Virāṭa’s Conciliation and Uttara’s Account of the Unseen Champion
Bṛhannadā/Arjuna
ध्वजं चैवास्य कौन्तेय: शरैरभ्यहनद् भृशम् । शीघ्रकृद् रथवाहांश्व॒ तथोभौ पार्ष्णिसारथी,फिर कुन्तीनन्दनने शीघ्रता करते हुए उनकी ध्वजाको भी अपने बाणोंसे छेद डाला और रथके घोड़ों, पार्श्वरक्षकों तथा सारथिको भी बहुत घायल कर दिया
dhvajaṃ caivāsya kaunteyaḥ śarair abhyahanad bhṛśam | śīghrakṛd rathavāhāṃś ca tathobhau pārṣṇisārathī ||
फिर कौन्तेय ने शीघ्रता से बाणों द्वारा उसके ध्वज को बार-बार बेधा; और उसी वेग में रथ के घोड़ों, पार्श्वरक्षकों तथा सारथि को भी अत्यन्त घायल कर दिया।
वैशम्पायन उवाच