अध्याय १५ — कीचकस्य अत्याचारः, द्रौपद्याः सभाशरणगमनम्
Kīcaka’s coercion and Draupadī’s appeal in the assembly
तां मृगीमिव संत्रस्तां दृष्टवा कृष्णां समीपगाम् | उदतिष्ठन्मुदा सूतो नावं लब्ध्वेव पारग:,डरी हुई हरिणीकी भाँति भयभीत द्रौपदीको समीप आयी देख सूत कीचक आनन्दमें भरकर खड़ा हो गया; मानो नदीके पार जानेवाला पथिक नौका पाकर प्रसन्न हो गया हो
tāṁ mṛgīm iva saṁtrastāṁ dṛṣṭvā kṛṣṇāṁ samīpagām | udatiṣṭhan mudā sūto nāvaṁ labdhveva pāragaḥ ||
वैशम्पायन बोले—डरी हुई हरिणी के समान भयभीत कृष्णा (द्रौपदी) को पास आते देख सूत कीचक हर्ष से उठ खड़ा हुआ; मानो नदी पार करने को आतुर पथिक को नौका मिल गई हो।
वैशम्पायन उवाच