Omens in the Kuru Host and Droṇa’s Recognition of Arjuna (क्लीबवेषधारी पार्थ-परिज्ञानम्)
वैशम्पायन उवाच सतां दृष्टवा विशालाक्षीं राजपुत्रीं सखी तथा । प्रहसन्नब्रवीद् राजन् किमागमनमित्युत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! विशाल नेत्रोंवाली अपनी सखी राजकुमारी उत्तराकी ओर देखकर अर्जुनने हँसते हुए जब उससे अपने पास आनेका कारण पूछा, तब वह राजपुत्री नरश्रेष्ठ अर्जुनके समीप जा अपना प्रेम प्रकट करती हुई सखियोंके बीचमें इस प्रकार बोली--
vaiśampāyana uvāca |
sa tāṃ dṛṣṭvā viśālākṣīṃ rājaputrīṃ sakhīṃ tathā |
prahasann abravīd rājan kim āgamanam ity uta ||
वैशम्पायन बोले— राजन् जनमेजय! विशाल नेत्रों वाली अपनी सखी राजकुमारी उत्तरा को देखकर अर्जुन हँसते हुए बोला— “तुम यहाँ किस कारण आई हो?”
वैशम्पायन उवाच