अध्याय ९० — लोमशोपदेशः तथा तीर्थयात्रानिश्चयः
Lomaśa’s Counsel and the Resolve for Pilgrimage
सरस्वती नदी सद्धि: सततं पार्थ पूजिता । बालखिल्यैर्महाराज यत्रेष्टमृषिभि: पुरा,कुन्तीनन्दन! साधु पुरुषोंने सरस्वती नदीकी सदा उपासना की है। महाराज! पूर्वकालमें बालखिल्य ऋषियोंने वहाँ यज्ञ किया था
sarasvatī nadī siddhiḥ satataṃ pārtha pūjitā | bālakhilyair mahārāja yatreṣṭam ṛṣibhiḥ purā ||
धौम्य बोले—हे पार्थ! सरस्वती नदी सदा सिद्धिदायिनी मानकर पूजित रही है। महाराज! प्राचीन काल में वहीं बालखिल्य ऋषियों ने यज्ञ किए थे। इसलिए, हे कुन्तीनन्दन! सज्जन पुरुष सरस्वती की निरन्तर श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं।
धौम्य उवाच