यक्ष उवाच अहं बक: शैवलमत्स्यभक्षो नीता मया प्रेतवशं तवानुजा: । त्वं पज्चमो भविता राजपुत्र नचेत् प्रश्नान् पछतो व्याकरोषि,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- यक्ष बोला--राजकुमार! मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयोंको यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछनेपर यदि तुम मेरे प्रश्नोंका उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोकके पाँचवें अतिथि होओगे
yakṣa uvāca—ahaṃ bakaḥ śaivalamatsyabhakṣo nītā mayā pretavaśaṃ tavānujāḥ | tvaṃ pañcamo bhavitā rājaputra nacet praśnān pṛcchato vyākaroṣi || dharmaputro mahābāhur vilalāpa suvistaram | arjunaḥ mṛtaḥ patitaḥ; tasya dhanuṣ-bāṇāḥ itastataḥ vikīrṇāḥ | bhīmasenaḥ ca nakula-sahadevau ca prāṇarahitāḥ niśceṣṭāḥ abhavan | etān sarvān dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraḥ uṣṇa-uṣṇaṃ dīrgha-niḥśvāsān ācakṛṣe | tasya netrebhyaḥ śokāśrūṇi udgamya taṃ siñcanti sma | sarvān bhrātṝn evaṃ dharāśayān dṛṣṭvā mahābāhuḥ dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ gāḍha-cintāyāṃ nimagno dīrghakālaṃ vilalāpa—yakṣaḥ uvāca—rājakumāra! ahaṃ śaivāla-matsya-bhakṣaḥ bakaḥ | mayā eva tava kṣudra-bhrātaraḥ yamalokaṃ nītāḥ; ataḥ mama pṛṣṭe yadi praśnān na vyākaroṣi, tarhi tvam api yamalokasya pañcamaḥ atithiḥ bhaviṣyasi ||
यक्ष बोला—“मैं शैवाल और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयों को मृत्यु के वश में कर दिया है। हे राजकुमार! यदि मेरे पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर न दोगे, तो तुम पाँचवें होकर यमलोक के अतिथि बनोगे।” अर्जुन मृत पड़ा था; उसके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन, नकुल और सहदेव भी प्राणहीन, निश्चेष्ट होकर धरती पर पड़े थे। यह दृश्य देखकर महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने जलते हुए लंबे-लंबे निःश्वास लिए; शोक के आँसू उमड़कर उनकी आँखों से बह निकले और उन्हें भिगोने लगे। अपने सब भाइयों को इस प्रकार गिरा हुआ देखकर वे गहरी चिंता में डूब गए और देर तक विलाप करते रहे। तब यक्ष ने फिर कहा—“राजकुमार! मैं शैवाल और मछली पर जीनेवाला बगुला हूँ; मैंने ही तुम्हारे अनुजों को यमलोक पहुँचाया है। इसलिए पूछे जाने पर यदि तुम उत्तर न दोगे, तो तुम भी मृत्यु-लोक के पाँचवें अतिथि हो जाओगे।”
वैशग्पायन उवाच