Arjuna’s Himalayan Departure and the Commencement of Severe Tapas
Janamejaya’s Inquiry; Sages Approach Śiva
कारणानां च परम॑ जाने त्वां त्रयम्बकं विभुम् | देवानां च गतिं देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत्,प्रभो! मैं आपको समस्त कारणोंमें सर्वश्रेष्ठ कारण मानता हूँ। आप नत्रिनेत्रधारी तथा सर्वव्यापी हैं। सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं। देव! यह सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है
हे प्रभो! मैं आपको समस्त कारणों में परम कारण मानता हूँ। आप त्रिनेत्रधारी और सर्वव्यापी हैं; देवों की भी गति-आश्रय आप ही हैं। देव! यह समस्त जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है।
अजुन उवाच