दमयन्त्याः व्याकुलता — स्वयंवरसंनिपातः — देवदूतयाचनम्
Damayantī’s Distress, Proclamation of the Svayaṃvara, and the Gods’ Request
दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत: । अब्रवीत् संजयं सूतमामन्त्रय पुरुषर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--पुरुषरत्न जनमेजय! पाण्डवोंका वह अद्भुत एवं अलौकिक चरित्र सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रका मन चिन्ता और शोकमें डूब गया। वे अत्यन्त खिन्न हो उठे और लंबी एवं गरम साँसें खींचकर अपने सारथि संजयको निकट बुलाकर बोले--
dīrgham uṣṇaṃ ca niḥśvasya dhṛtarāṣṭro ’mbikāsutaḥ | abravīt sañjayaṃ sūtam āmantrya puruṣarṣabha ||
अम्बिकासुत धृतराष्ट्र ने लंबी और गरम साँस लेकर, पुरुषश्रेष्ठ संजय सारथि को बुलाकर कहा।
वैशम्पायन उवाच