Sudeva Identifies Damayantī in Cedi (सुदेवेन दमयन्ती-परिचयः)
“माताजी! आप मुझे मानव-कन्या ही समझिये। मैं अपने पतिके चरणोंमें अनुराग रखनेवाली एक नारी हूँ। मेरी अन्तःपुरमें काम करनेवाली सैरन्ध्री जाति है। मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ ।। फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् । असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रत:,“मैं अकेली हूँ, फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करती हूँ और जहाँ साँझ होती है, वहीं टिक जाती हूँ। मेरे स्वामीमें असंख्य गुण हैं, उनका मेरे प्रति सदा अत्यन्त अनुराग है
mātāji! āpa mujhe mānava-kanyā hī samajhiye | maiṃ apane pati-ke caraṇoṃ meṃ anurāga rakhanevālī eka nārī hūṃ | merī antaḥpura meṃ kāma karanevālī sairandhrī jāti hai | maiṃ sevikā hūṃ aura jahāṃ icchā hotī hai, vahīṃ rahatī hūṃ || phalamūlāśanām ekāṃ yatra sāyaṃ pratiśrayām | asaṅkhyeya-guṇo bhartā māṃ ca nityam anuvrataḥ ||
“माताजी, मुझे केवल मानव-कन्या ही समझिए। मैं अपने पति के चरणों में अनुराग रखने वाली, सदा उन्हीं का अनुसरण करने वाली नारी हूँ। मेरे अन्तःपुर में सैरन्ध्री जाति की कर्मकुशल सेविकाएँ हैं; और मैं स्वयं भी एक पराधीन सेविका हूँ—जहाँ इच्छा हो, वहीं रहती हूँ। मैं अकेली फल-मूल खाकर जीवन-निर्वाह करती हूँ; जहाँ संध्या होती है, वहीं रात का आश्रय ले लेती हूँ। मेरे स्वामी असंख्य गुणों से युक्त हैं और वे मुझ पर सदा अटल अनुराग रखते हैं।”
बृहदश्चव उवाच