Nakula’s Reception in Matsya: Appointment as Aśvasūta
Horse-master
इदं तु रूपं मम येन कि तव प्रकीर्तयित्वा भूशशोकवर्धनम् । बृहन्नलां मां नरदेव विद्धि सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम्,मेरा ऐसा रूप जिस कारणसे हुआ है, उसे आपके सामने कहनेसे क्या लाभ है? वह अधिक शोक बढ़ानेवाली बात है। राजन! आप मुझे बृहन्नला समझें और पिता-मातासे रहित पुत्र या पुत्री मान लें
idaṃ tu rūpaṃ mama yena kiṃ tava prakīrtayitvā bhūśaśokavardhanam | bṛhannalāṃ māṃ naradeva viddhi sutaṃ sutāṃ vā pitṛmātṛvarjitām ||
अर्जुन बोले—“जिस कारण से मुझे यह रूप प्राप्त हुआ है, उसे आपके सामने कहकर क्या लाभ? वह तो आपके शोक को ही बढ़ाएगा। राजन्, मुझे बृहन्नला ही समझिए और पिता-माता से रहित पुत्र—या पुत्री—मान लीजिए।”
अजुन उवाच