वैशम्पायन उवाच ततः प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद् भृशम् । मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सयन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इतना कहकर कोपमें भरे हुए राजा विराटने वह पासा युधिष्ठिरके मुखपर जोरसे दे मारा तथा रोषपूर्वक डाँटते हुए उनसे कहा--“फिर कभी ऐसी बात न कहना”
vaiśampāyana uvāca | tataḥ prakupito rājā tam akṣeṇāhanad bhṛśam | mukhe yudhiṣṭhiraṃ kopān naivam ity eva bhartsayan |
वैशम्पायन बोले—तब क्रोध से भरे राजा विराट ने पासे से युधिष्ठिर के मुख पर जोर से प्रहार किया और रोष में डाँटते हुए कहा—“फिर कभी ऐसी बात मत कहना।”
वैशम्पायन उवाच