Tīrtha-yātrā: Phalaśruti and Sacred Geography from Lohitya to Prayāga
Pulastya’s Instruction
विप्राणामनुकम्पार्थ दर्भिणा निर्मित पुरा । व्रतोपनयनाभ्यां चाप्युपवासेन वाप्युत,कुरुकुलशिरोमणे! वहीं अर्धकील नामक तीर्थ है, जिसे पूर्वकालमें दर्भी मुनिने ब्राह्मणोंपर कृपा करनेके लिये प्रकट किया था। वहाँ व्रत, उपनयन और उपवास करनेसे मनुष्य कर्मकाण्ड और मन्त्रोंका ज्ञाता ब्राह्मण होता है, इसमें संशय नहीं है। नरश्रेष्ठ! क्रियाविहीन और मन्त्रहीन पुरुष भी उसमें स्नान करके व्रतका पालन करनेसे विद्वान् होता है, यह बात प्राचीन महर्षियोंने प्रत्यक्ष देखी है
viprāṇām anukampārthaṁ darbhiṇā nirmitaṁ purā | vratopayanābhyāṁ cāpy upavāsena vāpy uta, kurukulaśiromaṇe! vahīṁ ardhakīla nāmakaṁ tīrtha hai, jise pūrvakāla meṁ darbhī munine brāhmaṇoṁ par kṛpā karane ke liye prakaṭ kiyā thā. vahāṁ vrata, upanayana aur upavāsa karane se manuṣya karmakāṇḍa aur mantroṁ kā jñātā brāhmaṇa hotā hai, ismeṁ saṁśaya nahīṁ hai. naraśreṣṭha! kriyāvihīna aura mantrahīna puruṣa bhī usmeṁ snāna karke vrata kā pālana karane se vidvān hotā hai, yah bāt prācīna maharṣiyoṁ ne pratyakṣa dekhī hai
घूलस्त्य बोले—“कुरुकुल-शिरोमणे! प्राचीन काल में ब्राह्मणों पर करुणा करके दर्भी मुनि ने ‘अर्धकील’ नामक तीर्थ प्रकट किया था। वहाँ व्रत करने, उपनयन-धर्म का पालन करने और उपवास करने से मनुष्य कर्मकाण्ड और मन्त्रों का ज्ञाता ब्राह्मण बन जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। नरश्रेष्ठ! जो क्रिया से रहित और मन्त्र-विद्या से वंचित हो, वह भी वहाँ स्नान करके व्रत का पालन करे तो विद्वान् हो जाता है—यह बात प्राचीन महर्षियों ने प्रत्यक्ष देखी है।”
घुलस्त्य उवाच