यक्षने कहा--कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थनकाष्ठको तो तुम्हारी परीक्षाके लिये मैं ही मृगरूपसे लेकर भाग गया था ।। वैशम्पायन उवाच ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत । अन्यं वरय भद्रं ते वरं त्वममरोपम,वैशम्पायनजी कहते हैं--इसके बाद भगवान् धर्मने उत्तर दिया कि (लो, अरणी और मन्थनकाष्ठ) तुम्हें दे ही देता हूँ। देवोपम नरेश! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम कोई दूसरा वर माँगो
vaiśampāyana uvāca | dadānīty eva bhagavān uttaraṃ pratyapadyata | anyaṃ varaya bhadraṃ te varaṃ tvam amaropama ||
वैशम्पायन ने कहा—तब भगवान् धर्म ने उत्तर दिया—“मैं देता हूँ।” और अरणी तथा मन्थनकाष्ठ लौटा दिए। देवोपम राजन्! तुम्हारा कल्याण हो; अब तुम कोई दूसरा वर माँगो।
वैशम्पायन उवाच