Keśinī’s Inquiry to Bāhuka and the Emotional Signs of Concealed Identity (केशिन्याः बाहुकपरीक्षा)
प्रत्यक्ष ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम् | अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा,यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा--“शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको का्टूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं
bṛhadaśva uvāca |
pratyakṣa te mahārāja śātayiṣye bibhītakam |
ahaṃ hi nābhijānāmi bhaved evaṃ na veti vā ||
हे महाराज! मैं इस बहेड़े के वृक्ष को काटकर उसके फलों की संख्या आपकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष कर दूँगा; क्योंकि ऐसा किए बिना मैं निश्चयपूर्वक नहीं जान सकता कि संख्या सचमुच इतनी है या नहीं।
बृहदश्च उवाच