वैशग्पायन उवाच तस्य तदू वचन श्रुत्वा मत्स्यराज: प्रतापवान् । उत्तरं प्रत्युवाचेदमभिपन्नो युधिछ्टिरे,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! उत्तरकी यह बात सुनकर प्रतापी मत्स्यनरेश, जो युधिष्ठिरके अपराधी थे, अपने पुत्रसे इस प्रकार बोले--'बेटा! यह पाण्डवोंको प्रसन्न करनेका समय आया है। मेरी ऐसी ही रुचि है। यदि तुम्हारी राय हो, तो मैं कुमारी उत्तराका विवाह कुन्तीपुत्र अर्जुनसे कर दूँ”
vaiśampāyana uvāca | tasya tad u vācanaṃ śrutvā matsyarājaḥ pratāpavān | uttaraṃ pratyuvācedam abhipanno yudhiṣṭhire |
वैशम्पायन बोले—उत्तर की यह बात सुनकर प्रतापी मत्स्यराज, जो पहले युधिष्ठिर के अपराधी हो चुके थे, अपने पुत्र से इस प्रकार बोले।
वैशग्पायन उवाच