारते ॥ ४० ॥

वह पापिनी ‘पूय’ नामक नरक में सत्तर युग तक जाती है। फिर भारतवर्ष में सात जन्मों तक छछूँदरी (छछूँदर) के रूप में जन्म लेती है।

Verse 41

ततः काकी ततः श्याली गोधा गोत्वेन शुद्ध्यति । भर्तुरर्थे तु या वित्तें विद्यमानं न यच्छति ॥ ४१ ॥

फिर वह कौवी बनती है, फिर सियारनी; गोह बनकर आगे गौ-योनि प्राप्त करके शुद्ध होती है। पर जो स्त्री धन होते हुए भी पति के हित के लिए नहीं देती—उसकी ऐसी गति बताई गई है।

Verse 42

जीवितं वा वरारोहे विष्ठायां सा भवेत्क्रिमिः । क्रिमियोनिविनिर्मुक्ता काष्ठीला जायते शुभे ॥ ४२ ॥

हे वरारोहे! वह जीवन में या मृत्यु के बाद विष्ठा में कीड़ा बनती है। कीट-योनि से छूटकर, हे शुभे, ‘काष्ठीला’ नामक नीच जीव के रूप में जन्म लेती है।

Verse 43

मम कौमारभावे तु मत्पितुः काष्ठपाटकः । अग्निप्रज्वालनाथ हि काष्ठं पाटयते चिरम् ॥ ४३ ॥

मेरे बाल्यकाल में मेरे पिता का काष्ठ-चीरने वाला पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने हेतु लकड़ियाँ चीरता रहता था, और वह बहुत देर तक चीरता ही रहता।

Verse 44

सखीभिः सहिता चाहं क्रीडासंसक्तमानसा । काष्ठं पाटयतस्तस्य समीपमगमं तदा ॥ ४४ ॥

सखियों के साथ, खेल में मन लगा हुआ, मैं तब उसके पास गई, जब वह लकड़ी चीर रहा था।

Verse 45

तत्र दृष्टा मया सुभ्रु काष्ठीला दारुनिर्गता । नवनीतनिभं देहं बिभ्राणा चांजनत्विषम् ॥ ४५ ॥

वहाँ, हे सु-भ्रू! मैंने काष्ठीला को लकड़ी से निकलते देखा—जिसका शरीर ताज़े नवनीत-सा कोमल था और जिसकी कांति अंजन-सी श्याम थी।

Verse 46

कनिष्ठिकांगुलिसमा स्थौल्ये ह्यंगुलिमानिका । तां दृष्ट्वा पतितां भूमौ हंतुं ध्वांक्षः समागतः ॥ ४६ ॥

कनिष्ठिका के समान आकार-स्थूलता वाली वह अंगुलिमानिका भूमि पर गिर पड़ी। उसे पड़ा देख उसे मारने/झपटने हेतु एक कौआ आ पहुँचा।

Verse 47

यावद्गृह्णाति वक्त्रेण काष्ठीलां क्षुधितः स तु । तावन्निवारितः सद्यो मया लोष्टेन तत्क्षणात् ॥ ४७ ॥

वह भूखा कौआ जैसे ही काष्ठीला को चोंच से पकड़ने लगा, उसी क्षण मैंने मिट्टी का ढेला मारकर उसे तुरंत रोक दिया।

Verse 48

सा मुक्ता ताडितेनेत्थं वायसेन वरानने । सक्षता तुंडसंस्पृष्टा न च शक्ता पलायितुम् ॥ ४८ ॥

हे वरानने! कौए के इस प्रकार प्रहार करने पर वह छूट तो गई, पर चोंच के स्पर्श से घायल होकर भाग न सकी।

Verse 49

ततः सा वेपमाना तु प्राणत्यागमुपागमत् । सिक्ता किंचिज्जलैनैव ततः स्वास्थ्यमुपागता ॥ ४९ ॥

तब वह काँपती हुई प्राण त्यागने के निकट पहुँच गई; किंतु थोड़ा-सा जल छिड़कते ही वह फिर स्वस्थ हो गई।

Verse 50

तततः सा मानुषीवाचा मामाह वरवर्णिनी । संध्यावलीति संबोध्य सखीमध्यसमास्थिताम् ॥ ५० ॥

तब वह सुन्दर वर्ण वाली, मनुष्य-वाणी में, सखियों के मध्य खड़ी हुई मुझे ‘संध्यावली’ कहकर पुकारने लगी।

Verse 51

सुमंतुनाम्नो हि मुनेः सर्वज्ञस्य सुताऽभवम् । पूर्वजन्मनि पत्नी च कौंडिन्यस्य शुभानने ॥ ५१ ॥

हे शुभानने! मैं सर्वज्ञ मुनि सुमंतु की पुत्री थी; और पूर्वजन्म में कौंडिन्य की पत्नी भी रही हूँ।

Verse 52

न्यवसं कान्यकुब्जे तु सुसमृद्धा सुदर्पिता । जनन्या बंधुवर्गस्य पितुरिष्टतमा ह्यहम् ॥ ५२ ॥

मैं कान्यकुब्ज में रहती थी—अत्यन्त समृद्ध और अपने गर्व में उन्मत्त। माता-पक्ष के समस्त बंधुओं में प्रिय, और पिता की भी परम प्रिया थी।

Verse 53

पित्रा दत्ता ततश्चाहं कौंडिन्याय महात्मने । कुलीनाय सरूपाय स्त्रीसंगरहिताय च ॥ ५३ ॥

तब मेरे पिता ने मुझे महात्मा कौण्डिन्य को विवाह में दिया—जो कुलीन, सुन्दर रूप वाला और परस्त्री-संग से रहित था।

Verse 54

शयनीयादिकं दत्तं यौतुकं जनकेन मे । श्वशुरेणापि मे दत्तं सुवर्णस्यायुतं पुरा ॥ ५४ ॥

मेरे पिता ने शय्या आदि का यौतुक (दहेज) दिया; और पहले मेरे श्वशुर ने भी मुझे दस हज़ार स्वर्ण-मुद्राएँ दी थीं।

Verse 55

पितृश्वशूरवित्ताभ्यां परिपूर्णाभवं तदा । गोमहिष्यादिसंयुक्ता धनधान्यसमन्विता ॥ ५५ ॥

तब पिता और श्वशुर के धन से मैं पूर्णतः सम्पन्न हो गई; गाय-भैंस आदि तथा धन-धान्य से युक्त थी।

Verse 56

इष्टा श्वशुरयोश्वाहं सौशीन्येन जनस्य च । कालेन पंचतां प्राप्तः श्वशुरो वेदतत्त्ववित् ॥ ५६ ॥

अपने सुशील आचरण से मैं सास-ससुर और लोगों को प्रिय थी; समय आने पर वेद-तत्त्व के ज्ञाता मेरे श्वशुर पंचत्व को प्राप्त हुए।

Verse 57

तं मृतं पतिमादाय श्वश्रूरग्निं विवेश सा । ततो भर्तांजलिं दत्वा पित्रोः श्राद्धमथाकरोत् ॥ ५७ ॥

उसने मृत पति को लेकर सास द्वारा सजाई अग्नि में प्रवेश किया; फिर पति को अंजलि अर्पित कर पितरों के लिए श्राद्ध किया।

Verse 58

गते मासद्वये देवि भर्ता मे राजमंदिरम् । गतः कौतुकभावेनहृच्छयेन प्रपीडितः ॥ ५८ ॥

हे देवी, दो मास बीत जाने पर मेरा पति कौतूहलवश और हृदय की तीव्र लालसा से पीड़ित होकर राजमहल को चला गया।

Verse 59

तत्र वेश्याः सुरूपाढ्या यौवनेन समन्विताः । प्रविशत्यां नृपगृहे दृष्टास्तेन द्विजन्मना ॥ ५९ ॥

वहाँ उस द्विज ने रूप-सम्पन्न और यौवन-युक्त वेश्याओं को राजा के भवन में प्रवेश करते हुए देखा।

Verse 60

तासां मध्यात्तु द्वे गृह्यवित्तदानेन भूरिणा । स्वगृहे धारयामास क्रीडार्थं दुर्मतिः पतिः ॥ ६० ॥

उनमें से दो को बहुत-सा धन देकर फुसलाकर, वह दुर्बुद्धि पति केवल क्रीड़ा-रति के लिए उन्हें अपने घर में रखने लगा।

Verse 61

ताभ्यां वित्तमशेषं तु क्षयं नीतं निषेवणात् । वर्षत्रये गते देवि निस्वो जातः पतिर्मम ॥ ६१ ॥

उन दोनों के संग से समस्त धन नष्ट हो गया। हे देवी, तीन वर्ष बीतते-बीतते मेरा पति निर्धन हो गया।

Verse 62

ततो मां प्रार्थयामास देहि मेऽङ्गविभूषणम् । तन्मया नहि दत्तं तु भर्त्रे व्यसनिने तदा ॥ ६२ ॥

तब उसने मुझसे विनती की—“मुझे अपने आभूषण दे दो।” पर उस समय व्यसन में पड़े पति को मैंने वे नहीं दिए।

Verse 63

सुभगे सर्वमादाय गताहं मंदिरं पितुः । ततः पितृगृहे वित्तं भृत्यादिकमशेषतः ॥ ६३ ॥

हे सुभगे, मैं सब कुछ साथ लेकर पिता के घर गई। फिर पिता के गृह में जो धन था, दास-सेवक आदि सहित, सब कुछ बिना कुछ छोड़े ले आई।

Verse 64

विक्रीय दत्तं वैश्याभ्यां तच्चापि क्षयमागतम् । क्षेत्रधान्यादिकं यच्च सभांडं सपरिच्छदम् ॥ ६४ ॥

दो वैश्य-व्यापारियों को जो वस्तु बेचकर दी गई थी, वह भी आगे चलकर नष्ट-क्षीण हो गई। खेत, धान्य आदि जो कुछ भी था, वह भी बर्तनों और समस्त उपस्करों सहित (इसी नियम के अंतर्गत है)।

Verse 65

स्वल्पमूल्येन विक्रीयगतो नदनदीपतिम् । नावमारुह्य मे भर्ता विवेशांतर्महोदधेः ॥ ६५ ॥

अल्प मूल्य में बिककर मेरा पति नद-नदियों के स्वामी समुद्र की ओर गया। नाव पर चढ़कर वह उस महोदधि के भीतर दूर तक प्रवेश कर गया।

Verse 66

स गतो दूरमध्वानं पश्यमानोऽद्भुतानि च । शुभे समुद्रजातानि जीवचेष्ठांकितानि च ॥ ६६ ॥

वह दूर तक यात्रा करता गया और अद्भुत दृश्य देखता रहा। समुद्र से उत्पन्न शुभ वस्तुएँ, मानो जीवों की चेष्टाओं से अंकित हों—ऐसी भी उसने देखीं।

Verse 67

प्रभंजनवशं प्राप्ता सा नौका शतयोजनम् । गता विशीर्णतां तत्र मृतास्ते नावमाश्रिताः ॥ ६७ ॥

प्रचण्ड आँधी के वश में आकर वह नाव—जो सौ योजन जा चुकी थी—वहीं टूट-फूट गई। और नाव का आश्रय लेने वाले वे सब लोग वहाँ मारे गए।

Verse 68

मत्पतिर्दैवयोगेन दीर्घ काष्ठं समाश्रितः । वायुना नीयमानोऽसौ प्राचीनेन स्वकर्मणा ॥ ६८ ॥

दैवयोग से मेरे पति ने एक लंबे काष्ठ का सहारा लिया। वायु के वेग से बहते हुए, अपने पूर्वकर्मों के प्रेरण से वह आगे बढ़ रहा था।

Verse 69

आससादाचलं देवि रत्नश्रृंगविभूषितम् । बहुनिर्झरणोपेतं बहुपक्षिसमन्वितम् ॥ ६९ ॥

हे देवी, वह रत्न-शिखरों से विभूषित पर्वत पर पहुँचा, जहाँ अनेक झरने बहते थे और असंख्य पक्षी निवास करते थे।

Verse 70

बहुवृक्षैः समाकीर्णं नानापुष्पफलोपगैः । उल्लिखंतं हि शिखरैः खमध्यं स्वात्मनस्त्रिभिः ॥ ७० ॥

वह पर्वत अनेक वृक्षों से घिरा था, जिन पर नाना प्रकार के फूल-फल लगे थे; और अपने तीन शिखरों से मानो स्वभावतः ही आकाश-मध्य को कुरेदता-सा प्रतीत होता था।

Verse 71

तं दृष्ट्वा पर्वतं दिव्यं त्यक्त्वा नौकाष्ठमद्भुतम् । आरुरोह मुदायुक्तो वित्ताकांक्षी सुलोचने ॥ ७१ ॥

हे सुलोचने, उस दिव्य अद्भुत पर्वत को देखकर उसने उस विचित्र काष्ठ-नौका को छोड़ दिया और हर्ष से भरा हुआ, पर धन-लालसा से प्रेरित, वह ऊपर चढ़ गया।

Verse 72

विशश्राम मुहूर्तं तु क्षुत्पिपासासमन्वितः । तत उत्थाय भक्ष्यार्थं वृक्षांस्तत्र व्यलोकयत् ॥ ७२ ॥

भूख-प्यास से पीड़ित होकर वह कुछ क्षण विश्राम कर बैठा। फिर उठकर भोजन की खोज में उसने वहाँ के वृक्षों को चारों ओर देखा।

Verse 73

सुपक्वास्तत्र मृद्वीका दृष्ट्वा भुक्त्वा मुदान्वितः । शांतिं प्राप्तस्ततोऽपश्यत्सालमेकं सुनिर्मलम् ॥ ७३ ॥

वहाँ उसने भली-भाँति पकी हुई मृद्वीकाएँ (अंगूर) देखीं; उन्हें देखकर खाया और आनंद से भर गया। शांति पाकर फिर उसने एक अत्यन्त निर्मल साल-वृक्ष देखा।

Verse 74

घनच्छायं मेघनिभं पंचाशत्पुरुषोच्छ्रयम् । तस्याधस्तात्स सुष्वाप स्वोत्तरीयं प्रसार्य च ॥ ७४ ॥

वह वृक्ष घनी छाया वाला, मेघ के समान और पचास पुरुषों के बराबर ऊँचा था। उसके नीचे उसने अपना उत्तरीय बिछाकर शयन किया।

Verse 75

मोहिन्या निद्रया चैव संप्रघूर्णितलोचनः । तावत्सुप्तोऽतिखिन्नोऽसौ यावत्सूर्योऽस्ततां गतः ॥ ७५ ॥

मोहिनी निद्रा के वशीभूत होकर उसकी आँखें घूमने लगीं। वह अत्यन्त थका हुआ तब तक सोता रहा, जब तक सूर्य अस्त होने को न चला गया।

Verse 76

सूर्येऽस्तं समनुप्राप्ते समायाते निशामुखे । अभ्यगाद्राक्षसो घोरो गर्जमानो यथा घनः ॥ ७६ ॥

जब सूर्य अस्त हो गया और रात्रि का आरम्भ आ पहुँचा, तब मेघ के समान गर्जना करता हुआ एक भयानक राक्षस आगे आया।

Verse 77

अंकेनादाय तन्वंगीं सीतामिव दशाननः । शुभां काशीपतेः पुत्रीं नाम्ना रत्नावलीं शुभाम् ॥ ७७ ॥

उसने उस सुकुमार अंगों वाली कन्या को गोद में उठा लिया—जैसे दशानन ने सीता को। वह काशीपति की शुभ पुत्री, रत्नावली नाम की पुण्यवती थी।

Verse 78

अधौतपादां सुश्रोणीं सौम्यदिक्छीर्षशायिनीम् । पतिकामा कुमारी सा नाविंदत्सदृशं पतिम् ॥ ७८ ॥

वह सुश्रोणी कन्या पाँव न धोकर और अशुभ दिशा की ओर सिर करके सोती थी; पति की कामना होते हुए भी उसे योग्य वर न मिला।

Verse 79

सर्वयोषिद्वरा बाला रुदती निद्रयाकुला । पिता तस्याः प्रदाने तु चिंताविष्टो ह्यहर्न्निशम् ॥ ७९ ॥

सब स्त्रियों में श्रेष्ठ वह बाला रोती हुई, निद्रा से व्याकुल थी; पर उसका पिता विवाह में देने की चिंता से दिन-रात व्यग्र रहा।

Verse 80

दीपच्छायाश्रिते तन्वि शयने सा व्यवस्थिता । अटमानेन पापेन दृष्टा सा रूपशालिनी ॥ ८० ॥

हे तन्वी! वह दीपक की छाया से आच्छादित शय्या पर लेटी थी; तभी भटकता हुआ वह पापी उस रूपवती को देख बैठा।

Verse 81

दीपरत्नैः सुखचिते धारयंती च कंकणे । उभयोर्दश रत्नानि निष्के च दशपंच च ॥ ८१ ॥

वह दीप्त रत्नों से सुखद रूप से जड़े कंगन धारण करती थी; दोनों कंगनों में दस-दस रत्न थे और निष्क हार में पंद्रह।

Verse 82

सीमंते सप्त रत्नानि केयूरेऽष्टौ च पंच च । एवं रत्नाचितां बालां शातकुम्भसमप्रभाम् ॥ ८२ ॥

उसके सीमंत (माँग) में सात रत्न थे, और केयूर (बाजूबंद) में आठ तथा पाँच; इस प्रकार रत्नों से सजी वह बाला शुद्ध स्वर्ण-सी प्रभा से चमकती थी।

Verse 83

जहार राजभवनात्तां तदा चारुहासिनीम् । वायुमार्गं समाश्रित्य क्षणात्प्राप्तः स्वमालयम् ॥ ८३ ॥

तब वह राजभवन से उस मनोहर, मधुर-हासिनी सुन्दरी को हर ले गया। वायु-मार्ग का आश्रय लेकर वह क्षणभर में अपने निवास पर पहुँच गया॥

Verse 84

तं पर्वतं स यत्रास्ते पतिर्मेशालमाश्रितः । तत्र तस्य गुहां दृष्ट्वा सुवर्णसदृशप्रभाम् ॥ ८४ ॥

वह उस पर्वत पर गया जहाँ प्रभु मेषाल का आश्रय लेकर निवास करते हैं। वहाँ उसने प्रभु की गुहा देखी, जो स्वर्ण के समान तेज से दीप्त थी॥

Verse 85

तद्भयस्यासहा तत्र प्रविवेशास्य पश्यतः । अनेकैर्मणिविन्यासैः संयुक्तां चित्रमंदिराम् ॥ ८५ ॥

वह उस भय को सह न सकी; और उसके देखते-देखते वहाँ प्रवेश कर गई। वह अनेक मणि-विन्यासों से युक्त उस विचित्र मन्दिर-सम भवन में जा पहुँची॥

Verse 86

नानाद्रव्यसमाकीर्णां शयनासनसंयुताम् । भोजनैः पानपात्रैश्च भक्ष्यभोज्यैरनेकधा ॥ ८६ ॥

वह अनेक प्रकार की वस्तुओं से भरी हुई थी, शय्या और आसनों से युक्त थी; और भोजन, पान-पात्र तथा नाना प्रकार के भक्ष्य-भोज्य से परिपूर्ण थी॥

Verse 87

प्रविश्य तत्र शय्यायां मुमोचोत्पललोचनाम् । रुदतीमतिसंत्रस्तां पीनश्रोणिपयोधराम् ॥ ८७ ॥

वहाँ प्रवेश करके उसने कमल-नेत्री को शय्या पर रख दिया। वह रोती हुई, अत्यन्त भयभीत, और पुष्ट नितम्ब-स्तनों से युक्त थी॥

Verse 88

तस्यास्तु रुदितं श्रुत्वा तस्य भार्या हि राक्षसी । आजगाम त्वरायुक्ता यत्रासौ राक्षसः स्थितः ॥ ८८ ॥

उसके रुदन को सुनकर उस राक्षस की राक्षसी पत्नी शीघ्रता से वहाँ पहुँची जहाँ वह राक्षस ठहरा था।

Verse 89

तां दृष्ट्वा चारुसर्वांगीं तप्तकांचनसप्रभाम् । पप्रच्छ निजभर्तारं क्रुद्धा निर्भर्त्सती सती ॥ ८९ ॥

उस सुन्दरी को, जो अंग-अंग से रमणीय और तप्त सुवर्ण-सी दीप्तिमान थी, देखकर सती क्रोधपूर्वक तिरस्कार करती हुई अपने पति से पूछने लगी।

Verse 90

किमर्थमाहृता चेयं जीवंत्यां मयि निर्घृणं । अन्यां समीहसे भार्यां नाहं भार्यां भवामि ते ॥ ९० ॥

हे निर्दय! मैं जीवित हूँ, फिर यह स्त्री क्यों लाई गई? तू दूसरी पत्नी चाहता है; अब मैं तेरी पत्नी नहीं रहूँगी।

Verse 91

एवं ब्रुवाणां तां भर्ता राक्षसीमसितेक्षणाम् । उवाच राक्षसो हर्षात्स्वां प्रियां चारुलोचनाम् ॥ ९१ ॥

वह ऐसा कह रही थी कि उसका पति—वह राक्षस—हर्षित होकर काली आँखों वाली, सुनेत्रा अपनी प्रिय राक्षसी पत्नी से बोला।

Verse 92

त्वदर्थमाहृतं भक्ष्यं मया कोश्याः शुभानने । दैवोपपादितं द्वारि द्वितीयं मम तिष्ठति ॥ ९२ ॥

हे शुभानने! तेरे लिए मैंने कोठार से यह भोजन लाया है; और दैवयोग से प्राप्त दूसरा भाग मेरे द्वार पर खड़ा है।

Verse 93

शालवृक्षाश्रितः शेते विप्रश्चैको वरानने । तमानय त्वरायुक्ता येनाहं भक्ष्यमाचरे ॥ ९३ ॥

हे सुन्दर-मुखी! शाल-वृक्ष के नीचे एक अकेला ब्राह्मण विश्राम कर रहा है। तू शीघ्र जाकर उसे यहाँ ले आ, ताकि मैं उसे भोजन बना सकूँ।

Verse 94

राक्षसस्य वचः श्रुत्वा कुमारी साब्रवीदिदम् । मिथ्या राक्षसि भर्ता ते भाषते त्वद्भयादयम् ॥ ९४ ॥

राक्षस के वचन सुनकर कन्या बोली— “हे राक्षसी! यह झूठ है; तेरा पति केवल तेरे भय से ऐसा कह रहा है।”

Verse 95

ज्ञात्वा त्वां जरयोपेतां विरूपामतिजिह्यगाम् । सुप्तां पितृगृहे रात्रौ मां समासाद्य कामतः ॥ ९५ ॥

तुझे वृद्धावस्था से ग्रस्त, विकृत और अत्यधिक बाहर निकली जीभ वाली जानकर, जब तू रात में अपने पिता के घर सो रही थी, तब वह कामवश मेरे पास आया।

Verse 96

अनूढां रुदतीं भद्रे भार्यार्थं समुपानयत् । इतीरितमुपाकर्ण्य वचनं राजकन्यया ॥ ९६ ॥

“हे भद्रे! जो अविवाहिता कन्या रो रही है, उसे यहाँ ले आ, ताकि उसे पत्नी बनाया जाए”— राजकन्या के ये वचन सुनकर उसने ध्यानपूर्वक सुना।

Verse 97

क्रोधयुक्तातिमात्रं वै बभूव क्षिपती वचः । तस्याश्च रूपमालोक्य सत्यमेवावधारयत् ॥ ९७ ॥

वह अत्यधिक क्रोध से भरकर कठोर वचन बोलने लगी। पर उसका रूप देखकर उसने निश्चय कर लिया कि यह बात सच ही है।

Verse 98

चिंतयामास चाप्येवं भार्यार्थे ह्याहृतेति च । अवश्यं मूर्घ्निं कीलं मे रोषयिष्यति राक्षसः ॥ ९८ ॥

वह मन ही मन ऐसा सोचने लगा— “यह तो मेरी पत्नी के कारण ही हर ली गई है; निश्चय ही वह राक्षस क्रोध में मेरे सिर में कील ठोंक देगा।”

Verse 99

मास्म सीमंतिनी काचिद्भेवत्सा भुवनत्रये । या सापत्न्येन दुःखेन पीड्यमाना हि जीवति ॥ ९९ ॥

तीनों लोकों में कोई भी ऐसी सवत्सा (जीवित संतान वाली) स्त्री न हो, जो सौतन के दुःख से पीड़ित होकर जीवन बिताए।

Verse 100

सर्वेषामेव दुःखानां महच्चेदं न संशयः । सामान्यद्रव्यभोगादि निष्ठा चैवापरा भवेत् ॥ १०० ॥

सब दुःखों का यह बड़ा कारण है— इसमें संदेह नहीं: साधारण भोग्य पदार्थों आदि के उपभोग में आसक्ति; और वही आसक्ति आगे एक और बंधन बन जाती है।

Verse 101

एवं सा बहु संचिंत्य भर्तारं वाक्यमब्रवीत् । मदीया मम भक्ष्यार्थँ त्वयानीता सुलोचना ॥ १०१ ॥

बहुत सोच-विचार कर उसने अपने पति से कहा— “यह सुनेत्रा स्त्री मेरी है; तुम इसे मेरे भोजन के लिए लाए हो।”

Verse 102

तं विप्रमानयिष्यामि भक्ष्यार्थं तव सुव्रत । ततः स राक्षसः प्राह गच्छगच्छेति सत्वरम् ॥ १०२ ॥

“हे सुव्रत! मैं उस ब्राह्मण को तुम्हारे भोजन के लिए ले आऊँगी।” तब राक्षस बोला— “जाओ, जाओ— शीघ्र!”

Verse 103

सृक्किणी स्रवतेऽत्यर्थं तस्य भक्षणकाम्यया । ततः सा राक्षसी घोरा श्रुत्वा पतिसमीरितम् ॥ १०३ ॥

उसे भक्षण करने की तीव्र लालसा से उसके होंठ अत्यन्त टपकने लगे। तब वह भयानक राक्षसी अपने पति के कहे वचन को सुनकर वैसा ही करने को उद्यत हुई।

Verse 104

निर्जगाम दुरंताशा ददर्श द्विजसत्तमम् । रूपयौवनसंयुक्तं विद्यारत्नविभूषितम् ॥ १०४ ॥

तब वह दुरन्त आशाओं वाली स्त्री बाहर निकली और श्रेष्ठ द्विज को देखा—जो रूप और यौवन से युक्त तथा विद्या-रत्न से विभूषित था।

Verse 105

तं दृष्ट्वा मायया भूत्वा सुंदरी षोडशाब्दिका । हृच्छयेन समाविष्टा तदंतिकमुपागमत् ॥ १०५ ॥

उसे देखकर वह माया से सोलह वर्ष की सुन्दरी बन गई। हृदय में काम-विक्षोभ से व्याकुल होकर वह उसके निकट जा पहुँची।

Verse 106

अब्रवीत्सा पृथुश्रोणी तं विप्रं प्रीतिसंयुता । कस्त्वं कस्मादिहायतः किमर्थमिह तिष्ठसि ॥ १०६ ॥

तब वह पृथुश्रोणी स्त्री, प्रेम से युक्त होकर, उस विप्र से बोली—“तुम कौन हो? कहाँ से यहाँ आए हो? किस प्रयोजन से यहाँ ठहरे हो?”

Verse 107

पृच्छामि पतिकामाहं राक्षसी हृच्छयातुरा । स्वभर्त्राहं परित्यक्ता त्वां पतिं कर्तुमागता ॥ १०७ ॥

मैं पति की कामना करने वाली राक्षसी, हृदय के काम-विक्षोभ से पीड़ित, तुमसे पूछती हूँ। अपने पति द्वारा त्यागी गई मैं तुम्हें अपना पति बनाने आई हूँ।

Verse 108

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भर्ता मे भयसंयुतः । उवाच वचनं प्राज्ञो धैर्यमालंब्य तां शुभे ॥ १०८ ॥

उसके वचन सुनकर मेरे पति भय से युक्त होकर भी, धैर्य का आश्रय लेकर, बुद्धिमान पुरुष ने उत्तर दिया— “हे शुभे!”

Verse 109

रक्षोमानुषसंयोगः कथं राक्षसि संभवेत् । मानुषास्तु स्मृता भक्ष्या राक्षसानां न संशयः ॥ १०९ ॥

हे राक्षसी! राक्षस और मनुष्य-स्त्री का संयोग कैसे हो सकता है? मनुष्य तो राक्षसों के लिए भक्ष्य माने गए हैं— इसमें संशय नहीं।

Verse 110

तच्छ्रुत्वा वचनं सा तु पुनस्तं प्राह सादरम् । असंभाव्यं च जगति संभवेद्दैवयोगतः ॥ ११० ॥

वे वचन सुनकर उसने फिर आदरपूर्वक कहा— “जो जगत में असंभव प्रतीत होता है, वह भी दैवयोग से संभव हो जाता है।”

Verse 111

पुराणे श्रूयते ह्येतद्भविष्यं भारते स्थितम् । हिडंबा राक्षसी विप्र भीमभार्या भविष्यति ॥ १११ ॥

पुराणों में यह भविष्य-वृत्तांत भारतवर्ष में स्थित सुनाया गया है— हे विप्र! राक्षसी हिडिम्बा भीम की पत्नी होगी।

Verse 112

मानुषोत्पादितः पुत्रो भविष्यति घटोत्कचः । अवध्यः सर्वशस्त्राणां शक्त्या मृत्युमवाप्स्यति ॥ ११२ ॥

मानुषी से उत्पन्न पुत्र ‘घटोत्कच’ नाम से प्रसिद्ध होगा। वह सब शस्त्रों से अवध्य होगा और केवल ‘शक्ति’ से ही मृत्यु को प्राप्त होगा।

Verse 113

तस्माद्विषादं मा विप्रकुरु त्वं दैवयोगतः । भार्या तवाहं संजाता दव हि बलवत्तरम् ॥ ११३ ॥

इसलिए, हे ब्राह्मण, शोक मत करो; यह सब दैवयोग से हुआ है। उसी भाग्य से मैं तुम्हारी पत्नी बनी हूँ, क्योंकि भाग्य ही अधिक बलवान है।

Verse 114

मर्त्यलोकं गते शक्त्रे वैरोचनिनिरीक्षणे । तदंतरं समासाद्य भर्ता मे घोरराक्षसः ॥ ११४ ॥

जब शक्र (इन्द्र) वैरोचनी को देखने के लिए मर्त्यलोक में गए, उसके थोड़े ही बाद मेरा पति—एक भयानक राक्षस—मुझ पर आ पहुँचा।

Verse 115

तद्गृहाच्छक्तिमहरद्दीप्तामग्रिशिखामिव । सेयं समाश्रिता चात्र शालवृक्षे तु वासवी ॥ ११५ ॥

उसने उस घर से अग्नि की ज्वाला-सी दीप्त शक्ति को उठा लिया। वही शक्ति यहाँ इस स्थान में शाल-वृक्ष पर आश्रय लिए हुए है, हे वासवी।

Verse 116

अहत्वैकं द्विजश्रेष्ठ नगच्छति पुरंदरम् । यद्वधाय प्रक्षिपेत्तां सोऽमरोऽपि विनश्यति ॥ ११६ ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, एक को भी मारे बिना पुरंदर (इन्द्र) तक पहुँचा नहीं जा सकता। पर जो उसे वध के लिए फेंक देता है, वह—even देव होकर भी—नष्ट हो जाता है।

Verse 117

साहमारुह्य शालाग्रं शक्तिमानीय भास्वराम् । त्वत्करे संप्रदास्यामि भर्तुर्निधनकाम्यया ॥ ११७ ॥

मैं स्वयं शाला के शिखर पर चढ़कर उस चमकती शक्ति को ले आऊँगी और अपने पति के वध की इच्छा से उसे तुम्हारे हाथ में दे दूँगी।

Verse 118

यदि त्वमनया शक्त्या न हिंससि निशाचरम् । खादयिष्यति दुर्मेधास्त्वां च मां च न सशयः ॥ ११८ ॥

यदि तुम इस शक्ति से उस निशाचर को न मारोगे, तो वह दुष्ट-मूढ़ निश्चय ही तुम्हें और मुझे दोनों को निगल जाएगा।

Verse 119

तव शत्रुर्महानेष ममापि च परंतप । येनाहृता कुमारीह भार्यार्थं मंदबुद्धिना ॥ ११९ ॥

हे शत्रु-दमन करने वाले, यह पुरुष तुम्हारा भी और मेरा भी महान शत्रु है; इसी मंदबुद्धि ने यहाँ की कन्या को पत्नी बनाने हेतु हर लिया।

Verse 120

सपत्नभावो जनितो मम भर्त्रा दुरात्मना । व्यापादितेऽस्मिन्नुभयोः क्रीडनं संभविष्यति ॥ १२० ॥

मेरे दुरात्मा पति ने सौत-भाव की स्पर्धा उत्पन्न की है। यदि यह पुरुष मारा जाए, तो उन दोनों के लिए निर्भय क्रीड़ा और सुख से रहना संभव होगा।

Verse 121

यद्यन्यथा वदेर्वाक्यं त्वामहं रतिवर्द्धन । तदात्मकगृतपुण्यस्य न भवेयं हि भागिनी ॥ १२१ ॥

हे रतिवर्द्धन, यदि मैं तुम्हें अपने सत्य भाव के विपरीत कुछ और कहूँ, तो उस भावपूर्वक किए गए घृत-दान के पुण्य में मैं भागिनी न रहूँ।

Verse 122

या गतिर्ब्रह्महत्यायां कुत्सिता प्राप्यते नरैः । तां गतिं हि प्रपद्येऽहं यद्येतदनृतं भवेत् ॥ १२२ ॥

यदि मेरा यह कथन असत्य हो, तो ब्रह्महत्या के पाप से मनुष्यों को जो निंदित गति मिलती है, वही गति मैं प्राप्त करूँ।

Verse 123

मद्यं हि पिबतो ब्रह्मन् ब्राह्मणस्य दुरात्मनः । या गतिर्विहिता घोरा तां गतिं प्राप्नुयाम्यहम् ॥ १२३ ॥

हे ब्राह्मण! जो दुरात्मा ब्राह्मण मदिरा पीता है, उसके लिए जो भयानक गति विधि से ठहराई गई है, वही गति मुझे प्राप्त हो।

Verse 124

गुरुदारप्रसक्तस्य जतोः पापनिषेविणः । या गतिस्तां द्विजश्रेष्ठ मिथ्या प्रोच्य समाप्नुयाम् ॥ १२४ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ! जो गुरु-पत्नी में आसक्त और पाप का सेवन करने वाला है, उसकी जो गति है—यदि मैंने झूठ कहा हो तो वही गति मुझे मिले।

Verse 125

स्वर्णन्यासापहरणे मेदिनीहरणे च या । आत्मनो हनने या हि विहिता मुनिभिर्द्विज ॥ १२५ ॥

हे द्विज! अमानत रखे स्वर्ण की चोरी, भूमि-हरण, और आत्म-हत्या—इनके लिए मुनियों ने जो प्रायश्चित्त ठहराया है, वही यहाँ लागू है।

Verse 126

गतिस्तामनुगच्छामि यद्येतदनृतं वदे । पंचम्यां च तथाष्टम्यां यत्पापं मांसभक्षणे ॥ १२६ ॥

यदि मैं यह असत्य कह रहा हूँ, तो वही गति मुझे प्राप्त हो; जैसे पंचमी और अष्टमी को मांस-भक्षण से जो पाप लगता है।

Verse 127

स्त्रीसंगमे तरुच्छेदे यत्पापं शशिनः क्षये । यदुच्छिष्टे घृतं भोक्तुर्मैथुनेन दिवा च यत् ॥ १२७ ॥

असमय स्त्री-संग, वृक्ष-छेदन, चन्द्र-क्षय के समय आचरण, जूठा घृत खाना, और दिन में मैथुन—इनसे जो पाप होता है (वही यहाँ अभिप्रेत है)।

Verse 128

वैश्वदेवमकर्तुश्च गृहिणो हि द्विजस्य यत् । भिक्षामदातुर्भिक्षुभ्यो विधवाया द्विभोजनात् ॥ १२८ ॥

द्विज गृहस्थ का वैश्वदेव यज्ञ न करना, भिक्षुओं को भिक्षा न देना, और विधवा का दिन में दो बार भोजन करना—ये निंद्य कर्म कहे गए हैं।

Verse 129

तैलं भोक्तुश्च संक्रांतौ गोभिस्तीर्थं च गच्छतः । तथा मृदमनुद्धृत्य स्नातुः परजलाशये ॥ १२९ ॥

संक्रांति के दिन तेल खाना, गायों के साथ तीर्थ जाना, और दूसरे के तालाब में बिना (मिट्टी/अनुमति) लिए स्नान करना—इनमें दोष माना गया है।

Verse 130

निषिद्धवृक्षजनितं दंतकाष्ठं च खादतः । गामसेवयतो बद्ध्वा पाखंडपथगामिनः ॥ १३० ॥

निषिद्ध वृक्ष से बना दातुन उपयोग करने वाला, और गाय के साथ अधर्मपूर्ण कुकर्म करने वाला—ये पाखंडी मार्ग के अनुयायी मानकर बाँधने योग्य कहे गए हैं।

Verse 131

पितृदेवार्चनं कर्तुः काष्ठग्रावस्थितस्य यत् । गोहीनां महिषीं धर्तुर्भिन्नकांस्ये च भुंजतः ॥ १३१ ॥

लकड़ी या पत्थर पर खड़े होकर पितृ-देव पूजन करना, जहाँ गायें न हों वहाँ भैंस रखना, और फटे कांस्य पात्र में भोजन करना—ये कर्म दोषयुक्त और निष्फल कहे गए हैं।

Verse 132

अधौतभिन्नपारक्यवस्त्रसंवीतकर्मिणः । नग्रस्त्रीप्रेक्षणं कर्तुरभक्ष्यस्य च भोजिनः ॥ १३२ ॥

जो बिना धुले, फटे या पराए वस्त्र पहनकर कर्मकांड करे; जो नग्न स्त्री को देखे; जो अनुचित कर्म करे; और जो अभक्ष्य खाए—ये सब अशौच और दोष के भागी कहे गए हैं।

Verse 133

कथायां श्रीहरेर्विघ्नं कर्तुर्यत्पातकं द्विज । तेन पापेन लिप्येऽहं यदि वच्मि तवानृतम् ॥ १३३ ॥

हे द्विज! श्रीहरि की पावन कथा में जो विघ्न करता है, उसे जो पाप लगता है—यदि मैं तुमसे असत्य कहूँ तो उसी पाप से मैं भी लिप्त हो जाऊँ।

Verse 134

उक्तान्येतानि पापानि यान्यनुक्तान्यपि द्विज । सर्वेषां भागिनी चाहं यद्येतदनृतं वदे ॥ १३४ ॥

हे द्विज! ये पाप बताए गए हैं और जो न बताए गए हों वे भी—यदि मेरा कहा झूठ हो, तो मैं उन सबकी भी भागीदार बनूँ।

Verse 135

एवं संबोधितो देवि भर्ता मे पापया तया । तथेति निश्चयं चक्रे भवितव्येन मोहितः ॥ १३५ ॥

हे देवी! उस पापिनी स्त्री के ऐसे संबोधन से मेरा पति—होनी के बल से मोहित होकर—“तथास्तु” कहकर निश्चय कर बैठा।

Verse 136

निर्द्रव्यो व्ययसनासक्तो मद्वाक्यकलुषीकृतः । उवाच राक्षसीं वाक्यं सर्वंसिद्धिप्रदायकम् ॥ १३६ ॥

धनहीन, व्यसन में आसक्त, और मेरे वचनों से कलुषित होकर उसने उस राक्षसी से ऐसा वचन कहा जो सब सिद्धि देने वाला माना जाता था।

Verse 137

शीघ्रमानय तां शक्तिं करोमि वचनं तव । सर्वमेतत्प्रदेयं हि त्वया मे राक्षसे हते ॥ १३७ ॥

“शीघ्र वह शक्ति ले आओ; मैं तुम्हारा वचन पूरा करूँगा। क्योंकि मेरे राक्षस के मारे जाने पर, तुम्हें यह सब मुझे देना ही होगा।”

Verse 138

द्रव्याशया प्रविष्टोऽहं सागरं तिमिसंकुलम् । तच्छ्रुत्वा राक्षसी शक्तिं समानीय नगस्थिताम् ॥ १३८ ॥

धन-लोभ से प्रेरित होकर मैं अंधकार से भरे समुद्र में उतर गया। यह सुनकर उसने पर्वत पर रहने वाली राक्षसी-सी शक्ति को बुला लिया।

Verse 139

ददौ मद्भर्तृसिद्ध्यर्थं विमुंचंतीं महार्चिषम् । एतस्मिन्नेव काले तु राक्षसः काममोहितः ॥ १३९ ॥

अपने पति की सिद्धि के लिए उसने उस महातेजस्वी शक्ति को मुक्त करते हुए अर्पित किया। उसी समय काम से मोहित एक राक्षस आ पहुँचा।

Verse 140

गमनायोद्यतः कन्यां सा भीता वाक्यमब्रवीत् । कुमारीसेवने रक्षो महापापं विधीयते ॥ १४० ॥

जब वह कन्या की ओर जाने को उद्यत हुआ, तब वह भयभीत होकर बोली—“हे राक्षस! कुमारी का अपमान करने से महापाप लगता है।”

Verse 141

छलेनाहं हृता काश्याः सुप्ता पितृगृहात्वया । तव दोषो न चेहास्ति भवितव्यं ममेदृशम् ॥ १४१ ॥

तुमने छल से मुझे काशी में मेरे पिता के घर से, सोते हुए, उठा लिया। पर यहाँ तुम्हारा दोष नहीं; मेरा भाग्य ही ऐसा था।

Verse 142

गुहामध्यगतायास्तुको मे त्राता भविष्यति । विधियोगाद्भवेद्भर्ता विधियोगाद्भवेत्प्रिया ॥ १४२ ॥

मैं गुफा के बीच फँसी हूँ—मेरा रक्षक कौन होगा? विधि के योग से पति मिलता है और उसी विधि के योग से प्रिय भी मिलता है।

Verse 143

भवेद्विधिवशाद्विद्या गृहं सौख्यं धनं कुलम् । विधिना प्रेर्यमाणस्तु जनः सर्वत्र गच्छति ॥ १४३ ॥

भाग्य के वश से ही विद्या, घर, सुख, धन और कुल प्राप्त होते हैं। भाग्य से प्रेरित होकर ही मनुष्य सर्वत्र जाता है।

Verse 144

अवश्यं भविता भर्ता त्वमेव रजनीचर । विधइना विहिते मार्गे किं करिष्यति पंडितः ॥ १४४ ॥

हे निशाचर! निश्चय ही तुम मेरे पति बनोगे। जब विधाता ने मार्ग निश्चित कर दिया हो, तो ज्ञानी पुरुष भी क्या कर सकता है?

Verse 145

तस्मादानयत विप्रं शालवृक्षाश्रित त्विह । घृतं जलं कुशानग्निं विवाहं विधिना कुरु ॥ १४५ ॥

इसलिए शाल वृक्ष के नीचे स्थित उस ब्राह्मण को यहाँ ले आओ। घी, जल, कुश और अग्नि लाओ और विधिपूर्वक विवाह संपन्न करो।

Verse 146

विनापि दर्भतोयाग्नीन्न्यथोक्तविधिमतरा । ब्राह्मणस्यैव वाक्येन विवाहः सफलो भवेत् ॥ १४६ ॥

कुश, जल और अग्नि के बिना तथा अन्य विधियों के अभाव में भी, केवल ब्राह्मण के वचन मात्र से ही विवाह सफल हो जाता है।

Verse 147

न हतो यदि विप्रस्तु भार्यया तव राक्षस । वृत्ते होमस्य कार्ये तु तं भवान् भक्षयिष्यति ॥ १४७ ॥

हे राक्षस! यदि तुम्हारी पत्नी ने उस ब्राह्मण को नहीं मारा है, तो होम कार्य संपन्न होने पर तुम उसे खा लेना।

Verse 148

एवमुक्ते तु वचने तया वै राजकन्यया । विश्वस्तमानसो दर्पान्निर्जगाम स राक्षसः ॥ १४८ ॥

राजकन्या के ऐसा कहने पर वह राक्षस मन में कुछ निश्चिन्त होकर भी दर्प से प्रेरित होकर वहाँ से निकल गया।

Verse 149

सत्वरं हृच्छयाविष्टस्तमानेतुं बहिः स्थितः ॥ १४९ ॥

हृदय-शोक से व्याकुल होकर वह शीघ्र बाहर गया और उसे भीतर लाने के विचार से वहीं खड़ा रहा।

Verse 150

तस्य निर्गच्छतो देवि क्षुतमासीत्स्वयं किल । सव्यं चाप्यस्फुरन्नेत्रं स्ववस्त्रं स्खलितं तथा ॥ १५० ॥

हे देवी! उसके निकलते समय कहा जाता है कि उसे अपने-आप छींक आई; उसका बायाँ नेत्र फड़कने लगा और अपना वस्त्र भी खिसक गया—ऐसे अपशकुन हुए।

Verse 151

अनाहृत्य तु तत्सर्वं निर्गतोऽसौ दरीमुखात् । बिभ्राणां मानुषं रूपं स्वामपश्यन्नितंबिनीम् ॥ १५१ ॥

परन्तु वह उन सबको लिए बिना ही गुफा के मुख से बाहर निकल आया; मनुष्य-रूप धारण करके उसने अपनी ही पत्नी—सुडौल नितम्बों वाली—को देखा।

Verse 152

घटयंतीं तु संबंधं भार्याभर्तृसमुद्भवम् । परित्यजामि त्वां पापं राक्षसं क्रूरकर्मिणम् ॥ १५२ ॥

जो पत्नी-पति से उत्पन्न पवित्र संबंध को बलपूर्वक जोड़ना चाहती है—ऐ पापी, क्रूरकर्मी राक्षस! मैं तुझे त्यागती हूँ।

Verse 153

मानुषीप्रमदासक्तं मच्छरीरस्य दूषकम् । तच्छ्रुत्वा दारुणं वाक्यं भार्यया समुदीरितम् । ईर्ष्याकोपसमायुक्तस्त्वभ्यधावन्निशाचरः ॥ १५३ ॥

पत्नी के मुख से यह कठोर वचन—“तुम मनुष्य-स्त्री में आसक्त हो और मेरे शरीर को दूषित कर चुके हो”—सुनकर वह निशाचर ईर्ष्या और क्रोध से भरकर झपट पड़ा।

Verse 154

उत्क्षिप्य बाहू प्रविदार्य वक्त्रं संप्रस्थितो भक्षयितुं स चोभौ । कालेन वेगात्पवनो यथैव समुच्चरन्वाक्यमनर्थयुक्तम् ॥ १५४ ॥

वह भुजाएँ उठाकर और मुख फाड़कर, उन दोनों को निगल जाने हेतु दौड़ा; और काल-वेग से प्रेरित पवन की भाँति निरर्थक वचन चिल्लाता रहा।

Verse 155

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणोत्तरभागे मोहिनीचरिते काष्ठीलोपाख्यानं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के उत्तरभाग में मोहिनी-चरित के अंतर्गत “काष्ठीलोपाख्यान” नामक सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Sandhyāvalī frames Ekādaśī as Hari’s own sacred day where eating becomes a dharma-violation that undermines vrata-kalpa, royal conduct, and satya; she therefore redirects Mohinī toward alternative boons so the king’s vow remains intact.

It operates as an upākhyāna (embedded exemplum) that concretizes karmaphala: domestic ethical failures—especially withholding support for a husband’s welfare and acting from pride/greed—are shown to generate prolonged suffering across hells and rebirths, reinforcing the chapter’s vrata-and-satya ethic.

Mohinī asserts that horoscope/planets are secondary to the bhāva (state of mind) at conception; the child is born bearing that disposition, which then shapes character traits like generosity, modesty, affection, and dharma-orientation.