ध्वजेन शिखिपिच्छानामुच्छ़ितेन विराजसे । कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं पावितं त्वया,“तुम्हारी मयूरपिच्छसे चिह्नित ध्वजा आकाशमें ऊँची फहरा रही है। उससे तुम्हारी शोभा और भी बढ़ गयी है। तुमने ब्रह्मचर्यव्रत धारण करके तीनों लोकोंको पवित्र कर दिया है
मयूरपिच्छ से चिह्नित ऊँची ध्वजा से तुम विराजती हो। कौमार्य-ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करके तुमने त्रिदिव को पवित्र कर दिया है।
वैशम्पायन उवाच