Virāṭa-parva Adhyāya 22 — Draupadī’s Abduction Attempt and Bhīma’s Suppression of the Kīcakas
तस्य तत् कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् । अनुचिन्तयतश्नचापि तामेवायतलोचनाम्,मन-ही-मन विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदीका बारंबार चिन्तन करते हुए शृंगार धारण करते समय कीचकको वह थोड़ा-सा समय भी उत्कण्ठावश बहुत बड़ा-सा प्रतीत हुआ
tasya tat kurvataḥ karma kālo dīrgha ivābhavat | anucintayataś cāpi tām evāyatalocanām ||
उस कर्म को करते हुए कीचक को काल मानो दीर्घ हो गया। और उस आयतलोचना (द्रौपदी) का बार-बार चिन्तन करते हुए उत्कण्ठा से उसे क्षण भर भी बहुत बड़ा प्रतीत हुआ।
वैशम्पायन उवाच