विराटसभायां पाण्डवानां प्रवेशः — Arjuna’s Encomium of Yudhiṣṭhira in Virāṭa’s Court
त॑ भीमरूपं त्वरितं द्रवन्तं दुर्योधन शत्रुसहोडभिषज्भत् । प्रास्फोटयद् योद्धुमना: किरीटी बाणेन विद्धं रुधिरं वमन््तम्,उस समय दुर्योधनका रूप भयंकर हो रहा था। वह हार खाकर बाणसे घायल हो रक्त वमन करता हुआ भागा जा रहा था। यह देखकर शत्रुका वेग सहन करनेवाले किरीटधारी अर्जुनने ताल ठोंकी और मनमें युद्धके लिये उत्साह रखते हुए वे शत्रुको ललकारने लगे
taṁ bhīmarūpaṁ tvaritaṁ dravantaṁ duryodhanaṁ śatru-sahodbhijātam | prāsphoṭayad yoddhu-manāḥ kirīṭī bāṇena viddhaṁ rudhiraṁ vaman tam ||
वैशम्पायन बोले—उस समय दुर्योधन का रूप भयानक हो उठा। शत्रु-वेग से दबकर वह पराजित-सा, बाण से घायल और रक्त वमन करता हुआ शीघ्र भागा। उसे ऐसा देखकर किरीटधारी अर्जुन ने युद्ध-उत्साह से बाहु ठोंके और शत्रु को ललकारते हुए गर्जना की।
वैशम्पायन उवाच