अर्जुन-कर्ण-सङ्ग्रामः
Arjuna–Karna Engagement in the Cattle-Raid Aftermath
एकान्ते पार्थमासीनं कूपेडग्निमिव संवृतम् । अज्ञानादभ्यवस्कन्दध्य प्राप्ता: स््मो भयमुत्तमम्,हमलोगोंने तेरह वर्षोतक इन्हें वनमें रखकर इनके साथ कपटपूर्ण बर्ताव किया है। (अब ये प्रतिज्ञाके बन्धनसे मुक्त हो गये हैं;) अतः बन्धनसे छूटे हुए सिंहकी भाँति कया वे हमारा नाश न कर डालेंगे? कुएँमें छिपी हुई अग्निके समान यहाँ एकान्तमें स्थित कुन्तीपुत्र अर्जुनके पास हम अज्ञानवश आ पहुँचे हैं और भारी भय एवं संकटमें पड़ गये हैं
ekānte pārtham āsīnaṁ kūpe 'gnim iva saṁvṛtam | ajñānād abhyavaskandhya prāptāḥ smo bhayam uttamam ||
कृपाचार्य बोले—एकान्त में स्थित पार्थ को हमने अज्ञानवश आ घेरा है; वह कुएँ में छिपी अग्नि के समान आवृत है। इस प्रकार हम अपने ऊपर महान भय ले आये हैं।
कृप उवाच