
विघ्नराजचरितम्
Vighnaraja - Lord of Obstacles
मुद्गल पुराण का सातवां खंड 'विघ्नराज चरित' के नाम से जाना जाता है। इसमें भगवान गणेश के विघ्नराज अवतार की कथा है, जिन्होंने ममता और आसक्ति के प्रतीक ममासुर का दमन किया। ममासुर ने कठोर तपस्या से वरदान पाकर देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। जब सृष्टि में अधर्म बढ़ गया, तब देवताओं की प्रार्थना पर गणेश जी ने विघ्नराज के रूप में अवतार लिया। उन्होंने ममासुर का वध करने के बजाय उसे अपना भक्त बना लिया, जो यह दर्शाता है कि अहंकार का अंत केवल समर्पण से संभव है। इस खंड में ऋषि दत्तात्रेय द्वारा ब्रह्म और माया पर गूढ़ दार्शनिक चर्चा भी शामिल है। अंत में, गणेश जी कश्यप और दिति के समक्ष चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर ब्रह्मांड में धर्म की स्थापना करते हैं।
इस अध्याय में शौनक ऋषि सूत जी से विघ्नराज के चरित्र के बारे में पूछते हैं। सूत जी दक्ष और मुद्गल ऋषि के संवाद का वर्णन करते हैं। दिति अपने पुत्रों की मृत्यु के शोक में इंद्र को मारने वाले पुत्र की प्राप्ति के लिए तपस्या करती है। विघ्नराज की माया से दिति के व्रत में त्रुटि होती है, और इंद्र उसके गर्भ के ४९ टुकड़े कर देते हैं, जो मरुद्गण कहलाए।
इस अध्याय में दिति अपने पुत्रों की मृत्यु पर कश्यप ऋषि के सामने विलाप करती हैं। कश्यप उन्हें कर्म और संसार का ज्ञान देते हैं। फिर वे पार्वती की कथा सुनाते हैं, जहाँ शिव द्वारा तिरस्कृत होने पर पार्वती गणेश जी की आराधना करती हैं। गणेश व्रत के प्रभाव से शिव का मन बदलता है और वे पार्वती को स्वीकार करते हैं।
इस अध्याय में ममासुर की उत्पत्ति और गणेश जी से वरदान प्राप्ति का वर्णन है। पार्वती के गर्व और ममता से उत्पन्न हंसी से 'मम' नामक असुर का जन्म हुआ। उसने गणेश मंत्र का जाप कर घोर तपस्या की। गणेश जी ने प्रसन्न होकर उसे त्रैलोक्य का राज्य और अजेय होने का वरदान दिया।
कश्यप बताते हैं कि कैसे ममासुर ने शम्बरासुर की पुत्री मोहिनी से विवाह किया। शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बनाया। ममासुर ने चिन्तनाश नगर बसाया और उसके धर्म और अधर्म नामक दो पुत्र हुए। शुक्राचार्य की चेतावनी के बावजूद कि वह गणेश की भक्ति न छोड़े, ममासुर ने त्रिलोक विजय अभियान शुरू किया। उसने पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग को जीत लिया। अंत में, वह कैलाश पहुँचा जहाँ शिव और अन्य देवता युद्ध के लिए तैयार हुए।
इस अध्याय में ममासुर और देवताओं के बीच भीषण युद्ध का वर्णन है। प्रारंभ में शिव, विष्णु और शक्ति के नेतृत्व में देवताओं ने ममासुर के पुत्रों और सेनापतियों को हराया। क्रोधित होकर ममासुर स्वयं युद्ध में उतरा और शिव, विष्णु, सूर्य और देवी को अचेत कर बंदी बना लिया। उसने ब्रह्मांड पर अधिकार कर लिया और अपने असुरों को कैलाश और वैकुंठ का शासक बना दिया। उसने वर्णाश्रम धर्म और वैदिक अनुष्ठानों को नष्ट कर दिया और अधर्म फैलाया।
ममासुर द्वारा बंदी बनाए गए देवताओं को विष्णु ने गणेश की आराधना की सलाह दी। सौ वर्षों की तपस्या के बाद भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को विघ्नराज प्रकट हुए। देवताओं ने उनकी स्तुति की। नारद मुनि को शांति दूत बनाकर ममासुर के पास भेजा गया।
इस अध्याय में नारद मुनि ममासुर को समझाते हैं कि विघ्नराज ही परब्रह्म हैं। वे उसे अहंकार त्यागकर गणेश की शरण में जाने की सलाह देते हैं। आकाशवाणी और शुक्राचार्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। ममासुर के सेनापति धर्म और अधर्म युद्ध का मार्ग चुनते हैं। अंत में गणेश जी अपने कमल अस्त्र से ममासुर के गर्व का मर्दन करते हैं।
इस अध्याय में, भगवान गणेश के दिव्य पद्म अस्त्र से भयभीत होकर ममासुर अपने अहंकार को त्याग देता है और पद्म की प्रार्थना करता है। शांत होकर अस्त्र गणेश के हाथ में लौट आता है। ममासुर फिर विघ्नराज की स्तुति करता है और उनसे भक्ति तथा माया से मुक्ति का वरदान मांगता है। गणेश उसे वरदान देते हैं और उसे अधार्मिक कार्यों के फल को खाने तथा गणेश की पूजा न करने वालों के मन में ममता उत्पन्न करने का कार्य सौंपते हैं।
विघ्नराज खण्ड के नौवें अध्याय में, देवताओं और ऋषियों ने भगवान विघ्नराज की स्तुति की। गणेश जी ने प्रसन्न होकर वरदान दिए, लेकिन ऋषियों ने केवल भक्ति मांगी। इसके बाद हिमालय में दस योजन का एक पवित्र क्षेत्र स्थापित किया गया। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को विघ्नपति, सिद्धि, बुद्धि और नागेश की स्थापना हुई। यह अध्याय इस क्षेत्र की महिमा और ममासुर से मुक्ति का वर्णन करता है।
इस अध्याय में दिति ऋषि कश्यप से विघ्नेश्वर के अवतारों का वर्णन करने का अनुरोध करती हैं। कश्यप सृष्टि की प्रक्रिया समझाते हैं, जिसमें प्रारंभ में सृजित ब्रह्मा आनंद और सक्रियता से रहित थे। उन्होंने गणेश के एकाक्षरी मंत्र का जप करते हुए कठोर तपस्या की। विघ्नेश्वर पहले गजमुख रूप में और फिर भगवान विष्णु के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्माओं ने विष्णु और गणेश के गुणों को समाहित करने वाले स्तोत्र से उनकी स्तुति की। विष्णु ने उन्हें आनंद, सामर्थ्य और योग-शांति का ज्ञान प्रदान किया।
इस अध्याय में विष्वक्सेन भगवान विष्णु से शांति के योग के बारे में पूछते हैं। विष्णु बताते हैं कि विघ्नराज (गणेश) ही परम ब्रह्म हैं। प्रारंभ में अहंकारी विष्वक्सेन केवल विष्णु की भक्ति करते हैं, लेकिन बाद में गणेश के दर्शन से उन्हें विष्णु और गणेश की एकता का बोध होता है। वे गणेश की स्तुति केशव और नारायण के रूप में करते हैं। अंत में वे हरि और हेरम्ब के अभेद को स्वीकार करते हैं।
कश्यप ऋषि धर्मघ्न के पुत्र यज्ञध्रुक् नामक असुर की कथा सुनाते हैं, जिसने शिव से वरदान पाकर ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त की और यज्ञों को नष्ट कर दिया। विष्णु और देवताओं ने एकाक्षर मंत्र से गणेश की तपस्या की। गणेश ने शूर्पकर्ण अवतार लेकर अंकुश से यज्ञध्रुक् का वध किया। कश्यप ने समझाया कि शूर्पकर्ण का अर्थ है वह जो माया से ब्रह्म को अलग कर मोक्ष प्रदान करता है।
प्रयाग में माघ मास के दौरान, दत्तात्रेय भगवान गणेश की पूजा करते हैं। शिव और ऋषि पूछते हैं कि एक आत्मज्ञानी सगुण पूजा क्यों करता है। दत्तात्रेय 'दत्त गीता' सुनाते हैं, जिसमें गणेश को ब्रह्मास्पति के रूप में माया से परे बताया गया है। वे वसिष्ठ और नारद की शंकाओं का समाधान करते हुए अद्वैत ज्ञान और भक्ति के समन्वय को स्थापित करते हैं।
दिति ने महर्षि दत्तात्रेय से दस अक्षरों वाला गणेश मंत्र प्राप्त किया और कठिन तपस्या की। एक हजार वर्षों के बाद, भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। दिति ने उनकी स्तुति की और उनसे अपने पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान माँगा। गणेश जी ने वरदान दिया और दिति अपने पति कश्यप के पास लौट आईं।
दिति गणेश की पूजा करती हैं, जो चतुर्भुज अवतार में प्रकट होते हैं। उनके विराट रूप से भयभीत होकर दिति प्रार्थना करती हैं, और वे एक बालक बन जाते हैं। कश्यप उनका नामकरण करते हैं। जब विष्णु और देवता असुरों पर आक्रमण करते हैं, तब चतुर्भुज अपने परशु से विष्णु के चक्र को रोक देते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनकी स्तुति करते हैं। वे स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की सीमाएँ निर्धारित कर अंतर्धान हो जाते हैं।
विघ्नराज खण्ड के इस समापन अध्याय में, लोभ और शाप के वश में दैत्य दिति की चेतावनी को अनसुना कर देवताओं से युद्ध करते हैं। दिति, अदिति और कश्यप द्वैत भाव से ऊपर उठकर गणेश की भक्ति करते हैं। मुद्गल ऋषि दक्ष को निष्काम कर्म और भक्ति योग का उपदेश देते हैं। अंत में विघ्नराज के चरित्र श्रवण की महिमा और फलश्रुति का वर्णन है।
Mamasura is the demon representing 'Mamata' or attachment and possessiveness. He overthrew the Devas and conquered the cosmos until Lord Ganesha incarnated as Vighnaraja to subdue him.
Lord Ganesha incarnated as Vighnaraja (The Lord of Obstacles) to defeat Mamasura, restore cosmic Dharma, and demonstrate that supreme worldly attachment can only be overcome by divine surrender.
Sage Dattatreya appears to deliver a profound philosophical discourse to the deities, explaining that Lord Ganesha is the ultimate Brahman and detailing the relationship between Maya and the Supreme Truth.
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