दमयन्त्याः व्याकुलता — स्वयंवरसंनिपातः — देवदूतयाचनम्
Damayantī’s Distress, Proclamation of the Svayaṃvara, and the Gods’ Request
न शेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय । तो ह्ाप्रतिरथौ युद्धे देवपुत्रो महारथी,“जिस समय भीमसेन और अर्जुनको आगे रखकर वे दोनों सिंहके समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारोंके समान दुःसह वीर युद्धके मुहानेपर खड़े होंगे, उस समय मुझे अपनी सेनाका कोई वीर शेष रहता नहीं दिखायी देता है। संजय! देवपुत्र महारथी नकुल-सहदेव युद्धमें अनुपम हैं। कोई भी रथी उनका सामना नहीं कर सकता
na śeṣam iha paśyāmi mama sainyasya saṃjaya | tau hy apratirathau yuddhe devaputrau mahārathī ||
वैशम्पायन बोले— “संजय! मुझे यहाँ अपनी सेना का कोई शेष नहीं दिखता; क्योंकि वे दोनों देवपुत्र महारथी युद्ध में अप्रतिरथ हैं—उनके समान कोई नहीं।”
वैशम्पायन उवाच