Nakula’s Reception in Matsya: Appointment as Aśvasūta
Horse-master
हि >> आय न (हुक हि ० एकादशोब< ध्याय: अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना वैशम्पायन उवाच अथापरोड<दृश्यत रूपसम्पदा सत्रीणामलड्कारधरो बृहत्पुमान् | प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले दीर्घे च कम्बूपरि हाटके शुभे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर नगरकी चहारदीवारीके पीछे जो मिट्टीका ऊँचा टीला था, उसके समीप रूप-सम्पदासे सुशोभित एक दूसरा पुरुष दिखायी दिया। उसका डील-डौल ऊँचा था। उसने स्त्रियोंक लिये उचित आभूषण पहन रखे थे तथा कानोंमें बड़े-बड़े कुण्डल और हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन धारण कर लिये थे
vaiśampāyana uvāca | athāparo 'dṛśyata rūpasampadā strīṇām alaṅkāradharo bṛhatpumān | prākāravapre pratimucya kuṇḍale dīrghe ca kambūpari hāṭake śubhe ||
वैशम्पायन बोले— तत्पश्चात् नगर-प्राकार के पीछे मिट्टी के ऊँचे वप्र के समीप एक दूसरा पुरुष दिखाई दिया—रूप-सम्पदा से सुशोभित, परन्तु स्त्रियों के योग्य आभूषण धारण किए हुए, और कद-काठी में ऊँचा व प्रभावशाली। उसने वहीं दीर्घ कुण्डल पहने और शंख की चूड़ियों के ऊपर शुभ स्वर्ण-कंगन धारण किए।
वैशम्पायन उवाच