दमयन्त्याः व्याकुलता — स्वयंवरसंनिपातः — देवदूतयाचनम्
Damayantī’s Distress, Proclamation of the Svayaṃvara, and the Gods’ Request
'सूत! मैं बीते हुए द्यूतजनित घोर अन्यायका स्मरण करके दिन तथा रातमें क्षणभर भी शान्ति नहीं पाता ।। तेषामसहावीर्याणां शौर्य धैर्य धृतिं पराम् । अन्योन्यमनुरागं च भ्रातृणामतिमानुषम्,“मैं देखता हूँ, पाण्डवोंके पराक्रम असह्ा हैं। उनमें शौर्य, धैर्य तथा उत्तम धारणाशक्ति है। उन सब भाइयोंमें परस्पर अलौकिक प्रेम है
sūta! ahaṃ bhūtapūrvaṃ dyūtajanitaṃ ghoraṃ anyāyaṃ smṛtvā divā ca rātrau ca kṣaṇam api śāntiṃ na labhe || teṣām asahavīryāṇāṃ śaurya-dhairya-dhṛtiṃ parām | anyonyam anurāgaṃ ca bhrātṝṇām atimānuṣam ||
“हे सूत! द्यूत से उत्पन्न उस घोर अन्याय का स्मरण करके मैं दिन-रात क्षणभर भी शान्ति नहीं पाता। मैं देखता हूँ कि पाण्डवों का पराक्रम असह्य है; उनमें परम शौर्य, धैर्य और दृढ़ धारणाशक्ति है, और उन भाइयों में परस्पर ऐसा प्रेम है जो साधारण से परे है।”
वैशम्पायन उवाच