Virāṭanagara-nivāsa-nirṇaya
Decision to Reside in Virāṭa’s City
विराटराजं रमयन् सामात्यं सहबान्धवम् | नच मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च तं नूपम्,मैं राजा विराटको उनके मन्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित पासोंके खेलसे प्रसन्न करता रहूँगा। इस रूपमें मुझे कोई पहचान न सकेगा और मैं उन मत्स्यनरेशको भलीभाँति संतुष्ट रखूँगा
मैं राजा विराट को उनके मन्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवों सहित पासों के खेल से प्रसन्न करता रहूँगा। इस रूप में मुझे कोई पहचान न सकेगा और मैं उन मत्स्यनरेश को भलीभाँति संतुष्ट रखूँगा।
युधिछिर उवाच