Vyāsa’s Counsel to Yudhiṣṭhira: Pratismṛti-vidyā, Arjuna’s Aśtra-Quest, and the Move to Kāmyaka
बलवदभिवविरुद्ध न कार्यमेतत् त्वयानघ । प्रयाह्म॒ुविध्नेनेवाशु विजयाय महाबल । नमो धात्रे विधात्रे च स्वस्ति गच्छ हुनामयम्,निष्पाप महाबली आर्यपुत्र! आप बलवानोंसे विरोध न करें, यह मेरा अनुरोध है। विध्न- बाधाओंसे रहित हो विजयप्राप्तिके लिये शीघ्र यात्रा कीजिये। धाता और विधाताको नमस्कार है। आप कुशल और स्वस्थतापूर्वक प्रस्थान कीजिये
Vaiśampāyana uvāca | balavad-abhivaviru(ddhaṁ) na kāryam etat tvayānagha | prayāhi vighnena ivāśu vijayāya mahābala | namo dhātre vidhātre ca svasti gaccha hunāmayaṁ niṣpāpa mahābalī āryaputra |
वैशम्पायन बोले— हे निष्पाप! बलवानों से विरोध करने का यह कार्य तुम्हें नहीं करना चाहिए। हे महाबल! विघ्नरहित होकर विजय के लिए शीघ्र प्रस्थान करो। धाता और विधाता को नमस्कार। तुम कुशल-क्षेम से, निरामय होकर जाओ।
वैशम्पायन उवाच