Adharma’s Short-Lived Prosperity and the Restorative Path of Tīrtha (लोमश–युधिष्ठिर संवादः)
तुम तो सदा धर्ममें मन लगाये रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे शून्य हो और आगे भी तुममें अधिकाधिक इन गुणोंका विकास होगा ।। यथा भगीरथो राजा राजानश्न गयादय: । यथा ययाति: कौन्तेय तथा त्वमपि पाण्डव
tvaṃ tu sadā dharme manaḥ saṃdhārayituṃ śīlaḥ, dharmajñaḥ satyapratijñaś ca sarvavidhāsaktibhiḥ śūnyaḥ; agre ’pi ca tvayi ete guṇā adhikādhikaṃ vṛddhiṃ yāsyanti. yathā bhagīratho rājā, rājānaś ca nalo gayādayaḥ; yathā yayātiḥ kaunteya, tathā tvam api pāṇḍava.
लोमश बोले—तुम सदा धर्म में मन लगाये रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और सब प्रकार की आसक्तियों से शून्य हो; और आगे भी तुममें इन गुणों का अधिकाधिक विकास होगा। जैसे राजा भगीरथ, तथा नल और गय आदि राजाओं की कीर्ति है, और जैसे ययाति, हे कौन्तेय—वैसे ही, हे पाण्डव, तुम भी प्रसिद्ध होओगे।
लोमश उवाच