Adhyāya 55: Pārtha–Rādheya Saṃvāda and Tactical Exchange
Chapter 55
अर्जुनानिलभिगन्नानि वनान्यर्जुनविद्विषाम् । चक्रुलोहितधाराभिर्धरणीं लोहितान्तराम्,अर्जुनके शत्रुरूपी वन अर्जुनरूपी वायुसे ही छिन्न-भिन्न हो लाल धाराएँ (रक्त) बहाकर पृथ्वीको भी लाल करने लगे
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वैशम्पायन बोले—अर्जुन के वायु-सदृश वेग से अर्जुन-विरोधियों के वन-से समूह विदीर्ण हो गए और रक्त की धाराएँ बहने लगीं; उन लाल धाराओं ने धरती को भी लाल-लाल रेखाओं से भर दिया। रणभूमि में पाण्डव का वह महावेग प्रत्यक्ष दिखाई देता था।
वैशम्पायन उवाच