(स्वेषु दारेषु मेधावी कुरुते यत्नमुत्तमम् | स्वदारनिरतो हाशु नरो भद्राणि पश्यति ।। बुद्धिमान् पुरुष अपनी पत्नीको ही अनुकूल बनाये रखनेके लिये उत्तम यत्न करता है। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखनेवाला मनुष्य शीघ्र ही कल्याणका भागी होता है। न चारधर्मेण लिप्येत न चाकीर्तिमवाप्नुयात् । स्वदारेषु रतिर्धमों मृतस्यापि न संशय: ।। मनुष्यको चाहिये कि वह पापमें लिप्त न हो, अपयशका पात्र न बने, अपनी ही पत्नीके प्रति अनुराग रखना परम धर्म है। वह मृत पुरुषके लिये भी कल्याणकारी होता है, इसमें संशय नहीं है। स्वजातिदारा मर्त्यस्य इहलोके परत्र च | प्रेतकार्याणि कुर्वन्ति निवापैस्तर्पयन्ति च ।। अपनी जातिकी स्त्रियाँ मनुष्यके लिये इहहलोक और परलोकमें भी हितकारिणी होती हैं। वे प्रेतकार्य (अन्त्येष्टि-संस्कार) करती और जलांजलि देकर मृतात्माको तृप्त करती हैं। तदक्षय्यं च धर्म्य च स्वर्ग्यमाहुर्मनीषिण: । स्वजातिदारजा: पुत्रा जायन्ते कुलपूजिता: ।। उनके इस कार्यको मनीषी पुरुषोंने अक्षय, धर्मसंगत एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला बताया है। अपनी जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए पुरुष कुलमें सम्मानित होते हैं। प्रिया हि प्राणिनां दारास्तस्मात् त्वं धर्मभाग् भव । परदाररतो मर्त्यो न च भद्राणि पश्यति ।।) सभी प्राणियोंको अपनी ही पत्नी प्यारी होती है। इसलिये तुम भी ऐसा करके धर्मके भागी बनो। परस्त्रीलम्पट पुरुष कभी कल्याण नहीं देखता। परदारास्मि भद्रें ते न युक्त तव साम्प्रतम् । दयिता: प्राणिनां दारा धर्म समनुचिन्तय,सबसे बड़ी बात यह है कि मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। इस समय मुझसे इस तरहकी बातें करना तुम्हारे लिये किसी तरह उचित नहीं है। जगत्के सब प्राणियोंके लिये अपनी ही स्त्री प्रिय होती है। तुम धर्मका विचार करो
vaiśampāyana uvāca |
svēṣu dārēṣu mēdhāvī kurutē yatnam uttamam |
svadāranirataḥ śīghraṁ naro bhadrāṇi paśyati ||
na cādharmeṇa lipyeta na cākīrtim avāpnuyāt |
svadārēṣu ratiḥ dharmo mṛtasya api na saṁśayaḥ ||
svajātidārā martyasya ihaloke paratra ca |
pretakāryāṇi kurvanti nivāpais tarpayanti ca ||
tad akṣayyaṁ ca dharmyaṁ ca svargyam āhur manīṣiṇaḥ |
svajātidārajāḥ putrā jāyante kulapūjitāḥ ||
priyā hi prāṇināṁ dārās tasmāt tvaṁ dharmabhāg bhava |
paradārarato martyo na ca bhadrāṇi paśyati ||
paradārāsmi bhadraṁ te na yuktaṁ tava sāmpratam |
dayitāḥ prāṇināṁ dārā dharmaṁ samanucintaya ||
वैशम्पायन बोले—“बुद्धिमान पुरुष अपनी ही पत्नी के साथ सौहार्द बनाए रखने के लिए उत्तम प्रयत्न करता है; जो अपने ही दारे में अनुरक्त रहता है, वह शीघ्र कल्याण देखता है। मनुष्य न अधर्म से लिप्त हो, न अपकीर्ति पाए; अपनी ही पत्नी के प्रति प्रेम-निष्ठा परम धर्म कही गई है—मृतक के लिए भी वह हितकारी है, इसमें संदेह नहीं। अपनी जाति की पत्नी इस लोक और परलोक—दोनों में हित करती है; वही प्रेतकर्म करती है और निवाप-जलांजलि से पितरों को तृप्त करती है। मनीषियों ने इसे अक्षय, धर्म्य और स्वर्गप्रद कहा है; अपनी जाति की पत्नी से उत्पन्न पुत्र कुल में पूजित होते हैं। सब प्राणियों को अपनी ही पत्नी प्रिय होती है; इसलिए तुम भी धर्म के भागी बनो। परस्त्री में आसक्त मनुष्य कभी कल्याण नहीं देखता। ‘और फिर, मैं पराई पत्नी हूँ—तुम्हारा कल्याण हो। इस समय मुझसे ऐसी बातें करना तुम्हारे लिए उचित नहीं। सबके लिए अपनी ही स्त्री प्रिय है; धर्म का विचार करो।’”
वैशम्पायन उवाच
The passage teaches that devotion to one’s own spouse is a central form of dharma: it protects one from adharma and disgrace, brings welfare, and is linked to enduring merit through household and ancestral duties. Pursuing another’s wife is condemned as a path that blocks true well-being.
In the Virāṭa-parvan context, the narration presents a moral admonition: the speaker (through Vaiśampāyana’s report) articulates norms of righteous conduct regarding women and marriage, and includes a direct refusal—‘I am another’s wife; it is not proper to speak so now’—urging the listener to reflect on dharma.