Virāṭa-parva Adhyāya 54 — Missile-Exchange and Tactical Redirection
Arjuna, Aśvatthāman, Karṇa
तथा सपत्नान् विकिरन् किरीटी चचार संख्येडतिरथो रथेन । जैसे वसन्तऋतुमें (तेज चलनेवाली) हवा पतझड़के बिखरे पत्तोंको उड़ाती और बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है
इस प्रकार शत्रुओं को तितर-बितर करता हुआ किरीटधारी अतिरथी अर्जुन रथ पर रणभूमि में विचरने लगा। जैसे वसन्त ऋतु की तीव्र वायु पतझड़ के बिखरे पत्तों को उड़ा देती और बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही रथस्थ वीर अर्जुन शत्रुओं का संहार करता हुआ घूमने लगा।
वैशम्पायन उवाच