Dharma-śaṅkā-nivāraṇa: Yudhiṣṭhira’s Response on Karma-Phala and Trust in Dharma
त्रिद्वारामर्थसिद्धि तु नानुपश्यन्ति ये नरा: । तथैवानर्थसिद्धिं च यथा लोकास्तथैव ते,अत: जो लोग अर्थसिद्धि तथा अनर्थकी प्राप्तिमें देव, हठ और स्वभाव--इन तीनोंको कारण नहीं समझते, वे वैसे ही हैं, जैसे कि साधारण अज्ञ लोग होते हैं
tridvārām arthasiddhiṁ tu nānupaśyanti ye narāḥ | tathaivānarthasiddhiṁ ca yathā lokās tathaiva te ||
जो लोग अर्थसिद्धि के त्रिद्वार—देव, हठ और स्वभाव—को नहीं समझते, और अनर्थ की प्राप्ति के भी इन्हीं त्रिद्वारों को नहीं पहचानते, वे साधारण अज्ञ जनों के समान ही हैं।
युधिछिर उवाच