आचार्य-क्षमा, देśa–kāla-नīti, तथा भेद-दोषः
Teacher-Reconciliation, Timing-Policy, and the Fault of Factionalism
रथं तमागतं दृष्टवा दक्षिणं प्राकरोत् तदा । रथमास्थाय बी भत्सु: कौन्तेय: श्वेतवाहन:,इस प्रकार उस ध्वजको रथपर आया हुआ देख श्वेत घोड़ोंवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनने उस रथकी परिक्रमा की तथा उसके ऊपर बैठकर अपनी अंगुलियोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने धारण किये। फिर कपिश्रेष्ठ हनुमानूजीसे उपलक्षित ध्वजाको फहराते हुए गाण्डीव धनुषके साथ उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया
vaiśampāyana uvāca | rathaṃ tam āgataṃ dṛṣṭvā dakṣiṇaṃ prākaroṭ tadā | ratham āsthāya bībhatsuḥ kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ |
वैशम्पायन बोले— उस रथ को आया हुआ देखकर उन्होंने दाहिनी ओर से उसकी परिक्रमा की। फिर रथ पर आरूढ़ होकर श्वेत घोड़ों वाले कौन्तेय बीभत्सु (अर्जुन) ने स्वयं को कार्य के लिए सज्ज किया और धर्म-मर्यादा का पालन करते हुए आगे बढ़ा।
वैशम्पायन उवाच