Avanti–Narmadā–Puṣkara Tīrtha-Kathana (धौम्यकथितं तीर्थवर्णनम्)
यदर्थे पुरुषव्याप्र कीर्तयन्ति पुरातना: । एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येको5पि गयां व्रजेत्,'पुरुषसिंह! उस गयाके विषयमें ही प्राचीनलोग यह कहा करते हैं कि “बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये; सम्भव है उनमेंसे एक भी गया जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नीलवृषका- उत्सर्ग करे। ऐसा पुरुष अपनी संततिद्वारा दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है”
Vaiśampāyana uvāca |
yadarthe puruṣavyāprāḥ kīrtayanti purātanāḥ |
eṣṭavyā bahavaḥ putrā yady eko 'pi Gayāṃ vrajet ||
पुरुषश्रेष्ठ! उसी प्रयोजन के विषय में, जिसके लिए मनुष्य परिश्रम करते हैं और जिसे प्राचीन लोग प्रशंसा से कहते हैं—यह कहा गया है कि बहुत-से पुत्रों की कामना करनी चाहिए, यदि उनमें से एक भी गया जाए।
वैशम्पायन उवाच