Virāṭa-parva Adhyāya 25: Kaurava Deliberation and the Search Directive (अन्वेषण-आदेशः)
गिरिकूटेषु तुड्रेषु नानाजनपदेषु च । जनाकीररेंषु देशेषु खर्वटेषु पुरेषु च,महाराज! हमने पर्वतोंके ऊँचे-ऊँचे शिखरोंपर, भिन्न-भिन्न देशोंमें, जनसमूहसे भरे हुए स्थानोंमें तथा तराईके गाँवों, बाजारों और नगरोंमें भी उनकी बहुत खोज की, परंतु कहीं भी पाण्डवोंका पता नहीं लगा। नरश्रेष्ठी] आपका कल्याण हो। सम्भव है, वे सर्वथा नष्ट हो गये हों
Vaiśampāyana uvāca: girikūṭeṣu tuṅgeṣu nānājanapadeṣu ca | janākīrṇeṣu deśeṣu kharvaṭeṣu pureṣu ca, mahārāja, vayaṁ parvataśikhareṣu nānādeśeṣu janasaṅkuleṣu sthāneṣu ca tathā kharvaṭeṣu paṇyapaṭṭaneṣu nagareṣu ca teṣāṁ bahu anvaiṣma, na ca kvacid api pāṇḍavānām adarśayāma | narāśreṣṭha, tava kalyāṇaṁ bhavatu | sambhāvayāmaḥ te sarvathā naṣṭāḥ syuḥ ||
वैशम्पायन बोले—“महाराज! हमने ऊँचे-ऊँचे पर्वत-शिखरों पर, भिन्न-भिन्न जनपदों में, जनसमूह से भरे प्रदेशों में तथा तराई के गाँवों, बाजारों और नगरों में भी उनकी बहुत खोज की; पर कहीं भी पाण्डवों का कोई पता न लगा। नरश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। सम्भव है, वे सर्वथा नष्ट हो गए हों।”
वैशम्पायन उवाच